Author: Ajay Amitabh

  • फिर से सतयुग भू पर लाओ

    विधी न्याय संकल्प प्रलापित,
    किंतु कैसा कल्प प्रकाशित?
    दुर्योधन का राज चला है,
    शकुनि पाशे को मचला है।

    एकलव्य फिर हुआ उपेक्षित,
    अंधे का साम्राज्य फला है।
    जब पांचाली वस्त्र हरण हो,
    अभिमन्यु के जैसा रण हो।

    चक्रव्यूह कुचक्र रचा कर,
    एक रथी का पुनः मरण हो।
    धर्मराज पाशे के प्यासे,
    लिप्त भोग के संचय में।

    न्याय नीति का हुआ विस्मरण,
    पड़े विदुर अति विस्मय में।
    अधर्म हीं आज रीत है,
    न्याय तराजू मुद्रा क्रीत है।

    भीष्म सत्य का छद्म प्रवंचन,
    द्रोण माणिक पर करे हैं नर्तन।
    धृष्ट्र राष्ट्र तो है हीं अंधे,
    कुटिलों के हीं चलते धंधे।

    फिर भी अबतक आस वही है ,
    हाँ तुझपर विश्वास वही है।
    हम तेरे हीं दर पर जाते,
    पर दुविधा में हम पड़ जाते।

    क्योंकि पाप अनल्प बचा है,
    ना कोई विकल्प बचा है।
    नीति युक्त ना क्रियाकल्प है,
    तिमिर घनेरा आपत्कल्प है।

    दिग दिगंत पर अबला नारी,
    नर पिशाच के हाथों हारी।
    हास लिप्त हैं अत्याचारी,
    दुःसंकल्प युक्त व्यभिचारी।

    संशय तब संभावी होता,
    निःसंदेह प्रभावी होता।
    धर्मग्रंथ के अंकित वचनों,
    का परिहास स्वभावी होता।

    आखिर क्यों वचनों को मानें,
    बात लिखी उसको सच जाने।
    आस कहां हम करें प्रतिष्ठित,
    निज चित्त में ये प्रश्न अधिष्ठित।

    जिस न्याय की बात बता कर,
    सत्य हेतु विध्वंस रचा कर।
    किए कल्प का जो अभियंत्रण ,
    वही कल्प दे रहा निमंत्रण।

    हे कृष्ण हे पार्थ सारथी,
    सकल विश्व के परमारथी।
    आर्त हृदय से धरा पुकारे,
    धरा व्याप्त है आज स्वारथी।

    नीति पुण्य का जब क्षय होगा,
    और अधर्म का जब जय होगा।
    तुम कहते थे तुम आओगे ,
    कदाचार क्षय कर जाओगे।

    कुत्सित आज आचार बड़ा है,
    दु:शासन से आर्त धरा है।
    कहाँ न्याय है कहाँ धर्म है?
    दुराचार पथभ्रष्ट कर्म है।

    क्या इतना नाकाफी तुझको,
    दिखती नाइंसाफी तुझको?
    दुष्कर्मी व्यापार फला जब,
    किसका इंतज़ार भला अब?

    तेरे कहे धर्म क्षय कब होता,
    पापाचार का कब जय होता?
    और कितने दुष्कर्म फलेंगे,
    तब जाके तेरे पांव पड़ेंगे?

    कान्हा आखिर कब आओगे?
    बात कही जो कर पाओगे।
    अति त्रस्त हम हमें बचाओ ,
    धर्म पताका फिर फहराओ।

    नीति न्याय का जो आलापन,
    था उसका कुछ लो संज्ञापन।
    वचनों में संकल्प दिखाओ,
    फिर से सतयुग भूपर लाओ।

    अजय अमिताभ सुमन

  • किवाड़ खा गई

    =====
    सबूत भी गवाह भी
    किवाड़ खा गई,
    जालिम ये दीमक सारी,
    मक्कार खा गई।
    =====
    हराम की थी रातें,
    छिपी सी मुलाकातें ,
    किसने खिलाये क्या गुल,
    गुमनाम सारी बातें।
    =====
    आस्तीन में छुपे हुए,
    गद्दार खा गई ,
    जालिम ये दीमक सारी,
    मक्कार खा गई।
    =====
    जिस रोड के थे चर्चे ,
    जिस पर हुए थे खर्चे ,
    लायें कहाँ से उसको ,
    लिख लिख भरे थे पर्चे।
    =====
    कि झूठ पर फले सब ,
    रोजगार खा गई,
    जालिम ये दीमक सारी,
    मक्कार खा गई।
    =====
    फाइल में बन पड़ी थी ,
    चौपाल की जो बातें,
    ना ब्रिज वो दिखती है ,
    बस नाम की हीं बातें।
    =====
    दफ्तर के काले चिट्ठे ,
    कारोबार खा गई,
    जालिम ये दीमक सारी,
    मक्कार खा गई।
    =====
    अजय अमिताभ सुमन
    =====

  • खबर हादसे की

    खबर का मुख्य उद्देश्य समाज में विश्वास , आस्था और भाईचारे की नींव को मजबूत करना होता है ना रोष , नफरत और दहशत की अग्नि को फैलाना । परंतु क्या वर्तमान समय में पत्रकारिता के संदर्भ यही बात कही जा सकती है ? यदि कोई हादसा , घटना या दुर्घटना समाज के बड़े तबके में सनसनी पैदा करने में सक्षम नहीं है तब भी क्या वो आजकल अखबार में छप जाने के काबिल हो सकती है? पत्रकारिता का ध्येय येन केन प्रकारेण स्वयं के उत्थान के लिए चटपटी खबरें बनाना और फैलाना नहीं अपितु राष्ट्र के हित में कटु सत्य को सामने लाना है होता है जो कि वर्तमान समय में लगभग लुप्तप्राय हीं है। नकारात्मक पत्रकारिता पर व्ययंगात्मक रूप से चोट पहुंचाती हुई प्रस्तुत है मेरी कविता “खबर हादसे की”।

    ना माथे पर शिकन कोई,
    ना रूह में कोई भय है,
    ना दहशत हीं फैली ,
    ना हिंसा परलय है
    हादसा हुआ तो है,
    लहू भी बहा मगर,
    खबर भी बन जाए,
    अभी ना तय है,
    माहौल भी नरम है,
    अफवाह ना गरम है,
    आवाम में अमन है,
    कोई रोष ना भरम है,
    बिखरा नहीं चमन है ,
    अभी आंख तो नरम है
    थोड़ी बात तो बढ़ जाए,
    थोड़ी आग तो लग जाए,
    रहने दो खबर बाकी,
    रहने दो असर बाकी,
    लोहा जो कुछ गरम हो,
    असर तभी चरम हो,
    ठहरो कि कुछ पतन हो ,
    कुछ राख में वतन हो,
    अभी खाक क्या मिलेगा,
    खबर में कुछ भी दम हो,
    अखबार में आ जाए,
    अभी ना समय है,
    सही ना समय है,
    सही ना समय है।

    अजय अमिताभ सुमन

  • बाजार

    झूठ के बाजार में मिला नहीं,
    माजरा क्या है, तू हिला नहीं।

    अजय अमिताभ सुमन

  • दुर्योधन कब मिट पाया :भाग :40

    =====
    अति शक्ति संचय कर ,
    दुर्योधन ने  हाथ बढ़ाया,
    कटे हुए नर मस्तक थे जो ,
    उनको हाथ दबाया।
    =====
    शुष्क कोई पीपल के पत्तों
    जैसे टूट पड़े थे वो,
    पांडव के सर हो सकते ना
    ऐसे फुट पड़े थे जो ।
    =====
    दुर्योधन के मन में क्षण को
    जो थी थोड़ी आस जगी,
    मरने मरने को हतभागी
    था किंचित जो श्वांस फली।
    =====
    धुल धूसरित हुए थे सारे,
    स्वप्न दृश ज्यो दृश्य जगे  ,
    शंका के अंधियारे बादल
    आ आके थे फले फुले।
    =====
    माना भीम नहीं था ऐसा
    मेरे मन को वो भाये ,
    और नहीं खुद पे मैं उसके,
    पड़ने देता था साए।
    =====
    माना उसकी मात्र प्रतीति 
    मन को मेरे जलाती थी,
    देख देख ना सो पाता था 
    दर्पोंन्नत जो छाती थी।
    =====
    पर उसके घन तन के बल से,
    है परिचय कुछ मैं मानू,
    इतनी बार लड़ा हूँ उससे
    थोड़ा सा तो पहचानू।
    =====
    क्या भीम का सर ऐसे भी
    हो सकता इतना कोमल?
    और पार्थ ये हारा कैसे,
    मचा हुआ हो अयोमल?
    =====
    अश्वत्थामा मित्र तुम्हारी
    शक्ति अजय का  ज्ञान मुझे,
    जो कुछ भी तुम कर सकते हो
    उसका है अभिमान मुझे।
    =====
    पर युद्धिष्ठिर और नकुल है 
    वासुदेव के रक्षण में,
    किस भांति तुम जीत गए
    जीवन के उनके भक्षण में?
    =====
    तिमिर  घोर  अंधेरा  छाया 
    निश्चित कोई  भूल हुई है,
    निश्चय  हीं किस्मत  में मेरे
    धँसी हुई सी  शूल हुई है।
    =====
    दीर्घ स्वांस लेकर दुर्योधन
    हौले से फिर डोला,
    चूक हुई है द्रोणपुत्र,
    निज भाग्य मंद है बोला।
    =====
    अजय अमिताभ सुमन:
    सर्वाधिकार सुरक्षित
    =====

  • दुर्योधन कब मिट पाया:भाग:39

    =====
    दुर्योधन को गुरु द्रोणाचार्य की मृत्यु के उपरांत घटित होने वाली वो सारी घटनाएं याद आने लगती हैं कि कैसे अश्वत्थामा ने कुपित होकर पांडवों पर वैष्णवास्त्र का प्रयोग कर दिया था। वैष्णवास्त्र के सामने प्रतिरोध करने पर वो अस्त्र और भयंकर हो जाता और प्राण ले लेता। उससे बचने का एक हीं उपाय था कि उसके सामने झुक जाया जाए, इससे वो शस्त्र शांत होकर लौट जाता। केशव के समझाने पर भीम समेत सारे पांडव उस शस्त्र के सामने झुक गए। भले हीं पांडवों की जान श्रीकृष्ण के हस्तक्षेप के कारण बच गई हो एक बात तो निर्विवादित हीं थी कि अश्वत्थामा के समक्ष सारे पांडवों ने घुटने तो टेक हीं दिए थे। प्रस्तुत है मेरी दीर्घ कविता “दुर्योधन कब मिट पाया का उनचालिसवां भाग।
    =====
    मृत पड़ने पर गुरु द्रोण के
    कैसा महांधकार मचा था,
    कृपाचार्य रण त्यागे दुर्योधन
    भी निजबल हार चला था।
    =====
    शल्य चित्त ना दृष्टि गोचित
    ओज शौर्य ना कोई आशा,
    और कर्ण भी भाग चला था
    त्याग दीप्ति बल प्रत्याशा।
    =====
    खल शकुनि के कृतवर्मा के
    समर क्षेत्र ना टिकते पाँव,
    सेना सारी भाग चली थी,
    ना परिलक्षित कोई ठांव।
    =====
    इधर मचा था दुर्योधन मन
    गहन निराशा घनांधकार ,
    उधर द्रोणपुत्र कर स्थापित
    खड़ग धनुष और प्रत्याकार।
    =====
    पर जब ज्ञात हुआ उसको,
    क्यों इहलोक से चले गए ,
    द्रोण पुत्र के पिता द्रोण वो
    तनय स्नेह में छले गए।
    =====
    क्रोध से भरकर द्रोणपुत्र ने
    विकट शस्त्र बुलाया था,
    वैष्णवास्त्र अभिमंत्रण कैसा
    वो प्रत्यस्त्र चलाया था।
    =====
    अग्निवर्षा होती थी नभ में
    नहीं कोई टिक पाता था,
    जड़ बुद्धि हीं भीम डटा था
    बात नहीं पतियाता था।
    =====
    वो तो केशव आ पहुंचे थे
    अगर नहीं आ पाते तो ?
    बच पाते क्या पांडव बंधु
    ना उपचार सुझाते वो?
    =====
    द्रोण पुत्र की प्रलयग्नि के
    सम्मुख ना कोई भारी था,
    नतमस्तक हो प्राण बचे वो
    समय अमंगल कारी था।
    =====
    दुर्योधन के मानस पट पर
    दृश्य उभर सब आते थे ,
    भीषण शस्त्र चलाने गुरु
    द्रोण पुत्र को आते थे।
    =====
    इसीलिए तो द्रोण पुत्र की
    बातों पर मुस्कान फली,
    दुर्योधन हर्षित था सुनकर
    अच्छा था जो जान बची।
    =====
    जरा देखूँ तो द्रोण पुत्र ने
    कैसा अद्भुत काम किया ?
    क्या सच में हीं पांडवजन को
    उसने है निष्प्राण किया?
    =====
    अजय अमिताभ सुमन:
    सर्वाधिकार सुरक्षित
    =====

  • ये पूजा ये गायन क्या है!

