नींद अवसाद को…
कुछ सहेजे हुए गीत गाती हूं मैं
शांत कमरे में ही गुनगुनाती हूं मैं।
व्यर्थ व्यापक समय नष्ट तुम पर किया
नींद, अवसाद को घर बुलाती हूं मैं।
साथ अंतिम समय तक निभाऊंगी मैं
झूठ कह कर दिलासा दिलाऊंगी मैं।
तुम समझदार हो इसलिए कह दिया
छोड़ कर तुमको जाना है, जाऊंगी मैं।
सोंच लेना मैं झूठी थी मक्कार थी
आँख का धोखा स्वप्नों का व्यापार थी।
दिल ही दिल में ये तुमको भी मालूम है
लड़की जिद्दी तो थी पर वफादार थी।
अश्रु पूरित विरह गीत हमने लिखे
करके अनुनय- विनय गीत हमने लिखे।
आज चौखट पे दिल की नहीं तुम मगर
शेष- स्मृति, प्रणय गीत हमने लिखे।
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