जाती हुई ठण्ड, पछिया हवा के थपेड़े,
किसी रूठी हुई प्रेमिका की तरह का दिन,
दोपहर जैसे खामोश और चिरचिरा,
न कुछ बोलता न कुछ सुनना ही चाहता !
वो दूर खेतों में मक्के मटरगस्ती करते,
जैसे दूर से हमें चिढ़ाते हुए देखते,
बिखरे बिखरे बालों पर जमी धुल,
जैसे उजड़ा हुआ सा घर कोई !
उबासी से ऊँघते हुए दिन,
जैसे कब आँख लग जाये,
वसंत की ताक में बैठे सब,
वो आये और रूठे को मनाये !
#SK

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