    त्यागी जैसा दिखने का भाव कोई छोटी मोटी वासना नहीं है। इस त्यागी जैसे दिखने के भाव का त्याग करना बड़ी बाधा है, जिसपर साधक अक्सर ध्यान नहीं देते। परिणामस्वरूप त्याग का वो भाव, जो कि ईश्वर की प्राप्ति की दिशा में उठाया जाने वाला पहला कदम है, ईश्वर की प्राप्ति में सबसे बड़ी बाधा बन जाता है। ऐसा व्यक्ति भले हीं धनवान बन जाए, ज्ञान, मान, सम्मान, अभिमान आदि की प्राप्ति कर ले, परंतु उसे ईश्वर की प्राप्ति कभी नहीं हो सकती।
    =====
    ये पूजा ये गायन क्या है,
    ईश्वर का गीतायन क्या है?
    अहम आदि का भान कहीं है,
    त्यागी का अभिमान कहीं है।
    साधक में सम्मान कहीं है,
    भक्त अति धनवान कहीं है।
    पूजन का बस छद्म प्रदर्शन,
    पर दिल में भगवान नहीं है।
    नारद सा गर भाव नही तो ,
    उस नर के नारायण क्या हैं।
    ईश्वर का गीतायन क्या है?
    ये पूजा ये गायन क्या है?
    =====
    ईशभक्त परायण क्या हैं,
    ईश्वर का गीतायन क्या है?
    नामों का खटराग कहीं है,
    श्रद्धा है ना साज नहीं है,
    उर में प्रभु की आग नहीं है,
    प्रेम कोई अनुराग नहीं है,
    माथे चंदन कमर जनेऊ ,
    मानस पे प्रभुराग नहीं है,
    फिर हाथों में माला लेके,
    मंदिर का ये वायन क्या है?
    ईश्वर का गीतायन क्या है?
    ये पूजा ये गायन क्या है?
    =====
    बिन मीरा बादरायण क्या है,
    ईश्वर का गीतायन क्या है?
    अधरों पे हीं राम कहीं हैं,
    पर दिल में तो राम नहीं है,
    ईश नाम पे चित्त में कोई,
    थिरकन ना अनुसाम नहीं है।
    नर्तन कीर्तन हाथ कमंडल ,
    काम वसन का ग्राम यहीं है।
    चित्त में ना रहते महादेव फिर,
    डमरू क्या भवायन क्या है?
    ईश्वर का गीतायन क्या है?
    ये पूजा ये गायन क्या है?
    =====
    अजय अमिताभ सुमन:
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  • “भगवान बताएं कैसे :भाग-1”

    कहते हैं कि ईश्वर ,जो कि त्रिगुणातित है, अपने मूलस्व रूप में आनंद हीं है, इसीलिए तो उसे सदचित्तानंद के नाम से भी जाना जाता है। इस परम तत्व की एक और विशेषता इसकी सर्वव्यापकता है यानि कि चर, अचर, गोचर , अगोचर, पशु, पंछी, पेड़, पौधे, नदी , पहाड़, मानव, स्त्री आदि ये सबमें व्याप्त है। यही परम तत्व इस अस्तित्व के अस्तित्व का कारण है और परम आनंद की अनुभूति केवल इसी से संभव है। परंतु देखने वाली बात ये है कि आदमी अपना जीवन कैसे व्यतित करता है? इस अस्तित्व में अस्तित्वमान क्षणिक सांसारिक वस्तुओं से आनंद की आकांक्षा लिए हुए निराशा के समंदर में गोते लगाता रहता है। अपनी अतृप्त वासनाओं से विकल हो आनंद रहित जीवन गुजारने वाले मानव को अपने सदचित्तानंद रूप का भान आखिर हो तो कैसे? प्रस्तुत है मेरी कविता “भगवान बताएं कैसे :भाग-1”?
    =====
    भगवान बताएं कैसे?
    [भाग-1] =====
    क्षुधा प्यास में रत मानव को ,
    हम भगवान बताएं कैसे?
    परम तत्व बसते सब नर में ,
    ये पहचान कराएं कैसे?
    =====
    ईश प्रेम नीर गागर है वो,
    स्नेह प्रणय रतनागर है वो,
    वही ब्रह्मा में विष्णु शिव में ,
    सुप्त मगर प्रतिजागर है वो।
    पंचभूत चल जग का कारण ,
    धरणी को करता जो धारण,
    पल पल प्रति क्षण क्षण निष्कारण,
    कण कण को जनता दिग्वारण ,
    नर इक्षु पर चल जग इच्छुक,
    ये अभिज्ञान कराएं कैसे?
    परम तत्व बसते सब नर में ,
    ये पहचान कराएं कैसे?
    =====
    कहते मिथ्या है जग सारा ,
    परम सत्व जग अंतर्धारा,
    नर किंतु पोषित मिथ्या में ,
    कभी छद्म जग जीता हारा,
    सपन असल में ये जग है सब ,
    परम सत्य है व्यापे हर पग ,
    शुष्क अधर पर काँटों में डग ,
    राह कठिन अति चोटिल है पग,
    और मानव को क्षुधा सताए ,
    फिर ये भान कराएं कैसे?
    परम तत्व बसते सब नर में ,
    ये पहचान कराएं कैसे?
    =====
    क्षुधा प्यास में रत मानव को ,
    हम भगवान बताएं कैसे?
    परम तत्व बसते सब नर में ,
    ये पहचान कराएं कैसे?
    =====
    अजय अमिताभ सुमन:
    सर्वाधिकार सुरक्षित
    =====

  • आत्म ज्ञान

    एक व्यक्ति का व्यक्तित्व उस व्यक्ति की सोच पर हीं निर्भर करता है। लेकिन केवल अच्छा विचार का होना हीं काफी नहीं है। अगर मानव कर्म न करे और केवल अच्छा सोचता हीं रह जाए तो क्या फायदा। बिना कर्म के मात्र अच्छे विचार रखने का क्या औचित्य? प्रमाद और आलस्य एक पुरुष के लिए सबसे बड़े शत्रु होते हैं। जिस व्यक्ति के विचार उसके आलस के अधीन होते हैं वो मनोवांछित लक्ष्य का संधान करने में प्रायः असफल हीं साबित होता है।
    ======
    क्या रखा है वक्त गँवाने
    औरों के आख्यान में,
    वर्तमान से वक्त बचा लो
    तुम निज के निर्माण में।
    ======
    उन्हें सफलता मिलती जो
    श्रम करने को होते तत्पर,
    उन्हें मिले क्या दिवास्वप्न में
    लिप्त हुए खोते अवसर?
    ======
    प्राप्त नहीं निज हाथों में
    निज आलस के अपिधान में,
    वर्तमान से वक्त बचा लो
    तुम निज के निर्माण में।
    ======
    ना आशा ना विषमय तृष्णा
    ना झूठे अभिमान में,
    बोध कदापि मिले नहीं जो
    तत्तपर मत्सर पान में?
    ======
    मुदित भाव ले हर्षित हो तुम
    औरों के उत्थान में ,
    वर्तमान से वक्त बचा लो
    तुम निज के निर्माण में।
    ======
    तुम सृष्टि की अनुपम रचना
    तुममें ईश्वर रहते हैं,
    अग्नि वायु जल धरती सारे
    तुझमें हीं तो बसते हैं।
    ======
    ज्ञान प्राप्त हो जाए जग का
    निज के अनुसंधान में,
    वर्तमान से वक्त बचा लो
    तुम निज के निर्माण में।
    ======
    क्या रखा है वक्त गँवाने
    औरों के आख्यान में,
    वर्तमान से वक्त बचा लो
    तुम निज के निर्माण में।
    ======
    अजय अमिताभ सुमन:
    सर्वाधिकार सुरक्षित

  • वर्तमान से वक्त बचा लो [पंचम भाग ]

    विवाद अक्सर वहीं होता है, जहां ज्ञान नहीं अपितु अज्ञान का वास होता है। जहाँ ज्ञान की प्रत्यक्ष अनुभूति होती है, वहाँ वाद, विवाद या प्रतिवाद क्या स्थान ? आदमी के हाथों में वर्तमान समय के अलावा कुछ भी नहीं होता। बेहतर तो ये है कि इस अनमोल पूंजी को वाद, प्रतिवाद और विवाद में बर्बाद करने के बजाय अर्थयुक्त संवाद में लगाया जाए, ताकि किसी अर्थपूर्ण निष्कर्ष पर पहुंचा जा सके। प्रस्तुत है मेरी कविता “वर्तमान से वक्त बचा लो तुम निज के निर्माण में” का पंचम भाग।
    ==============
    वर्तमान से वक्त बचा लो
    पंचम भाग
    ==============
    क्या रखा है वक्त गँवाने
    औरों के आख्यान में,
    वर्तमान से वक्त बचा लो
    तुम निज के निर्माण में।
    ==============
    अर्धसत्य पर कथ्य क्या हो
    वाद और प्रतिवाद कैसा?
    तथ्य का अनुमान क्या हो
    ज्ञान क्या संवाद कैसा?
    ==============
    प्राप्त क्या बिन शोध के
    बिन बोध के अज्ञान में ?
    वर्तमान से वक्त बचा लो
    तुम निज के निर्माण में।
    ==============
    जीवन है तो प्रेम मिलेगा
    नफरत के भी हाले होंगे ,
    अमृत का भी पान मिलेगा
    जहर उगलते प्याले होंगे ,
    ==============
    समता का तू भाव जगा
    क्या हार मिले सम्मान में?
    वर्तमान से वक्त बचा लो
    तुम निज के निर्माण में।
    ==============
    जो बिता वो भूले नहीं
    भय है उससे जो आएगा ,
    कर्म रचाता मानव जैसा
    वैसा हीं फल पायेगा।
    ==============
    यही एक है अटल सत्य
    कि रचा बसा लो प्राण में ,
    वर्तमान से वक्त बचा लो
    तुम निज के निर्माण में।
    ==============
    क्या रखा है वक्त गँवाने
    औरों के आख्यान में,
    वर्तमान से वक्त बचा लो
    तुम निज के निर्माण में।
    ==============
    अजय अमिताभ सुमन:
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  • मान गए भई पलटू राम

    इस सृष्टि में बदलाहटपन स्वाभाविक है। लेकिन इस बदलाहटपन में भी एक नियमितता है। एक नियत समय पर हीं दिन आता है, रात होती है। एक नियत समय पर हीं मौसम बदलते हैं। क्या हो अगर दिन रात में बदलने लगे? समुद्र सारे नियमों को ताक पर रखकर धरती पर उमड़ने को उतारू हो जाए? सीधी सी बात है , अनिश्चितता का माहौल बन जायेगा l भारतीय राजनीति में कुछ इसी तरह की अनिश्चितता का माहौल बनने लगा है। माना कि राजनीति में स्थाई मित्र और स्थाई शत्रु नहीं होते , परंतु इस अनिश्चितता के माहौल में कुछ तो निश्चितता हो। इस दल बदलू, सत्ता चिपकू और पलटूगिरी से जनता का भला कैसे हो सकता है? प्रस्तुत है मेरी व्ययंगात्मक कविता “मान गए भई पलटू राम”।
    ======
    तेरी पर चलती रहे दुकान,
    मान गए भई पलटू राम।
    ======
    कभी भतीजा अच्छा लगता,
    कभी भतीजा कच्चा लगता,
    वोहीं जाने क्या सच्चा लगता,
    ताऊ का कब नया पैगाम ,
    अदलू, बदलू, डबलू राम,
    तेरी पर चलती रहे दुकान।
    ======
    जहर उगलते अपने चाचा,
    जहर निगलते अपने चाचा,
    नीलकंठ बन छलते चाचा,
    अजब गजब है तेरे काम ,
    ताऊ चाचा रे तुझे प्रणाम,
    तेरी पर चलती रहे दुकान।
    ======
    केवल चाचा हीं ना कम है,
    भतीजा भी एटम बम है,
    कल गरम था आज नरम है,
    ये भी कम ना सलटू राम,
    भतीजे को भी हो सलाम,
    तेरी पर चलती रहे दुकान।
    ======
    मौसम बदले चाचा बदले,
    भतीजे भी कम ना बदले,
    पकड़े गर्दन गले भी पड़ले।
    क्या बच्चा क्या चाचा जान,
    ये भी वो भी पलटू राम,
    इनकी चलती रहे दुकान।
    ======
    कभी ईधर को प्यार जताए,
    कभी उधर पर कुतर कर खाए,
    कब किसपे ये दिल आ जाए,
    कभी ईश्क कभी लड़े धड़ाम,
    रिश्ते नाते सब कुर्बान,
    तेरी पर चलती रहे दुकान।
    ======
    थूक चाट के बात बना ले,
    जो मित्र था घात लगा ले,
    कुर्सी को हीं जात बना ले,
    कुर्सी से हीं दुआ सलाम,
    मान गए भई पलटू राम,
    तेरी पर चलती रहे दुकान।
    ======
    अहम गरम है भरम यही है,
    ना आंखों में शरम कहीं है,
    सबकुछ सत्ता धरम यही है,
    क्या वादे कैसी है जुबान ,
    कुर्सी चिपकू बदलू राम,
    तेरी पर चलती रहे दुकान।
    ======
    चाचा भतीजा की जोड़ी कैसी,
    बुआ और बबुआ के जैसी,
    लपट कपट कर झटक हो वैसी,
    ताक पे रख कर सब सम्मान,
    धरम करम इज्जत ईमान,
    तेरी पर चलती रहे दुकान।
    ======
    अदलू, बदलू ,झबलू राम,
    मान गए भई पलटू राम।
    ======
    अजय अमिताभ सुमन
    सर्वाधिकार सुरक्षित

  • वर्तमान से वक्त बचा लो तुम निज के निर्माण में [तृतीय भाग ]

    प्रतिकूल परिस्थितियों के लिए संसार को कोसना सर्वथा व्यर्थ है। संसार ना तो किसी का दुश्मन है और ना हीं किसी का मित्र। संसार का आपके प्रति अनुकूल या प्रतिकूल बने रहना बिल्कुल आप पर निर्भर करता है। आपके द्वारा धारण किए गए विचार हीं आपके आचार को नियंत्रित करते है। आपके द्वारा निर्धारित किए गए आचार के माप दंड हीं आपके भविष्य का निर्धारण करते हैं। महत्वपूर्ण बात ये है कि आप स्वयं के लिए किस तरह के संसार का चुनाव करते हैं। प्रस्तुत है मेरी कविता “वर्तमान से वक्त बचा लो तुम निज के निर्माण में” का तृतीय भाग।
    =======
    क्या रखा है वक्त गँवाने
    औरों के आख्यान में,
    वर्तमान से वक्त बचा लो
    तुम निज के निर्माण में।
    =======
    स्व संशय पर आत्म प्रशंसा
    अति अपेक्षित होती है,
    तभी आवश्यक श्लाघा की
    प्रज्ञा अनपेक्षित सोती है।
    =======
    दुर्बलता हीं तो परिलक्षित
    निज का निज से गान में,
    वर्तमान से वक्त बचा लो
    तुम निज के निर्माण में।
    =======
    जो कहते हो वो करते हो
    जो करते हो वो बनते हो,
    तेरे वाक्य जो तुझसे बनते
    वैसा हीं जीवन गढ़ते हो।
    ========
    सोचो प्राप्त हुआ क्या तुझको
    औरों के अपमान में,
    वर्तमान से वक्त बचा लो
    तुम निज के निर्माण में।
    =========
    तेरी जिह्वा, तेरी बुद्धि ,
    तेरी प्रज्ञा और विचार,
    जैसा भी तुम धारण करते
    वैसा हीं रचते संसार।
    =========
    क्या गर्भित करते हो क्या
    धारण करते निज प्राण में,
    वर्तमान से वक्त बचा लो
    तुम निज के निर्माण में।
    =========
    क्या रखा है वक्त गँवाने
    औरों के आख्यान में,
    वर्तमान से वक्त बचा लो
    तुम निज के निर्माण में।
    =========
    अजय अमिताभ सुमन
    सर्वाधिकार सुरक्षित

