आज कुरेद गया वो

आज कुरेद गया वो अरसे से जमे जज़्बातों को,
कुछ बूँदें फिर से भिगो गईं सूखे रुख़सारों 1 को।

दर्द आज फिर से झाँकने लगा तह-ए-दिल से,
शायद कोई भरने आया है दिल की दरारों को।

दस्तक दे ही जाता है अक्सर तसव्वुर2 उनका,
चैन कहाँ से आएगा अब मेरे बेचैन करारों को।

सर्द ख़यालों को तपिश का आज हुआ एहसास,
दे रहा है शायद कोई हवा बुझे हुए अलावों3 को।

मुन्तज़िर4 हूँ फिर वो चला आएगा मेरे कूचे 5 में,
बेज़ार 6 नज़रों से नाप रहा हूँ मैं तनहा राहों को।

1. गाल; 2. कल्पना; 3. आग; 4. इंतज़ार करने वाला; 5. गली; 6. उदास।

 

यह ग़ज़ल मेरी पुस्तक ‘इंतज़ार’ से ली गई है। इस किताब की स्याही में दिल के और भी कई राज़, अनकहे ख़यालात दफ़्न हैं। अगर ये शब्द आपसे जुड़ पाए, तो पूरी किताब आपका इंतज़ार कर रही है। – पन्ना

Comments

Leave a Reply

New Report

Close