ज़िंदगी मेरी आज ज़िंदगी से परेशान है,
बात इतनी है, लिबास 1 रूह 2 से अनजान है।
तारीकी3 है मगर, दीया भी जला नहीं सकते,
क्या करें, घर में लाख4 के सब सामान है।
ऐसा नहीं कि कोई नहीं जहाँ में हमारा,
दोस्त हैं कई मगर, क्या करें सब नादान हैं।
हर कोई है बेख़बर, बना बैठा है नासमझ,
जो लोग करीब हैं मेरे, दूरियों से अनजान हैं।
घर छोड़ बैठ गए हैं हम मयख़ाने में आकर,
कुछ नहीं तो मय के मिलने का इमकान5 है।
ढूँढ रहा हूँ ख़ुद को, कहीं कभी मिलता नहीं,
चेहरे की तो नहीं, सूरत-ए-दिल की पहचान है।
गुज़र जाएगी ज़िंदगी, ज़िंदगी से क्या डरें,
अब रह गई जो कुछ पलों की मेहमान है।
1. कपड़े; 2. आत्मा; 3. अंधकार; 4. एक ज्वलनशील पदार्थ; 5. संभावना।
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