  • वर्तमान से वक्त बचा लो तुम निज के निर्माण में [द्वितीय भाग]

    =====
    धर्म ग्रंथों के प्रति श्रद्धा का भाव रखना सराहनीय हैं। लेकिन इन धार्मिक ग्रंथों के प्रति वैसी श्रद्धा का क्या महत्व जब आपके व्यवहार इनके द्वारा सुझाए गए रास्तों के अनुरूप नहीं हो? आपके धार्मिक ग्रंथ मात्र पूजन करने के निमित्त नहीं हैं? क्या हीं अच्छा हो कि इन ग्रंथों द्वारा सुझाए गए मार्ग का अनुपालन कर आप स्वयं हीं श्रद्धा के पात्र बन जाएं। प्रस्तुत है मेरी कविता “वर्तमान से वक्त बचा लो तुम निज के निर्माण में” का द्वितीय भाग।
    =====
    क्या रखा है वक्त गँवाने
    औरों के आख्यान में,
    वर्तमान से वक्त बचा लो
    तुम निज के निर्माण में।
    =====
    धर्मग्रंथ के अंकित अक्षर
    परम सत्य है परम तथ्य है,
    पर क्या तुम वैसा कर लेते
    निर्देशित जो धरम कथ्य है?
    =====
    अक्षर के वाचन में क्या है
    तोते जैसे गान में?
    वर्तमान से वक्त बचा लो
    तुम निज के निर्माण में।
    =====
    दिनकर का पूजन करने से
    तेज नहीं संचित होता ,
    धर्म ग्रन्थ अर्चन करने से
    अक्ल नहीं अर्जित होता।
    =====
    मात्र बुद्धि की बात नहीं
    विवर्द्धन कर निज ज्ञान में,
    वर्तमान से वक्त बचा लो
    तुम निज के निर्माण में।
    =====
    जिस ईश्वर की करते बातें
    देखो सृष्टि रचने में,
    पुरुषार्थ कितना लगता है
    इस जीवन को गढ़ने में।
    =====
    कुछ तो गरिमा लाओ निज में
    क्या बाहर गुणगान में?
    वर्तमान से वक्त बचा लो
    तुम निज के निर्माण में।
    =====
    क्या रखा है वक्त गँवाने
    औरों के आख्यान में,
    वर्तमान से वक्त बचा लो
    तुम निज के निर्माण में।
    =====
    अजय अमिताभ सुमन
    सर्वाधिकार सुरक्षित

  • वर्तमान से वक्त बचा लो तुम निज के निर्माण में [प्रथम भाग]

    अपनी समृद्ध ऐतिहासिक विरासत पर नाज करना किसको अच्छा नहीं लगता? परंतु इसका क्या औचित्य जब आपका व्यक्तित्व आपके पुरखों के विरासत से मेल नहीं खाता हो। आपके सांस्कृतिक विरासत आपकी कमियों को छुपाने के लिए तो नहीं बने हैं। अपनी सांस्कृतिक विरासत का महिमा मंडन करने से तो बेहतर ये हैं कि आप स्वयं पर थोड़ा श्रम कर उन चारित्रिक ऊंचाइयों को छू लेने का प्रयास करें जो कभी आपके पुरखों ने अपने पुरुषार्थ से छुआ था। प्रस्तुत है मेरी कविता “वर्तमान से वक्त बचा लो तुम निज के निर्माण में” का प्रथम भाग।
    ==========
    क्या रखा है वक्त गँवाने
    औरों के आख्यान में,
    वर्तमान से वक्त बचा लो
    तुम निज के निर्माण में।
    ==========
    पूर्व अतीत की चर्चा कर
    क्या रखा गर्वित होने में?
    पुरखों के खड्गाघात जता
    क्या रखा हर्षित होने में?
    भुजा क्षीण तो फिर क्या रखा
    पुरावृत्त अभिमान में?
    वर्तमान से वक्त बचा लो
    तुम निज के निर्माण में।
    ==========
    कुछ परिजन के सुरमा होने
    से कुछ पल हीं बल मिलता,
    निज हाथों से उद्यम रचने
    पर अभिलाषित फल मिलता।
    करो कर्म या कल्प गवां
    उन परिजन के व्याख्यान में,
    वर्तमान से वक्त बचा लो
    तुम निज के निर्माण में।
    ==========
    दूजों से निज ध्यान हटा
    निज पे थोड़ा श्रम कर लेते,
    दूजे कर पाये जो कुछ भी
    क्या तुम वो ना वर लेते ?
    शक्ति, बुद्धि, मेधा, ऊर्जा
    ना कुछ कम परिमाण में।
    वर्तमान से वक्त बचा लो
    तुम निज के निर्माण में।
    ==========
    क्या रखा है वक्त गँवाने
    औरों के आख्यान में,
    वर्तमान से वक्त बचा लो
    तुम निज के निर्माण में।
    ==========
    अजय अमिताभ सुमन:
    सर्वाधिकार सुरक्षित

  • दुर्योधन कब मिट पाया:भाग:38

    ===================
    कौरव सेना को एक विशाल बरगद सदृश्य रक्षण प्रदान करने वाले गुरु द्रोणाचार्य का जब छल से वध कर दिया गया तब कौरवों की सेना में निराशा का भाव छा गया। कौरव पक्ष के महारथियों के पाँव रण क्षेत्र से उखड़ चले। उस क्षण किसी भी महारथी में युद्ध के मैदान में टिके रहने की क्षमता नहीं रह गई थी । शल्य, कृतवर्मा, कृपाचार्य, शकुनि और स्वयं दुर्योधन आदि भी भयग्रस्त हो युद्ध भूमि छोड़कर भाग खड़े हुए। सबसे आश्चर्य की बात तो ये थी कि महारथी कर्ण भी युद्ध का मैदान छोड़ कर भाग खड़ा हुआ।
    =================
    धरा पे होकर धारा शायी
    गिर पड़ता जब पीपल गाँव,
    जीव जंतु हो जाते ओझल
    तज के इसके शीतल छाँव।
    =================
    जिस तारिणी के बल पे केवट
    जलधि से भी लड़ता है,
    अगर अधर में छिद पड़े हों
    कब नौ चालक अड़ता है?
    =================
    जिस योद्धक के शौर्य सहारे
    कौरव दल बल पाता था,
    साहस का वो स्रोत तिरोहित
    जिससे सम्बल आता था।
    ================
    कौरव सारे हुए थे विस्मित
    ना कुछ क्षण को सोच सके,
    कर्म असंभव फलित हुआ
    मन कंपन निःसंकोच फले।
    =================
    रथियों के सं युद्ध त्याग कर
    भाग चला गंधार पति,
    शकुनि का तन कंपित भय से
    आतुर होता चला अति।
    ================
    वीर शल्य के उर में छाई
    सघन भय और गहन निराशा,
    सूर्य पुत्र भी भाग चला था
    त्याग पराक्रम धीरज आशा।
    ================
    द्रोण के सहचर कृपाचार्य के
    समर क्षेत्र ना टिकते पाँव,
    हो रहा पलायन सेना का
    ना दिख पाता था कोई ठाँव।
    ================
    अश्व समर संतप्त हुए
    अभितप्त हो चले रण हाथी,
    कौरव के प्रतिकूल बह चली
    रण डाकिनी ह्रदय प्रमाथी।
    ================
    अजय अमिताभ सुमन
    सर्वाधिकार सुरक्षित

  • मेरे गांव में होने लगा है शामिल थोड़ा शहर:द्वितीय भाग

    =======
    हाल फिलहाल में मेरे द्वारा की गई मेरे गाँव की यात्रा के दौरान मेने जो बदलाहट अपने गाँव की फिजा में देखी , उसका काव्यात्मक वर्णन मेने अपनी कविता “मेरे गाँव में होने लगा है शामिल थोड़ा शहर” के प्रथम भाग में की थी। ग्रामीण इलाकों के शहरीकरण के अपने फायदे हैं तो कुछ नुकसान भी। जहाँ गाँवों में इंफ्रास्ट्रक्चर बेहतर हो रहा है, छोटी छोटी औद्योगिक इकाइयाँ बढ़ रही हैं, यातायात के बेहतर संसाधन उपलब्ध हो रहे हैं तो दूसरी ओर शहरीकरण के कारण ग्रामीण इलाको में जल की कमी, वायु प्रदुषण, ध्वनि प्रदूषण आदि सारे दोष जो कि शहरों में पाया जाता है , ग्रामीण इलाकों में भी पाया जाने लगा है , और मेरा गाँव भी इसका अपवाद नहीं रहा। शहरीकरण के परिणामों को रेखांकित करती हुई प्रस्तुत है मेरी इस कविता “मेरे गाँव में होने लगा है शामिल थोड़ा शहर” का द्वितीय भाग।
    ========
    मेरे गाँव में होने लगा है
    शामिल थोड़ा शहर
    [द्वितीय भाग] =======
    मेरे गाँव में होने लगा है
    शामिल थोड़ा शहर,
    फ़िज़ा में बढ़ता धुँआ है
    और थोड़ा सा जहर।
    =======
    हर गली हर नुक्कड़ पे
    खड़खड़ आवाज है,
    कभी शांति जो छाती थी
    आज बनी ख्वाब है।
    =======
    जल शहरों की आफत
    देहात का भी कहर,
    मेरे गाँव में होने लगा है
    शामिल थोड़ा शहर।
    =======
    जो कुंओं से कूपों से
    मटकी भर लाते थे,
    जो खेतों में रोपनी के
    वक्त गुनगुनाते थे।
    =======
    वो ही तोड़ रहे पत्थर
    दिन रात सारे दोपहर,
    मेरे गाँव में होने लगा है
    शामिल थोड़ा शहर।
    =======
    भूँजा सत्तू ना लिट्टी ना
    चोखे की दुकान है,
    पेप्सी कोला हीं मिलते
    जब आते मेहमान हैं।
    =======
    मजदूर हो किसान हो
    या कि हो खेतिहर ,
    मेरे गाँव में होने लगा है
    शामिल थोड़ा शहर।
    =======
    आँगन की तुलसी अब
    सुखी है काली है,
    है उड़हुल में जाले ना
    गमलों में लाली है।
    =======
    केला भी झुलसा सा
    ईमली भी कटहर ,
    मेरे गाँव में होने लगा है
    शामिल थोड़ा शहर।
    =======
    बच्चे सब छप छप कर
    पोखर में गाँव,
    खेतिहर के खेतों में
    नचते थे पाँव।
    =======
    अब नदिया भी सुनी सी
    पोखर भी नहर,
    मेरे गाँव में होने लगा है
    शामिल थोड़ा शहर।
    =======
    विकास का असर क्या है
    ये भी है जाना,
    बिक गई मिट्टी बन
    ईट ये पहचाना,
    =======
    पक्की हुई मड़ई
    गायब हुए हैं खरहर ,
    मेरे गाँव में होने लगा है
    शामिल थोड़ा शहर।
    =======
    फ़िज़ा में बढ़ता धुँआ है
    और थोड़ा सा जहर,
    मेरे गाँव में होने लगा है
    शामिल थोड़ा शहर।
    =======
    अजय अमिताभ सुमन:
    सर्वाधिकार सुरक्षित
    ========

  • दुर्योधन कब मिट पाया:भाग:37

    =========
    महाभारत युद्ध के समय द्रोणाचार्य की उम्र लगभग चार सौ साल की थी। उनका वर्ण श्यामल था, किंतु सर से कानों तक छूते दुग्ध की भाँति श्वेत केश उनके मुख मंडल की शोभा बढ़ाते थे। अति वृद्ध होने के बावजूद वो युद्ध में सोलह साल के तरुण की भांति हीं रण कौशल का प्रदर्शन कर रहे थे। गुरु द्रोण का पराक्रम ऐसा था कि उनका वध ठीक वैसे हीं असंभव माना जा रहा था जैसे कि सूरज का धरती पर गिर जाना, समुद्र के पानी का सुख जाना। फिर भी जो अनहोनी थी वो तो होकर हीं रही। छल प्रपंच का सहारा लेने वाले दुर्योधन का युद्ध में साथ देने वाले गुरु द्रोण का वध छल द्वारा होना स्वाभाविक हीं था।
    =========
    उम्र चारसौ श्यामलकाया
    शौर्योगर्वित उज्ज्वल भाल,
    आपाद मस्तक दुग्ध दृश्य
    श्वेत प्रभा समकक्षी बाल।
    ========
    वो युद्धक थे अति वृद्ध पर
    पांडव जिनसे चिंतित थे,
    गुरुद्रोण सेअरिदल सैनिक
    भय से आतुर कंपित थे।
    =========
    उनको वधना ऐसा जैसे
    दिनकर धरती पर आ जाए,
    सरिता हो जाए निर्जल कि
    दुर्भिक्ष मही पर छा जाए।
    =========
    मेरुपर्वत दौड़ पड़े अचला
    किंचित कहीं इधर उधर,
    देवपति को हर ले क्षण में
    सूरमा कोई कहाँ किधर?
    =========
    ऐसे हीं थे द्रोणाचार्य रण
    कौशल में क्या ख्याति थी,
    रोक सके उनको ऐसे कुछ
    हीं योद्धा की जाति थी।
    =========
    शूरवीर कोई गुरु द्रोण का
    मस्तक मर्दन कर लेगा,
    ना कोई भी सोच सके
    प्रयुत्सु गर्दन हर लेगा।
    =========
    किंतु जब स्वांग रचा द्रोण
    का मस्तक भूमि पर लाए,
    धृष्टद्युम्न हर्षित होकर जब
    समरांगण में चिल्लाए।
    =========
    पवनपुत्र जब करते थे रण
    भूमि में चंड अट्टाहस,
    पांडव के दल बल में निश्चय
    करते थे संचित साहस।
    =========
    गुरु द्रोण के जैसा जब
    अवरक्षक जग को छोड़ चला,
    जो अपनी छाया से रक्षण
    करता था मग छोड़ छला।
    =========
    तब वो ऊर्जा कौरव दल में
    जो भी किंचित छाई थी,
    द्रोण के आहत होने से
    निश्चय अवनति हीं आई थी।
    =========
    अजय अमिताभ सुमन
    सर्वाधिकार सुरक्षित

  • मेरे गाँव में होने लगा है शामिल थोड़ा शहर [प्रथम भाग】

    इस सृष्टि में कोई भी वस्तु बिना कीमत के नहीं आती, विकास भी नहीं। अभी कुछ दिन पहले एक पारिवारिक उत्सव में शरीक होने के लिए गाँव गया था। सोचा था शहर की दौड़ धूप वाली जिंदगी से दूर एक शांति भरे माहौल में जा रहा हूँ। सोचा था गाँव के खेतों में हरियाली के दर्शन होंगे। सोचा था सुबह सुबह मुर्गे की बाँग सुनाई देगी, कोयल की कुक और चिड़ियों की चहचहाहट सुनाई पड़ेगी। आम, महुए, अमरूद और कटहल के पेड़ों पर उनके फल दिखाई पड़ेंगे। परंतु अनुभूति इसके ठीक विपरीत हुई। शहरों की प्रगति का असर शायद गाँवों पर पड़ना शुरू हो गया है। इस कविता के माध्यम से मैं अपनी इन्हीं अनुभूतियों को साझा कर रहा हूँ। प्रस्तुत है मेरी कविता “मेरे गाँव में होने लगा है शामिल थोड़ा शहर” का प्रथम भाग।

    मेरे गाँव में होने लगा है शामिल थोड़ा शहर
    [प्रथम भाग】

    मेरे गाँव में होने लगा है,
    शामिल थोड़ा शहर,
    फ़िज़ा में बढ़ता धुँआ है ,
    और थोड़ा सा जहर।
    ——–
    मचा हुआ है सड़कों पे ,
    वाहनों का शोर,
    बुलडोजरों की गड़गड़ से,
    भरी हुई भोर।
    ——–
    अब माटी की सड़कों पे ,
    कंक्रीट की नई लहर ,
    मेरे गाँव में होने लगा है,
    शामिल थोड़ा शहर।
    ———
    मुर्गे के बांग से होती ,
    दिन की शुरुआत थी,
    तब घर घर में भूसा था ,
    भैसों की नाद थी।
    ——–
    अब गाएँ भी बछड़े भी ,
    दिखते ना एक प्रहर,
    मेरे गाँव में होने लगा है ,
    शामिल थोड़ा शहर।
    ——–
    तब बैलों के गर्दन में ,
    घंटी गीत गाती थी ,
    बागों में कोयल तब कैसा ,
    कुक सुनाती थी।
    ——–
    अब बगिया में कोयल ना ,
    महुआ ना कटहर,
    मेरे गाँव में होने लगा है ,
    शामिल थोड़ा शहर।
    ——–
    पहले सरसों के दाने सब ,
    खेतों में छाते थे,
    मटर की छीमी पौधों में ,
    भर भर कर आते थे।
    ——–
    अब खोया है पत्थरों में ,
    मक्का और अरहर,
    मेरे गाँव में होने लगा है ,
    शामिल थोड़ा शहर।
    ——–
    महुआ के दानों की ,
    खुशबू की बात क्या,
    आमों के मंजर वो ,
    झूमते दिन रात क्या।
    ——–
    अब सरसों की कलियों में ,
    गायन ना वो लहर,
    मेरे गाँव में होने लगा है ,
    शामिल थोड़ा शहर।
    ——–
    वो पानी में छप छप ,
    कर गरई पकड़ना ,
    खेतों के जोतनी में,
    हेंगी पर चलना।
    ——–
    अब खेतों के रोपनी में ,
    मोटर और ट्रेक्टर,
    मेरे गाँव में होने लगा है ,
    शामिल थोड़ा शहर।
    ——–
    फ़िज़ा में बढ़ता धुँआ है ,
    और थोड़ा सा जहर।
    मेरे गाँव में होने लगा है,
    शामिल थोड़ा शहर।
    ——–
    अजय अमिताभ सुमन
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  • दुर्योधन कब मिट पाया:भाग:36

    द्रोण को सहसा अपने पुत्र अश्वत्थामा की मृत्यु के समाचार पर विश्वास नहीं हुआ। परंतु ये समाचार जब उन्होंने धर्मराज के मुख से सुना तब संदेह का कोई कारण नहीं बचा। इस समाचार को सुनकर गुरु द्रोणाचार्य के मन में इस संसार के प्रति विरक्ति पैदा हो गई। उनके लिये जीत और हार का कोई मतलब नहीं रह गया था। इस निराशा भरी विरक्त अवस्था में गुरु द्रोणाचार्य ने अपने अस्त्रों और शस्त्रों का त्याग कर दिया और युद्ध के मैदान में ध्यानस्थ होकर बैठ गए। आगे क्या हुआ देखिए मेरी दीर्घ कविता दुर्योधन कब मिट पाया के छत्तीसवें भाग में।

    ——-
    भीम के हाथों मदकल,
    अश्वत्थामा मृत पड़ा,
    धर्मराज ने झूठ कहा,
    मानव या कि गज मृत पड़ा।
    ——-
    और कृष्ण ने उसी वक्त पर ,
    पाञ्चजन्य बजाया था,
    गुरु द्रोण को धर्मराज ने ,
    ना कोई सत्य बताया था।
    ——–
    अर्द्धसत्य भी असत्य से ,
    तब घातक बन जाता है,
    धर्मराज जैसों की वाणी से ,
    जब छन कर आता है।
    ——–
    युद्धिष्ठिर के अर्द्धसत्य को ,
    गुरु द्रोण ने सच माना,
    प्रेम पुत्र से करते थे कितना ,
    जग ने ये पहचाना।
    ———
    होता ना विश्वास कदाचित ,
    अश्वत्थामा मृत पड़ा,
    प्राणों से भी जो था प्यारा ,
    यमहाथों अधिकृत पड़ा।
    ———
    मान पुत्र को मृत द्रोण का ,
    नाता जग से छूटा था,
    अस्त्र शस्त्र त्यागे थे वो ना ,
    जाने सब ये झूठा था।
    ———
    अगर पुत्र इस धरती पे ना ,
    युद्ध जीतकर क्या होगा,
    जीवन का भी मतलब कैसा ,
    हारजीत का क्या होगा?
    ———
    यम के द्वारे हीं जाकर किंचित ,
    मैं फिर मिल पाऊँगा,
    शस्त्र त्याग कर बैठे शायद ,
    मर कामिल हो पाऊँगा।
    ———-
    धृष्टदयुम्न के हाथों ने फिर ,
    कैसा वो दुष्कर्म रचा,
    गुरु द्रोण को वधने में ,
    नयनों में ना कोई शर्म बचा।
    ———-
    शस्त्रहीन ध्यानस्थ द्रोण का ,
    मस्तकमर्दन कर छल से,
    पूर्ण किया था कर्म असंभव ,
    ना कर पाता जो बल से।
    ———-
    अजय अमिताभ सुमन
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  • अखबार के खास

    समाज की बेहतरी की दिशा में आप कोई कार्य करें ना करे परन्तु कार्य करने के प्रयासों का प्रचार जरुर करें। आपके झूठे वादों , भ्रमात्मक वायदों , आपके प्रयासों की रिपोर्टिंग अखबार में होनी चाहिए। समस्या खत्म करने की दिशा में गर कोई करवाई ना की गई हो तो राह में आने वाली बाधाओं का भान आम जनता को कराना बहुत जरुरी है। आपके कार्य बेशक हातिमताई की तरह नहीं हो लेकिन आपके चाहनेवालों की नजर में आपको हातिमताई बने हीं रहना है। कुल मिलाकर ये कहा जा सकता है कि सारा मामला मार्केटिंग का रह गया है । जो अपनी बेहतर ढंग से मार्केटिंग कर पाता है वो ही सफल हो पाता है, फिर चाहे वो राजनीति हो या कि व्यवसाय।
    =========
    वाह भैया क्या बात हो गए,
    अखबार-ए-सरताज हो गए।
    कल तक भईया फूलचंद थे,
    आज हातिम के बाप हो गए।
    =========
    गढ्ढे में हीं रोड पड़ा था,
    पानी बदबू सड़ा पड़ा था,
    नाली से पानी जो बहता ,
    सड़कों पे सलता हीं रहता।
    ==========
    चलना मुश्किल हुआ बड़ा था,
    भईया को ना फिक्र पड़ा था।
    नाक दबा के भईया चलते,
    पानी से बच बच कर रहते।
    ==========
    पर चुनाव के दिन जब आते,
    कचड़े भईया के मन भाते,
    टोपी धर सर हाथ कुदाल ,
    जर्नलिस्ट लाते तत्काल ।
    ==========
    झाड़ू वाड़ू लगा लगा के,
    कूड़े कचड़े हटा हटा के,
    खुर्पी वुर्पी चला चला के,
    ठीक पोज़ में दिखा दिखा के।
    ==========
    फ़ोटो खूब खिचाते भईया,
    सबपे छा जाते तब भईया,
    पंद्रह लाख दे देंगे पैसे ,
    फ्री वाई फाई के हीं जैसे,
    ==========
    रोजगार की बातें करते,
    झाड़ू जाके चौक लगाते।
    वादे कर आते फिर ऐसे,
    जनता के मन भाते वैसे।
    ==========
    अपने मन की बात बताते,
    अखबारों में न्यूज़ छपाते ।
    सपने सब्ज दिखलाते भईया ,
    जनता को भरमाते भईया,
    ==========
    अच्छे हैं भईया जतलाकर ,
    पार्टी को ये सब दिखलाकर।
    जन प्रत्याशी खास हो गए,
    वाह भैया क्या बात हो गए।
    ===========
    अखबार-ए-सरताज हो गए,
    कल तक भईया फूलचंद थे,
    आज हातिम के बाप हो गए,
    वाह भैया क्या बात हो गए।
    ===========
    अजय अमिताभ सुमन:
    सर्वाधिकार सुरक्षित

  • दुर्योधन कब मिट पाया:भाग:35

    किसी व्यक्ति के जीवन का लक्ष्य जब मृत्यु के निकट पहुँच कर भी पूर्ण हो जाता है तब उसकी मृत्यु उसे ज्यादा परेशान नहीं कर पाती। अश्वत्थामा भी दुर्योधनको एक शांति पूर्ण मृत्यु प्रदान करने की ईक्छा से उसको स्वयं द्वारा पांडवों के मारे जाने का समाचार सुनाता है, जिसके लिए दुर्योधन ने आजीवन कामना की थी । युद्ध भूमि में घायल पड़ा दुर्योधन जब अश्वत्थामा के मुख से पांडवों के हनन की बात सुनता है तो उसके मानस पटल पर सहसा अतित के वो दृश्य उभरने लगते हैं जो गुरु द्रोणाचार्य के वध होने के वक्त घटित हुए थे। अब आगे क्या हुआ , देखते हैं मेरी दीर्घ कविता “दुर्योधन कब मिट पाया” के इस 35 वें भाग में।
    ============
    जिस मानव का सिद्ध मनोरथ
    मृत्यु क्षण होता संभव,
    उस मानव का हृदय आप्त ना
    हो होता ये असंभव।
    ============
    ना जाने किस भाँति आखिर
    पूण्य रचा इन हाथों ने ,
    कर्ण भीष्म न कर पाए वो
    कर्म रचा निज हाथों ने।
    ===========
    मुझको भी विश्वास ना होता
    है पर सच बतलाता हूँ,
    जिसकी चिर प्रतीक्षा थी
    तुमको वो बात सुनाता हूँ।
    ===========
    तुमसे पहले तेरे शत्रु का
    शीश विच्छेदन कर धड़ से,
    कटे मुंड अर्पित करता हूँ,
    अधम शत्रु का निजकर से।
    ===========
    सुन मित्र की बातें दुर्योधन के
    मुख पे मुस्कान फली,
    मनो वांछित सुनने को हीं
    किंचित उसमें थी जान बची।
    ===========
    कैसी भी थी काया उसकी
    कैसी भी वो जीर्ण बची ,
    पर मन के अंतर तम में तो
    अभिलाषा कुछ क्षीण बची।
    ==========
    क्या कर सकता अश्वत्थामा
    कुरु कुंवर को ज्ञात रहा,
    कैसे कैसे अस्त्र शस्त्र
    अश्वत्थामा को प्राप्त रहा।
    =========
    उभर चले थे मानस पट पे
    दृश्य कैसे ना मन माने ,
    गुरु द्रोण के वधने में क्या
    धर्म हुआ था सब जाने।
    =========
    लाख बुरा था दुर्योधन पर
    सच पे ना अभिमान रहा ,
    धर्मराज सा सच पे सच में
    ना इतना सम्मान रहा।
    =========
    जो छलता था दुर्योधन पर
    ताल थोक कर हँस हँस के,
    छला गया छलिया के जाले
    में उस दिन फँस फँस के।
    =========
    अजय अमिताभ सुमन
    सर्वाधिकार सुरक्षित

  • किस राह के हो अनुरागी

    ईश्वर किसी एक धर्म , किसी एक पंथ या किसी एक मार्ग का गुलाम नहीं। अपने धर्म को सर्वश्रेष्ठ मानने से ज्यादा अप्रासंगिक मान्यता कोई और हो हीं नहीं सकती । परम तत्व को किसी एक धर्म या पंथ में बाँधने की कोशिश करने वालों को ये ज्ञात होना चाहिए कि ईश्वर इतना छोटा नहीं है कि उसे किसी स्थान , मार्ग , पंथ , प्रतिमा या किताब में बांधा जा सके। वास्तविकता तो ये है कि ईश्वर इतना विराट है कि कोई किसी भी राह चले सारे के सारे मार्ग उसी की दिशा में अग्रसित होते हैं।

    किस राह के हो अनुरागी ,
    देहासक्त हो या कि त्यागी?
    जीवन का क्या हेतु परंतु ,
    चित्त में इसका भान रहे ,
    किंचित कोई परिणाम रहे,
    किंचित कोई परिणाम रहे।

    है प्रयास में अणुता तो क्या,
    ना राह में ऋजुता तो क्या?
    प्रभु की अभिलाषा में किंतु ,
    ना हो लघुता ध्यान रहे ,
    किंचित कोई परिणाम रहे,
    किंचित कोई परिणाम रहे।

    कितनी प्रज्ञा धूमिल हुई है ?
    अंतस्यंज्ञा घूर्मिल हुई है ?
    अंतर पथ अवरोध पड़ा ,
    कैसा किंतु अनुमान रहे ,
    किंचित कोई परिणाम रहे,
    किंचित कोई परिणाम रहे।

    बुद्धि शुद्धि या तय कर लो ,
    वाक्शुद्धि चित्त लय कर लो ,
    दिशा भ्रांत हो बैठो ना मन,
    संशुद्धि संधान रहे ,
    किंचित कोई परिणाम रहे,
    किंचित कोई परिणाम रहे।

    कर्मयोग कहीं राह सही है ,
    भक्ति की कहीं चाह बड़ी है,
    जिसकी जैसी रही प्रकृत्ति ,
    वैसा हीं निदान रहे।
    किंचित कोई परिणाम रहे,
    किंचित कोई परिणाम रहे।

    अजय अमिताभ सुमन:
    सर्वाधिकार सुरक्षित

  • सत्य भाष

    सत्य भाष पर जब भी मानव,
    देता रहता अतुलित जोर।
    समझो मिथ्या हुई है हावी,
    और हुआ है सत कमजोर।

    अजय अमिताभ सुमन

  • क्यों सत अंतस दृश्य नहीं

    सृष्टि के कण कण में व्याप्त होने के बावजूद परम तत्व, ईश्वर  या सत , आप उसे जिस भी नाम से पुकार लें, एक मानव की अंतर दृष्टि में क्यों नहीं आता? सुख की अनुभूति प्रदान करने की सम्भावना से परिपूर्ण होने के बावजूद ये संसार , जो कि परम ब्रह्म से ओत प्रोत है , आप्त है ,व्याप्त है, पर्याप्त है, मानव को अप्राप्त क्यों है? सत जो कि मानव को आनंद, परमानन्द से ओत प्रोत कर सकता है, मानव के लिए संताप देने का कारण कैसे बन जाता है?  इस गूढ़ तथ्य पर विवेचन करती हुई  प्रस्तुत है मेरी कविता “क्यों सत अंतस दृश्य नहीं?”

    क्यों सत अंतस दृश्य नहीं,
    क्यों भव उत्पीड़क ऋश्य मही?   
    कारण है जो भी सृष्टि में,
    जल, थल ,अग्नि या वृष्टि में।
    …………..
    जो है दृष्टि में दृश्य मही,
    ना वो सत सम सादृश्य कहीं। 
    ज्यों मीन रही है सागर में,
    ज्यों मिट्टी होती गागर में।
    ……………
    ज्यों अग्नि में है ताप फला,
    ज्यों वायु में आकाश चला।
    ज्यों कस्तूरी ले निज तन में,
    ढूंढे मृग इत उत घन वन में। 
    ……………
    सत गुप्त कहाँ अनुदर्शन को,
    नर सुप्त किन्तु विमर्शन को।
    अभिदर्शन का कोई भान नहीं,
    सत उद्दर्शन का ज्ञान नहीं।
    …………….
    नीर भांति लब्ध रहा तन को,
    पर ना उपलब्ध रहा मन को।
    सत आप्त रहा ,पर्याप्त रहा,
    जगव्याप्त किंतु अनवाप्त रहा।
    ……………..
    ना ऐसा भी है कुछ जग में,
    सत से विचलित हो जो जग में।
    सत में हीं सृष्टि दृश्य रही,
    सत से कुछ भी अस्पृश्य नहीं।
    ……………..
    मानव ये जिसमे व्यस्त रहा,
    कभी तुष्ट रुष्ट कभी त्रस्त रहा।
    माया साया मृग तृष्णा थी,
    नर को ईक्छित वितृष्णा थी।
    …………….. 
    किस भांति माया को जकड़े ,
    छाया को हाथों से पकड़े?
    जो पार अवस्थित ईक्छा के,
    वरने को कैसी दीक्षा ले?
    ……………… 
    मानव शासित प्रतिबिम्ब देख,
    किंतु सत सत है बिम्ब एक।
    मानव दृष्टि में दर्पण है,
    ना अभिलाषा का तर्पण है।
    ………………
    फिर सत परिदर्शन कैसे हो ,
    दर्पण में क्या अभिदर्शन हो ?
    इस भांति सत विमृश्य रहा,
    अपरिभाषित अदृश्य रहा।
    ……………….
    अजय अमिताभ सुमन:
    सर्वाधिकार सुरक्षित

  • साँप की हँसी होती कैसी

    जब देश के किसी हिस्से में हिंसा की आग भड़की हो , अपने हीं देश के वासी अपना घर छोड़ने को मजबूर हो गए हो  और जब अपने हीं देश मे पराये बन गए इन बंजारों की बात की जाए तो क्या किसी व्यक्ति के लिए ये हँसने या आलोचना करने का अवसर हो सकता है? ऐसे व्यक्ति को जो इन परिस्थितियों में भी विष वमन करने से नहीं चूकते  क्या इन्हें  सर्प की उपाधि देना अनुचित है ? ऐसे हीं महान विभूतियों के चरण कमलों में सादर नमन करती हुई प्रस्तुत है मेरी व्ययंगात्मक कविता “साँप की हँसी होती कैसी”?

    ——-
    साँप की हँसी होती कैसी,
    शोक मुदित पिशाच के जैसी।
    जब देश पे दाग लगा हो,
    रक्त पिपासु काग लगा हो।
    ——–
    जब अपने हीं भाग रहे हो,
    नर अंतर यम जाग रहे हो।
    नारी के तन करते टुकड़े,
    बच्चे भय से रहते अकड़े।
    ——–
    जब अपने घर छोड़ के भागे,
    बंजारे बन फिरे अभागे।
    और इनकी बात चली तब,
    बंजारों की बात चली जब।
    ——–
    तब कोई जो हँस सकता हो,
    विषदंतों से डंस सकता हो।
    जिनके उर में दया नहीं हो,
    ममता करुणा हया नहीं हो।
    ——–
    जो नफरत की समझे भाषा,
    पीड़ा में वोटों की आशा।
    चंड प्रचंड अभिशाप के जैसी,
    ऐसे नरपशु आप के जैसी।
    ——–
    अजय अमिताभ सुमन
    सर्वाधिकार सुरक्षित

  • क्या क्या काम बताओगे तुम

    मर्यादा पालन करने की शिक्षा लेनी हो तो प्रभु श्रीराम से बेहतर कोई उदाहरण नहीं हो सकता। कौन सी ऐसी मर्यादा थी जिसका पालन उन्होंने नहीं किया ? जनहित को उन्होंने हमेशा निज हित सर्वदा उपर रखा। परंतु कुछ संस्थाएं उनके नाम का उपयोग निजस्वार्थ सिद्धि हेतू कर रही हैं। निजहित को जनहित के उपर रखना उनके द्वारा अपनाये गए आदर्शो के विपरीत है। राम नाम का उपयोग निजस्वार्थ सिद्धि हेतु करने की प्रवृत्ति के विरुद्ध प्रस्तुत है मेरी कविता “क्या क्या काम बताओगे तुम”।
    ———
    क्या क्या काम बताओगे तुम,
    राम नाम पे राम नाम पे?
    अपना काम चलाओगे तुम,
    राम नाम पे राम नाम पे?
    ———
    डीजल का भी दाम बढ़ा है,
    धनिया ,भिंडी भाव चढ़ा है।
    कुछ तो राशन सस्ता कर दो ,
    राम नाम पे, राम नाम पे।
    ———-
    कहने को तो छोटी रोटी,
    पर खुद पर जब आ जाये।
    सिंहासन ना चल पाता फिर ,
    राम नाम पे राम नाम पे।
    ———-
    पूजा भक्ति बहुत भली पर,
    रोजी रोटी काम दिखाओ।
    क्या क्या चुप कराओगे तुम ,
    राम नाम पे राम नाम पे।
    ———–
    माना जनता बहली जाती,
    कुछ दिन काम चलाते जाओ।
    पर कब तक तुम फुसलाओगे,
    राम नाम पे राम नाम पे?
    ———–
    अजय अमिताभ सुमन:
    सर्वाधिकार सुरक्षित

  • अफसोस शहीदों का

    चन्द्रशेखर आजाद, भगत सिंह, राज गुरु, सुखदेव, बटुकेश्वर दत्त, खुदी राम बोस, मंगल पांडे इत्यादि अनगिनत वीरों ने स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई में हंसते हंसते अपनी जान को कुर्बान कर दिया। परंतु ये देश ऐसे महान सपूतों के प्रति कितना संवेदनशील है आज। स्वतंत्रता की बेदी पर हँसते हँसते अपनी जान न्यौछावर करने वाले इन शहीदों को अपनी गुमनामी पर पछताने के सिवा क्या मिल रहा है इस देश से? शहीदों के प्रति उदासीन रवैये को दॄष्टिगोचित करती हुई प्रस्तुत है मेरी कविता “अफसोस शहीदों का”।

    स्वतंत्रता का नवल पौधा,
    रक्त से निज सींचकर।
    था बचाया देश अपना,
    धर कफन तब शीश पर।
    ………….
    मिट ना जाए ये वतन कहीं ,
    दुश्मनों की फौज से।
    चढ़ गए फाँसी के फंदे ,
    पर बड़े हीं मौज से।
    ……………
    आज ऐसा दौर आया,
    देश जानता नहीं।
    मिट गए थे जो वतन पे,
    पहचानता नहीं।
    …………….
    सोचता हूँ देश पर क्यों ,
    मिट गए क्या सोचकर।
    आखिर उनको दे रहा क्या,
    देश बस अफसोस कर।
    ……………..
    अजय अमिताभ सुमन:
    सर्वाधिकार सुरक्षित

  • मृग तृष्णा

    मृग तृष्णा

    मृग तृष्णा समदर्शी सपना ,
    भव ऐसा बुद्धों का कहना।
    था उनका अनुभव खोल गए,
    अंतर अनुभूति बोल गए।
    ……….
    पर बोध मेरा कुछ और सही,
    निज प्रज्ञा कहती और रही।
    जब प्रेमलिप्त हो आलिंगन,
    तब हो जाता है पुलकित मन।
    ……….
    और शत्रु से उर हो कलुषित ,
    किंतु मित्र से हर्षित हो मन।
    चाटें भी लगते हैं मग में ,
    काँटें भी चुभतें हैं पग में।
    ……….
    वो हीं जाने क्या मिथ्या डग में,
    ऐसा क्यों कहते इस मग में?
    पर मेरी नज़रों में सच्चा ,
    लहू लाल बहता जो रग में?
    ……….
    अजय अमिताभ सुमन
    सर्वाधिकार सुरक्षित

  • डेमोक्रेटिक बग

    प्रजातांत्रिक व्यवस्था में पूंजीपति आम जनता के कीमती वोट का शिकार चंद रुपयों का चारा फेंक बड़ी आसानी से कर लेते हैं। काहे का प्रजातंत्र है ये ?

    हर पांच साल पर प्यार जताने,
    आ जाते ये धीरे से,

    आलिशान राजमहल निवासी,
    छा जाते ये धीरे से।

    जब भी जनता शांत पड़ी हो,
    जन के मन में अमन बसे,

    इनको खुजली हो जाती,
    जुगाड़ लगाते धीरे से।

    इनके मतलब दीन नहीं,
    दीनों के वोटों से मतलब ,

    जो भी मिली हुई है झट से,
    ले लेते ये धीरे से।

    मदिरा का रसपान करा के,
    वादों का बस भान करा के,

    वोटों की अदला बदली,
    नोटों से करते धीरे से।

    झूठे सपने सजा सजा के,
    जाले वाले रचा रचा के,

    मकड़ी जैसे हीं मकड़ी का,
    जाल बिछाते धीरे से।

    यही देश में आग लगाते.
    और राख की बात फैलाते ,

    प्रजातंत्र के दीमक है सब,
    खा जाते ये धीरे से।

    अजय अमिताभ सुमन

  • गरल

    हृदय प्रभु ने सरल दिया था,
    प्रीति युक्त चित्त तरल दिया था,
    स्नेह सुधा से भरल दिया था ,
    पर जब जग ने गरल दिया था,
    द्वेष ओत-प्रोत करल दिया था ,
    तब मैंने भी प्रति उत्तर में ,
    इस जग को विष खरल दिया था,
    प्रेम मार्ग का पथिक किंतु मैं ,
    अगर जरुरत निज रक्षण को,
    कालकूट भी मैं रचता हूँ,
    हौले कविता मैं गढ़ता हूँ,
    हौले कविता मैं गढ़ता हूँ।

    अजय अमिताभ सुमन
    सर्वाधिकार सुरक्षित

  • दुर्योधन कब मिट पाया:भाग-34

    जो तुम चिर प्रतीक्षित  सहचर  मैं ये ज्ञात कराता हूँ,
    हर्ष  तुम्हे  होगा  निश्चय  ही प्रियकर  बात बताता हूँ।
    तुमसे  पहले तेरे शत्रु का शीश विच्छेदन कर धड़ से,
    कटे मुंड अर्पित करता हूँ अधम शत्रु का निज कर से।

    सुन  मित्र की बातें दुर्योधन के मुख पे  मुस्कान फली,
    मनोवांछित सुनने को हीं किंचित उसमें थी जान बची।
    कैसी  भी  थी  काया  उसकी कैसी भी वो जीर्ण बची ,
    पर मन  के अंतरतम में तो थोड़ी   आशा क्षीण बची।

    क्या कर सकता अश्वत्थामा कुरु कुंवर को ज्ञात रहा,
    कैसे  कैसे  अस्त्र  शस्त्र में  द्रोण  पुत्र  निष्णात रहा।
    स्मृति में  याद आ रहा जब गुरु द्रोण का शीश  कटा ,
    धृष्टदयुम्न  के  हाथों  ने था  कैसा  वो  दुष्कर्म  रचा।

    जब शल्य के उर में  छाई थी शंका भय और निराशा,
    और कर्ण भी भाग चला था त्याग वीरता और आशा।
    जब सूर्यपुत्र  कृतवर्मा के   समर क्षेत्र ना टिकते पाँव,
    सेना सारी भाग  चली   ना दुर्योधन को दिखता ठांव।

    द्रोणाचार्य के मर जाने पर  कैसा वो नैराश्य मचा था,
    कृपाचार्य भी भाग चले थे दुर्योधन भी भाग चला था।
    जब कौरवों  में मचा हुआ था  घोर निराशा हाहाकार,
    अश्वत्थामा पर  लगा हुआ  था शत्रु का करने संहार।

    अति शक्ति संचय कर उसने तब निज हाथ बढ़ाया,
    पाँच  कटे   हुए नर  मस्तक  थे निज   हाथ  दबाया।
    पीपल   के   पत्तों  जैसे  थे  सर सब फुट पड़े थे  वो,
    वो  पांडव  के सर ना हो सकते ऐसे टूट पड़े थे जो ।

    दुर्योधन के मन में क्षण को जो भी थोड़ी आस जगी,
    मरने मरने को हतभागी पर किंचित थी श्वांस फली।
    धुल धूसरित होने को थे स्वप्न दृश ज्यो दृश्य जगे  ,
    शंका के अंधियारे बादल आ आके थे फले फुले।

    माना भीम नहीं था ऐसा कि मेरे मन को वो  भाये ,
    और नहीं खुद  पे  मैं उसके पड़ने   देता था साए।
    माना उसकी मात्र उपस्थिति मन को मेरे जलाती थी,
    देख  देख   ना  सो  पाता   था   दर्पोंन्नत  जो  छाती थी।

    पर उसके तन के बल को भी मै जो थोड़ा  सा  जानू ,
    इतनी बार लड़ा हूँ उससे कुछ  तो  मैं भी  पहचानू  ।
    क्या भीम का सर भी ऐसे हो सकता  इतना कोमल?
    और पार्थ  की  शक्ति कैसे हो सकती  ऐसे ओझल?

    अश्वत्थामा मित्र तुम्हारी शक्ति अजय का  ज्ञान मुझे,
    जो कुछ तुम कर सकते हो उसका है अभिमान मुझे।
     पर  युद्धिष्ठिर और  नकुल  है  वासुदेव  के  रक्षण में,
    किस भांति तुम जीत गए जीवन के उनके भक्षण में?

    तिमिर  घोर  अंधेरा  छाया  निश्चित कोई  भूल हुई है,
    निश्चित हीं  किस्मत  में मेरे धँसी हुई सी  शूल हुई है।
    फिर  दीर्घ  स्वांस लेकर दुर्योधन  हौले से ये  बोला,
    है  चूक  नहीं तेरी  किंचित पर ये कैसा कर डाला?

    इतने  कोमल नर मुंड  ना पांडव के  हो सकते हैं?
    पांडव  पुत्रों   के  कपाल   ऐसे कच्चे हो  सकते हैं।
    ये  कपाल  ना  पांडव  के  जो आ जाए यूँ तेरे हाथ,
    आसां ना  संधान  लक्ष्य का ना आये वो  तेरे  हाथ।

    थे दुर्योधन  के  मन के शंका  बादल न  यूँ निराधार,
    अनुभव जनित  तथ्य घटित ना कोई वहम विचार।
    दुर्योधन  के  इस वाक्य से सत्य हुआ ये उद्घाटित,
    पांडव पुत्रों का हनन हुआ यही तथ्य था सत्यापित।

    ये जान कर अश्वत्थामा  उछल पड़ा था भूपर  ऐसे ,
    जैसे आन पड़ी बिजली उसके हीं मस्तक पर जैसे।
    क्षण को पैरों के नीचे की धरती हिलती जान पड़ी ,
    जो समक्ष था आँखों के उड़ती उड़ती सी भान पड़ी।

    शायद पांडव के जीवन में कुछ क्षण और बचे होंगे,
    या  उसके  हीं  कर्मों  ने   दुर्भाग्य   दोष    रचे  होंगे।
    या उसकी प्रज्ञा  को  घेरे  प्रतिशोध की ज्वाला थी,
    लक्ष्य भेद ना कर पाया किस्मत में विष प्याला थी।

    ऐसी भूल हुई उससे थी  क्षण को ना विश्वास हुआ,
    लक्ष्य चूक सी लगती थी गलती का एहसास हुआ।
    पल को तो हताश हुआ था पर संभला था एक पल में ,
    जिसकी आस नहीं थी उसको प्राप्त हुआ था फल में।

    जिस  कृत्य  से  धर्म  राज  ने  गुरु  द्रोण  संहार किया ,
    सही हुआ सब जिन्दे हैं ना सरल मृत्यु स्वीकार हुआ ।
    दुर्योधन हे मित्र कहें क्या पांडव को था ज्ञात नहीं,
    मैं अबतक हीं तो जिंदा था इससे पांडव अज्ञात नहीं।

    बड़े धर्म की भाषा कहते नाहक गौरव गाथा कहते,
    किस प्रज्ञा से अर्द्ध सत्य को जिह्वा पे धारण करते।
    जो गुरु खुद से ज्यादा भरोसा धर्म राज पे करते थे,
    पिता तुल्य गुरु द्रोण से कैसे धर्मराज छल रचते थे।

    और धृष्टद्युम्न वो पापी कैसा योद्धा पे संहार किया,
    पिता द्रोण निःशस्त्र हुए थे और सर पे प्रहार किया?
    हे मित्र दुर्योधन इस बात की ना पीड़ा किंचित मुझको,
    पिता युद्ध में योद्धा थे योद्धा की गति मिली उनको।

    पर जिस छल से धर्म राज ने गुरु द्रोण संहार किया,
    अब भी कहलाते धर्मराज पर दानव सा आचार किया।
    मैंने क्या अधर्म किया और पांडव नें क्या धर्म किया,
    जो भी किया था धर्मराज ने किंचित पशुवत धर्म किया।

    भीष्म पितामह गुरु द्रोण के ऐसे वध करने के बाद,
    सो सकते थे पांडव कैसे हो सकते थे क्यों आबाद।
    कैसा धर्म विवेचन उनका उल्लेखित वो न्याय विधान,
    जो  दुष्कर्म  रचे  जयद्रथ ने पिता कर रहे थे भुगतान।

    गर दुष्कृत्य रचाकर कोई खुद को कह पाता हो  वीर ,
    न्याय  विवेचन में  निश्चित  हीं  बाधा  पड़ी  हुई  गंभीर।
    अब जिस पीड़ा को हृदय लिए अश्वत्थामा चलता है ,
    ये देख  तुष्टि हो जाएगी  वो पांडव में भी फलता है ।

    पितृ घात के पितृ ऋण से कुछ तो पीड़ा कम होगी ,
    धर्म राज से अश्रु नयन से हृदय अग्नि कुछ नम होगी।
    अति पीड़ा होती थी उसको पर मन में हर्षाता था,
    हार गया था पांडव से पर दुर्योधन मुस्काता  था।

    हे अश्वत्थामा मेरे उर को भी कुछ ठंडक आती है ,
    टूट  गया  है  तन  मन मेरा पर दर्पोंनत्त छाती है।
    तुमने जो पुरुषार्थ किया निश्चित गर्वित होता हूँ,
    पर जिस कारण तू होता न उस कारण होता हूँ।

    तू हँसता तेरे कारण से मेरे निज पर कारण हैं ,
    जैसे  हर नर भिन्न भिन्न जैसे अक्षर उच्चारण है।
    कदा कदा हीं पूण्य भाव किंचित जो मन में आते थे,
    सोच पितृ संग अन्याय हुए ना सिंचित हीं हो पाते थे।

    जब  माता के नेत्र दृष्टि गोचित उर में ईर्षा होती,
    तन में मन में तपन घोर अंगारों की वर्षा होती।
    बचपन से मैंने पांडव को कभी नहीं भ्राता माना,
    शकुनि मामा से अक्सर हीं सहता रहता था ताना।

    जिसको  हठधर्मी कह कहकर आजीवन अपमान दिया,
    उर में भर इर्ष्या की ज्वाला और मन में  अभिमान  दिया।
    जो जीवन भर भीष्म ताप से दग्ध  आग को सहता था,
    पाप पुण्य की बात भला  बालक में कैसे  फलता था?

    तन   मन   में  लगी हुई  थी प्रतिशोध की जो  ज्वाला ,
    पांडव   सारे   झुलस  गए पीकर मेरे विष की हाला।
    ये तथ्य सत्य  है दुर्योधन  ने अनगिनत अनाचार सहे,
    धर्म पूण्य की बात वृथा  कैसे उससे धर्माचार फले ?

    हाँ  पिता रहे आजन्म अंध ना न्याय युक्त फल पाते थे ,
    कहने को आतुर सकल रहे पर ना कुछ भी कह पाते थे।
    ना कुछ  सहना  ना कुछ  कहना  ये कैसी  लाचारी थी ,
    वो विदुर  नीति आड़े आती अक्सर वो विपदा  भारी थी।

    वो जरासंध जिससे डरकर कान्हा मथुरा रण छोड़ चले,
    वो कर्ण सम्मुख था नतमस्तक सोचो कैसा वो वीर अहे।
    ऐसे वीर से जीवन भर जाति का ज्ञान बताते थे,
    ना कर्म क्षत्रिय का करते नाहक़ अभिमान सजाते थे।

    जो जीवन भर हाय हाय जाति से ही पछताता था,
    उस कर्ण मित्र के साये में पूण्य कहाँ फल पाता था।
    पास एक था कर्ण मित्र भी न्याय नहीं मिल पाता था?
    पिता दृश थी विवशता ना सह पाता कह पाता था  ।

    ऐसों के बीच रहा जो भी उससे क्या धर्म विजय होगा,
    जो आग के साए में जीता तो न्याय पूण्य का क्षय होगा।
    दुर्बुधि  दुर्मुख कहके  जिसका  सबने  उपहास  किया ,
    अग्न आप्त हो जाए किंचित बस थोड़ा  प्रयास किया।

    अग्न प्रज्वल्लित तबसे हीं जबसे निजघर पांडव आये,
    भीष्म  पितामह तात विदुर के प्राणों के बन के साये।
    जब  बन बेचारे महल पधारे थे सारे  वनवासी पांडव ,
    अंदेश  तब फलित हुआ था आगे होने  वाला तांडव।

    जभी पिता हो प्रेमासक्त अर्जुन को  गले लगाते थे,
    मेरे  तन  में मन मे क्षण अंगार फलित हो जाते थे।
    जब न्याय नाम पे मेरे पिता से जैसे पुरा राज लिए ,
    वो राज्य के थे अधिकारी पर ना सर पे ताज दिए।

    अन्याय हुआ था मेरे तात से डर था वैसा न हो जाए,
    विदुर नीति के मुझपे भी किंचित न पड़ जाए साए।
    डर तो था पहले हीं मन में और फलित हो जाता था,
    भीम दुष्ट  के  कुकर्मों से  और  त्वरित हो जाता था।

    अन्याय त्रस्त था तभी भीम को मैंने भीषण तरल दिया ,
    मुश्किल से बहला फुसला था महाचंड को गरल दिया।
    पर बच निकला भीम भाग्य से तो छल से अघात दिया,
    लक्षागृह की रचना की थी फिर भीषण प्रतिघात किया।

    बल से  ना पा सकता था छल से हीं बेशक काम किया ,
    जो मेरे तात का सपना था कबसे बेशक सकाम किया।
    दुर्योधन   मनमानी   करता  था अभिमानी  माना मैंने ,
    पर दूध धुले भी  पांडव  ना थे सच में हीं पहचाना मैंने।

    क्या  जीवन रचनेवाला  कभी सोच के जीवन रचता है,
    कोई  पुण्य  प्रतापी कोई पाप  अगन ले हीं  फलता है।
    कौरव पांडव सब कटे मरे क्या यही मात्र था प्रयोजन ,
    रचने वाले ने क्या सोच के किया युद्ध का आयोजन ?

    क्या पांडव सारे धर्मनिष्ठ और हम पापी थे बचपन से ?
    सारे कुकर्म फला करते क्या कौरव से लड़कपन से ?
    जिस  खेल  को  खेल  खेल  में  पांडव  खेला करते थे ,
    आग  जलाकर  बादल  बनकर  अग्नि  वर्षा  करते थे।

    हे मित्र कदापि ज्ञात तुम्हे भी माता के  हम भी प्यारे।
    माता  मेरी  धर्मनिष्ठ  फिर  क्यों हम  आँखों  के तारे ?
    धर्म  शेष कुछ मुझमे भी जो साथ रहा था मित्र कर्ण ,
    पांडव के मामा शल्य कहो क्यों साथ रहे थे दुर्योधन?

    अश्वत्थामा  मित्र  सुनो  हे  बात  तुझे सच  बतलाता हूँ  ,
    चित्त में पुण्य जगे थे किंचित फले नहीं मैं पछताता हूँ।
    हे मित्र जरा तुम  याद करो जब   चित्रसेन से हारा था,
    जब अर्जुन का धनुष बाण हीं  मेरा  बना सहारा था।

    तब मेरे भी मन मे भी क्षण को धर्म पूण्य का ज्ञान हुआ,
    अज्ञान हुआ था तिरोहित क्षय मेरा भी अभिमान हुआ।
    उस दिन मन में निज कुकर्मों का  थोड़ा  एहसास हुआ ,
    तज दूँ इस दुनिया को क्षण में क्षणभर को प्रयास हुआ।

    आत्म ग्लानि का ताप लिए अब विष हीं पीता रहता हूँ ,
    हे  अश्वत्थामा  ज्ञात  नहीं तुमको पर सच है  कहता हूँ।
    ऐसा  ना था  बचपन  से हीं  कोई कसम उठाई थी ,
    भीम ढीठ  से ना  जलता था उसने आग लगाई थी।

    मेरे  अनुजों    संग  जाने   कैसे  कुचक्र रचाता  था ,
    बालोचित ना क्रीड़ा थी भुजबल से इन्हें डराता था।
    प्रिय अनुजों की पीड़ा मुझसे  यूँ ना  देखी जाती थी ,
    भीम ढींठ  के कटु हास्य वो दर्प से उन्नत छाती थी।

    ऐसे  हीं  ना  भीम  सेन को मैंने विष का पान दिया ,
    उसने मेरे  भ्राताओं को किंचित हीं अपमान दिया।
    और पार्थ  बालक मे भी थी कौन पुण्य की अभिलाषा ,
    चित्त में निहित  निज स्वार्थ  ना कोई धर्म की पिपासा।

    डर का चित्त में भाग लिए वो दिनभर कम्पित रहता था ,
    बाहर से तो वो  शांत दिखा पर भीतर शंकित रहता था।
    ये डर हीं तो था उसका जब हम सारे सो जाते थे,
    छुप छुपकर संधान लगाता जब  तारे  खो जाते थे।

    छल में कपटी अर्जुन का भी ऐसा कम है नाम नहीं।
    गुरु द्रोण का कृपा पात्र बनना था उसका काम वहीं।
    मन में उसके क्या था उसके ये दुर्योधन तो जाने ना,
    पर इतना भी मूर्ख नहीं चित्त के अंतर  पहचाने ना।

    हे मित्र कहो ये न्याय कहाँ  उस अर्जुन के कारण हीं,
    एक्लव्य  अंगूठा  बलि  चढ़ा  ना  कोई  अकारण हीं।
    सोंचो गुरुवर ने पाप किया क्यों खुद को बदनाम किया ,
    जो सूरज जैसा उज्ज्वल हो फिर क्यों ऐसा अंजाम लिया?

    ये अर्जुन का था किया धरा  उसके मन में था जो  संशय,
    गुरु ने खुद पे लिया दाग ताकि अर्जुन चित्त रहे अभय।
    फिर निज महल में बुला बुला अंधे का बेटा कहती  थी  ,
    जो क्रोध अगन में जला बढ़ा उसपे घी  वर्षा करती  थी।

    मैं  चिर अग्नि  में जला  बढ़ा क्या  श्यामा को ज्ञान नहीं ,
    छोड़ो  ऐसे भी कोई भाभी  करती क्या अपमान कहीं?
    श्यामा का  जो  चिर  हरण था वो कारण जग जाहिर है,
    मृदु हास्य का खेल नहीं अपमान फलित डग बाहिर है।

    वो अंधापन हीं कारण था ना पिता मेरे महाराज बने,
    तात अति  थे बलशाली फिर भी पांडू अधिराज बने।
    दुर्योधन बस नाम नहीं  ये  दग्ध आग का शोला  था ,
    वर्षों से सिंचित ज्वाला थी कि अति भयंकर गोला था।

    उसी लाचारी को कहकर क्या ज्ञात कराना था उसको ?
    तृण जलने को तो ईक्षुक हीं क्यों आग लगाना था उसको?
    कि वो चौसर के खेल नही न मात्र खेल के पासे थे,
    शकुनि ने अपमान सहे थे एक अवसर के प्यासे थे।

    उस अवसर का कारण  मैं ना धर्मराज हीं कारण थे ,
    सुयोधन को समझे कच्चा  जीत लिए मन धारण थे।
    कैसे कोई कह सकता है दुर्योधन को व्याभिचारी ,
    जुए  का  व्यसनी धर्मराज चौसर उनकी हीं लाचारी।

    जब शकुनि मामा को खुद के बदले मैंने खेलाया था,
    खुद हीं पासे चलने को उनको किसने उकसाया था।
    ये धर्मराज का व्यसनी मन उनकी बुद्धि पर हावी था,
    चौसर खेले में धर्म नहीं उनका बस अहम प्रभावी था।

    वरना  जैसे कि चौसर में मामा  शकुनी  का ज्ञान लिया।
    वो नहीं कृष्ण को ले आये बस अपना अभिमान लिया।
    उसी मान के चलते हीं तो  हुआ श्यामा का चिर हरण,
    अग्नि मेरी जलने को आतुर उर में  बसती रही अगन।

    श्यामा का सारा वस्त्र हरण वो द्रोण भीष्म की लाचारी,
    चिनगारी कब की सुलग रही थी मात्र आग की तैयारी।
    कर्ण मित्र की आंखों ने अब तक जितने अपमान सहे,
    प्रथम खेल के  स्थल ने   जाने कितने अवमान कहे।

    उसी भीम की नजरों में जब वो अपमान फला देखा ,
    पांडव की नीची नजरों में वो ही प्रतिघात सजा देखा ।
    जब चिरहरण में श्यामा ने कातर होकर चीत्कार किया,
    ये जान रहा था दुर्योधन है समर शेष स्वीकार किया।

    दुर्योधन तो मतवाला था कि ज्ञात रहा विष का हाला,
    ये उसको खुद भी मरेगा कि  चिरहरण का वो प्याला।
    कुछ नही समझने वाला था ज्ञात श्याम थे अविनाशी,
    वो हीं  श्यामा  के  रक्षक  थे पांचाली  हित अभिलाषी।

    फिर भी जुए के उसी खेल में मैंने जाल बिछाया था,
    उस खेल में  मामा  ने तरकस से वाण चलाया था।
    अंधा कह कर श्यामा ने जो भी मेरा अवमान किया,
    वो  प्रतिशोध  की चिंगारी  मेरे  उर में अज्ञान दिया।

    हम जीत गए थे चौसर में पर युद्ध अभी अवशेष रहा,
    जब तक दुर्योधन जीता था वो समर कदापि शेष रहा।
    हाँ तुष्ट हुआ था दुर्योधन उस प्रतिशोध की ज्वाला में,
    जले  भीम ,  पार्थ, धर्म राज पांचाली  विष हाला में।

    और जुए में  धर्म  राज  ने  खुद ही दाँव लगाया था,
    चौसर  हेतू  पांडव  तत्तपर मैंने तो मात्र बुलाया था।
    गर किट कोई आ आकर दीपक में जल जाता है,
    दोष मात्र कोई किंचित क्या दीपक पे फल पाता है।

    दुर्योधन तो  मतवाला था  राज शक्ति का अभिलाषी,
    शक्ति संपूज्य रहा जीवन ना धर्म ज्ञान  का विश्वासी ।
    भीष्म अति थे बलशाली जो कुछ उन्होंने ज्ञान दिया ,
    थे पिता मेरे लाचार बड़े मजबूरी में सम्मान दिया।

    जो  एकलव्य  से अंगूठे का  गुरु द्रोण  ने दान लिया ,
    जो शक्तिपुंज है पूज्य वही बस ये ही तो प्रमाण दिया।
    भीष्म पितामह किंचित जब कोई स्त्री हर लाते हैं ,
    ना उन्हें विधर्मी कोई कहता मात्र पुण्य फल पाते हैं।

    दुर्योधन भी जाने क्या क्या पाप पुण्य क्या अभिचारी,
    जीत गया जो शक्ति पुंज वो मात्र न्याय का अधिकारी।
    दुर्योधन ने धर्म  मात्र का मर्म यही इतना बस  जाना ,
    निज बाहू  पे जो जीता  जिसने निज गौरव पहचाना।

    उसके आगे ईश  झुके तो नर की क्या औकात भला ?
    रजनी चरणों को धोती  है  आ  झुकता  प्रभात चला।
    इसीलिए तो जीवन पर पांडव संग बस अन्याय किया,
    पर धर्म युद्ध में धर्मराज ने भी कौन सा  न्याय किया?

    धर्मराज हित कृष्ण कन्हैया महावीर पूण्य रक्षक थे,
    कर्ण का वध हुआ कैसे पांडव भी धर्म के भक्षक थे?
    सब कहते हैं अभिमन्यु का कैसा वो संहार हुआ?
    भूरिश्रवा के प्राण हरण में  कैसा धर्मा चार हुआ ?

    भीष्म तात निज हाथों से गर धनुष नहीं हटाते तो,
    भीष्म हरण था असंभव पांडव किंचित पछताते तो।
    द्रोण युद्ध में शस्त्र हीन होकर बैठे असहाय भला,
    शस्त्रहीन का जीवन लेने में कैसे कोई पूण्य फला?

    जिस भाव को मन में रखकर हम सबका संहार किया,
    क्यों गलत हुआ जो भाव वोही ले मैंने  नर संहार किया।
    क्या कान्हा भी बिना दाग के हीं ऐसे रह पाएंगे?
    ना अनुचित कोई कर्म फला उंनसे कैसे  कह पाएंगे?

    पार्थ  धर्म  के अभिलाषी व पूण्य लाभ के हितकारी,
    दुर्योधन तो था हठधर्मी नर अधम पाप का अधिकारी।
    न्याय पूण्य के नाम लिये दुर्योधन को हरने धर्म चला,
    क्या दुर्योधन को हरने में हित हुआ धर्म का कर्म भला?

    धर्म राज तो चौसर के थे व्यसनी फिर वो काम किया,
    युद्ध जीत कर हरने का फिर से हीं वो इंजेजाम किया।
    अति जीत के विश्वासी कि खुद पे  यूँ अभिमान किया,
    चुन लूँ चाहे जिसको भी किंचित अवसर प्रदान किया।

    पर दुर्योधन ने धर्मराज से धर्म  युद्ध  व्यापार किया ,
    चुन सकता था धर्मराज ना अर्जुन पे प्रहार किया।
    हे  मित्र कहो  ले गदा मेरे  सम्मुख  होते सहदेव नकुल,
    क्या इहलोक पे बच जाते क्या मिट न जाता उनका मुल?

    पर मैंने तो न्याय उचित ही चारों को जीवन दान दिया ,
    चुना भीम को गदा युद्ध में निज कौशल प्रमाण दिया ।
    गर भीम अति बलशाली था तो निज बाहू मर्दन करता ,
    जिस गदा शक्ति का मान बड़ा था बाँहों से गर्दन धरता।

    यदुनंदन को ज्ञात  रहा था   माता का   उपाय भला,
    करके रखा दुर्योधन को दिग्भ्रमित  असहाय छला।
    पर  जान गए जब गदा युद्ध में दुर्योधन हीं भारी था ,
    छल से जंधा तोड़ दिए अब कौन धर्म अधिकारी था ?

    रक्त सींच निज हाथों से अपने केशों को दान दिया ,
    क्या श्यामा सो पाएगी कि बड़ा पुण्य का काम किया?
    दुर्योधन अधर्म ,विधर्म , अन्याय, पाप का रहा पर्याय,
    तो पांडव किस मुख से धर्मी न्याय पुरुष फिर रहे हाय।

    बड़ा धर्म का नाम लिए कि पुण्य कर्म अभिज्ञान लिए ,
    बड़ा कुरुक्षेत्र आये थे सच का सच्चा अभिमान लिए।
    सच तो  दुर्योधन  हरने में पांडव  दुर्योधन वरण चले,
    अन्याय पाप का जय होता  धर्म न्याय का क्षरण चले।

    गर दुर्योधन ने जीवन भर पांडव संग अभिचार किया,
    तो धर्म युद्ध में धर्म पूण्य का किसने है व्यापार किया?
    जहाँ  पुण्य का क्षय होता है शक्ति पुंज का जय होता है ,
    सत्य कहाँ होता राजी है कहाँ धर्म का जय होता है ?

    पाप पुण्य की बात नहीं जहाँ शक्ति का होता व्यापार,
    वहाँ मुझी को पाओगे तुम दुर्योधन का हीं संचार।
    दिख नहीं पड़ता तूमको कब सत्य यहाँ इतराता है?,
    यहाँ हार गया है दुर्योधन पर पूण्य कर्म पछताता है ।

    पांडव के भी तन में मन में सब पाप कर्म फलित होंगे,
    दुर्योधन सब कुछ झेल चुका उनपे भी अवतरित होंगे।
    कि धर्म युद्ध में धर्म हरण बस धर्म हरण हीं हो पाया,
    जो कुरुक्षेत्र को देखेगा बस न्याय क्षरण हीं हो पाया।

    जीत गए किंचित पांडव जब अवलोकन कर पाएंगे?
    जब भी अंतर को  झांकेंगे  दुर्योधन  को  हीं  पाएंगे।
    ये बात बता के दुर्योधन तब ईह्लोक को त्याग चला,
    कहते सारे पांडव की जय धर्म पुण्य का भाग्य फला।

    कर्ण पुत्र की लाचारी थी जीवित जो बचा रहा बच के ,
    वृषकेतु आ मिला पार्थ कहते सब साथ मिला सच से।
    हाँ अर्जुन को भी कर्ण वध का मन में था संताप फला ,
    वृष केतु  को  प्रेम  दान कर करके पश्चाताप फला  ।

    वृष केतु के गुरु पार्थ और बालक पुण्य प्रणेता था ,
    सब सीख लिया था अर्जुन से वो योद्धा था विजेता थे।
    कोई भी ऐसा वीर नहीं ठहरे जो भी उसके समक्ष ,
    पांडव सारे खुश होते थे देख कर्ण पुत्र कर्ण समक्ष ।

    जब स्वर्गारोहण करने को तैयार हो चले पांडव वीर ,
    विकट चुनौती आन पड़ी थी धर्मराज हो चले अधीर ।
    वृषकेतु था प्रबल युवक अभिमन्यु पुत्र पर बालक था ,
    परीक्षित था नया नया वृषकेतु राज्य संचालक था।

    वृषकेतु और परीक्षित में कौन  राज्य का अधिकारी ,
    धर्मराज थे उलझन में की आई फिर विपदा भारी ।
    न्याय यही तो कहता था कि वृषकेतु को मिले  प्रभार  ,
    वो ही राज्य का अधिकारी वोही योग्य राज्याधिकार।

    पर पुत्र के प्रेम में अंधे अर्जुन ने वो  व्यवहार किया ,
    कभी  धृतराष्ट्र  ने  दुर्योधन से जैसा था प्यार किया।
    अभिमन्यु  के  पुत्र परीक्षित को देके राज्याधिकार ,
    न्याय धर्म पे कर डाला था आखिर पांडव ने प्रहार।

    यदि  योग्यता  हीं  राज्य की होती कोई परिभाषा ,
    वृषकेतु हीं श्रेयकर था वो ही धर्म की अंतिम आशा।
    धृतराष्ट्र  तो  अंधे  थे अपने कारण कह सकते  थे,
    युद्धिष्ठिर और पार्थ के क्या  कारण हो सकते थे ?

    पुत्र मोह में अंधे राजा का सबने उपहास किया ,
    अन्याय त्रस्त था दुर्योधन ना सबने विश्वास किया।
    अब किस मुख से पार्थ धर्म की गाथा कहते रहते ?
    कर्म तो हैं विधर्मी  जैसे पाप कर्म हीं गढ़ते रहते ।

    अस्वत्थामा देख के सारी हरकत अर्जुन पांडव के ,
    ना अफ़सोस कोई होता था उसको अपने तांडव पे।
    अतिशय  पीड़ा  तन  में मन में लिए पहाड़ों के नीचे,
    केशव श्राप लगा हुआ अब भी अस्वत्थामा के पीछे।

    बीत  गए  हैं  युग  कितने अब उसको है ज्ञान नहीं,
    फलित हुई  हरि की वाणी बचा रहा बस भान नहीं।
    तन  में  पड़े  हुए  हैं  फोड़े  छिन्न  भिन्न सी काया है ,
    जल से जलते हैं अंगारे आँखों समक्ष अँधियारा है ।

    पर  कष्ट पीड़ा झेल  के सारे अब भी  वो ना रोता है ,
    मन  में  कोई  पाप भाव  ना  अस्वत्थामा  सोता  है।
    एक वाणी जो यदुनंदन की फलित हुई थी होनी थी,
    पर एक वाणी फलित हुई ना ये कैसी अनहोनी थी ?

    केशव ने तो ज्ञान दिया था जब  धर्म का क्षय होगा,
    पाप   धरा   पर  छाएगा  दुष्कर्मों  का  जय  होगा।
    तब तब पुण्य के जय हेतु गिरिधर धरती पर आएंगे,
    धर्म   पताका  पुनर्स्थापित  धरती  पर  कर   पाएंगे ।

    पर किंचित केशव की वाणी नहीं सत्य है होने को ,
    नहीं सत्य की जीत हैं संभव धर्म खड़ा है रोने  को।
    मंदिर मस्जिद नाम पर जाने होते  कितने पापाचार,
    दु:शासन करते वस्त्र हरण अबला हैं कितनी लाचार।

    सीताओं  का  अपहरण  भी रावण  हाथों होता हैं ,
    अग्नि  परीक्षा  में  जलती  है राम आज भी  रोता है।
    मुद्रा की चिंता में मानव भगता रहता पल पल पल,
    रातों को ना आती निद्रा बेचैनी चित्त में इस उस पल।

    जाने कितने हिटलर आतें सद्दाम जाने छा जाते हैं ,
    गाँधी की बातें हुई बेमानी सच छलनी हो जाते हैं।
    विश्व युद्ध भी देखा उसने देखा मानव का वो संहार,
    तैमुर लंग के कृत्यों से दिग्भ्रमित हुआ वो नर लाचार।

    सम सामयिक होना भी एक व्यक्ति को आवश्यक है
    पर जिस ज्ञान से उन्नति हो बौद्धिक मात्र निरर्थक है ।
    नित अध्ययन रत होकर भी है अवनति संस्कार में
    काम एक है नाम अलग बस बदलाहट किरदार में।

    ईख पेर कर रस चूसने जैसे व्यापारी करें व्यापार ,
    देह अगन को जला जलाकर महिलाओं से चले बाजार।
    आज एक नहीं लाखों सीताएँ घुट घुट कर मरा करती,
    कैसी दुनिया कृष्ण की वाणी और धर्म की ये धरती?

    अब अधर्म  धर्म पे हावी नर का हो भीषण संहार,
    मंदिर मस्जिद  हिंसा  निमित्त  बहे रक्त की धार।
    इस धरती पे नर  भूले मानवता  की परिभाषा,
    इस युग  में मानव से नहीं मानवता की आशा।

    हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई  जैन बौद्ध की कौम,
    अति विकट ये प्रश्न है भाई धर्म राह पर कौन?
    एक निर्भया छली गई जाने  कितनी छल जाएँगी ,
    और दहेज़ की  ज्वाला में जाने कितनी जल जाएंगी ?

    आखिर कितनों के प्राण जलेंगे तब हरि धरा पर आयेंगे,
    धरती पर धर्म प्रतिष्ठा होगी जो वो  कहते कर पाएंगे ।
    मृग मरीचिका सी लगती है केशव की वो अद्भुत वाणी,
    हर जगह प्रतिष्ठित होने को है दुर्योधन की वही कहानी।

    जो  जीत  गया  संसार  युद्ध  में  धर्मी  वो  कहलाता  है ,
    और  विजित  जो  भी  होता  विधर्मी सा  फल पाता है ।
    ना कोई है धर्म प्रणेता ना कोई है पुण्य संहारक ,
    जीत गया जो जीवन रण में वो पुण्य का प्रचारक।

    जीत मिली जिसको उसके हर कर्म पुण्य हो जायेंगे ,
    और हार मिलती जिसको हर कर्म पाप हो जायेंगे  ।
    सच ना इतिहास बताता है सच जो है उसे छिपाता है,
    विजेता हाथों त्रस्त या तुष्ट जो चाहे वही दिखाता है ।

    दुर्योधन को हरने में जो पांडव ने दुष्कर्म रचे ,
    उन्हें नजर ना आयेंगी क्या कान्हा ने कुकर्म रचे।
    शकुनी मामा ने पासा फेंका बात बताई जाएगी ,
    धर्मराज थे कितनी व्यसनी बात भुलाई जाएगी।

    कलमकार को दुर्योधन में पाप नजर हीं आयेंगे ,
    जो भी पांडव में फलित हुए सब धर्म हो जायेंगे ।
    धर्म पुण्य की बात नहीं थी सत्ता हेतु युद्ध हुआ था,
    दुर्योधन के मरने में हीं न्याय धर्म ना पुण्य फला था।

    सत्ता के हित जो लड़ते हैं धर्म हेतु ना लड़ते हैं ,
    निज स्वार्थ की सिद्धि हेतु हीं तो योद्धा मरते हैं।
    ताकत शक्ति के निमित्त युद्ध सत्ता को पाने को तत्पर,
    कौरव पांडव आयेंगे पर ना होंगे केशव हर अवसर ।

    हर युग में पांडव  भी होते हर युग में दुर्योधन होते  ,
    जो जीत गया वो धर्म प्रणेता हारे सब दुर्योधन होते।
    अब वो हंसता देख देख  के दुर्योधन की सच्ची वाणी ,
    तब भी सच्ची अब भी सच्ची दुर्योधन की कथा कहानी।

    हिम शैल के तुंग शिखर पर बैठे बैठे  वो घायल नर,
    मंद मंद उद्घाटित चित्त पे उसके होता था  ये स्वर ।
    धुंध पड़ी थी अबतक जिसपे तथ्य वही दिख पाता है,
    दुर्योधन तो  मर   जाता   कब  दुर्योधन मिट पाता है?

    द्रोणपुत्र  ओ द्रोणपुत्र  ये  कैसा   सत्य  प्रकाशन है ?
    ये कौन तर्क देता तुझको है कैसा तथ्य प्रकाशन है?
    कैसा अज्ञान का ज्ञापन ये अबुद्धि का कैसा व्यापार?
    कैसे  ये चिन्हित होता तुझसे अविवेक का यूँ प्रचार?

    द्रोण  पुत्र  ओ  द्रोणपुत्र ये कैसा जग का दृष्टिकोण,
    नयनों से प्रज्ञा लुप्त हुई  चित्त पट पे तेरे बुद्धि मौन।
    ये  कौन  बताता है तुझको ना दुर्योधन मिट पाता है ,
    ज्ञान  चक्षु  से देख जरा  क्या  दुर्योधन टिक पाता है?

    ये  कैसा  अनुभव  तेरा  कैसे  तुझमे निष्कर्ष फला ,
    समझ नहीं तू पाता क्यों तेरे चित्त में अपकर्ष फला।
    क्या  तेरे अंतर मन में भी बनने की चाहत दुर्योधन ,
    द्रोणपुत्र  ओ द्रोणपुत्र कुछ तो अंतर हो अवबोधन।

    मात्र अग्नि का बुझ जाना हीं  शीतलता का नाम नहीं,
    और प्रतीति जल का होना पयोनिधि का प्रमाण नहीं।
    आंखों से जो भी दिखता है नहीं ज्ञान का मात्र पर्याय,
    मृगमरीचिका में गोचित जो छद्म मात्र हीं तो जलकाय।

    जो कुछ तेरा अवलोकन क्या समय क्षेत्र से आप्त नहीं,
    कैसे कह सकते हो जो तेरा सत्य जगत में व्याप्त वहीं।
    अश्वत्थामा  तथ्य  प्रक्षेपण क्या ना तेरा  कलुषित  है?
    क्या तेरा  जो सत्य  अन्वेषण ना माया मलदुषित है?

    इतना सब दुख सहते रहते फिर भी कैसा दोष विकार,
    मिथ्या ज्ञान अर्जन करते हो और सजाते अहम विचार।
    अगर मान भी ले गर किंचित कुछ तो तथ्य बताते हो,
    तुम्ही बताओ इस सत्य से क्या कुछ बेहतर कर पाते हो?

    जिस तथ्य प्रकाशन से  गर नहीं किसी का हित होता,
    वो भी क्या है सत्य प्रकाशन नहीं कोई हलुषित होता।
    दुर्योधन अभिमानी  जैसों  का जो मिथ्या मंडन  करते,
    क्या नहीं लगता तुमको तुम निज आमोद मर्दन करते।

    चौंक इधर को कभी उधर को देख रहा था द्रोणपुत्र,
    ये  कौन बुलाता निर्जन में संबोधन करता द्रोणपुत्र?
    मैं तो हिम में पड़ा हुआ हिमसागर घन में जलता हूँ,
    ये बिना निमंत्रण स्वर कैसा ध्वनि कौन सा सुनता हूँ?

    हिम शेष ही बचा हुआ है अंदर भी और बाहर भी,
    ना विशेष है बचा हुआ कोई तथ्य नया उजागर भी।
    इतने  लंबे  जीवन  में जो कुछ देखा वो कहता था,
    ना कोई है सत्य प्रकाशन जग सीखा हीं कहता था।

    बात बड़ी है नई नई जो कुछ देखा खुद को बोला,
    ना कोई दृष्टिगोचित फिर राज यहाँ किसने खोला।
    ये  मेरे  मन  की  सारी  बाते कैसे  कोई जान रहा,
    मन मेरे क्या चलता है कोई कैसे हैं पहचान रहा।

    अतिदुविधा में हिमशिखर पर द्रोणपुत्र था पड़ा हुआ,
    उस स्वर से कुछ था चिंतित और कुछ था डरा हुआ।
    गुरु  पुत्र ओ  गुरु पुत्र ओ चिर लिए तन अविनाशी,
    निज प्रज्ञा पर संशय कैसा क्यूँ हुए निज अविश्वासी।

    ये ढूंढ रहे किसको जग में शामिल तो हूँ तेरे रग में,
    तेरा हीं तो चेतन मन हूँ क्यों ढूंढे पदचिन्हों में डग में।
    नहीं  कोई बाहर से  तुझको ये आवाज लगाता है,
    अब तक भूल हुई तुझसे कैसे अल्फाज बताता है ।

    है फर्क यही इतना बस कि जो दीपक अंधियारे में,
    तुझको इक्छित मिला नही दोष कभी उजियारे में।
    सूरज तो  पूरब  में उगकर  रोज रोज हीं आता है,
    जो भी घर के बाहर आए उजियारा हीं पाता है।

    ये क्या बात हुई कोई गर छिपा रहे घर के अंदर ,
    प्रज्ञा पे  पर्दा  चढ़ा  रहे दिन रात महीने निरंतर।
    बड़े गर्व से कहते हो ये सूरज कहाँ निकलता है,
    पर तेरे कहने से केवल सत्य कहाँ पिघलता है?

    सूरज  भी  है तथ्य सही पर तेरा भी सत्य सही,
    दोष तेरेअवलोकन में अर्द्धमात्र हीं कथ्य सही।
    आँख  मूंदकर  बैठे हो सत्य तेरा अँधियारा  है ,
    जरा खोलकर बाहर देखो आया नया सबेरा है।

    इस सृष्टि में मिलता तुमको जैसा दृष्टिकोण तुम्हारा,
    तुम हीं तेरा जीवन चुनते जैसा भी  संसार तुम्हारा।
    बुरे सही अच्छे भी जग में पर चुनते कैसा तुम जग में,
    तेरे कर्म पर हीं निर्भर है क्या तुमको मिलता है डग में।

    बात सही तो लगती धीरे धीरे ग्रंथि सुलझ रही थी ,
    गाँठ बड़ी अंतर में पर किंचित ना वो उलझ रही थी।
    पर  उत्सुक  हो  रहा  द्रोणपुत्र  देख रहा आगे पीछे ,
    कौन अनायास बुला रहा उस वाणी से हमको खींचे?

    ना पेड़ पौधा खग पशु कोई ना दृष्टिगोचित कोई नर,
    बार बार फिर बुला रहा कैसे मुझको अगोचित स्वर।
    गंध  नहीं  है रूप  नहीं  है  रंग  नहीं  है देह आकार,
    फिर भी कर्णों में आंदोलन किस भाँति कंपन प्रकार।

    क्या एक अकेले रहते चित्त में भ्रम का कोई जाल पला,
    जो भी सुनता हूँ निज चित का कोई माया जाल फला।
    या  उम्र  का  हीं  ये  फल  है लुप्त  पड़े थे  जो विकार,
    जाग  रहें  हैं  हौले  हौले  सुप्त  पड़े सब लुप्त विचार।

    नहीं  मित्र  ओ  नहीं  मित्र नहीं ये तेरा  कोई छद्म भान,
    अंतर में झांको तुम निज के अंतर में हीं कर लो ध्यान।
    ये  स्वर  तेरे अंतर हीं  का कृष्ण कहो या तुम भगवान,
    वो  जो  जगत  बनाते  है वो हीं  जगत  मिटाते  जान।

    देखो  तो मैं हीं  दुर्योधन तुझको समझाने आया हूँ,
    मित्र धर्म का कुछ ऋण बाकी उसे चुकाने आया हूँ।
    मेरे हित हीं निज तन पे जो कष्ट उठाते आये हो,
    निज मन पे जो भ्रम पला निज से हीं छुपाते आये हो।

    जरा आंख तो कुछ हीं पल को बंद करो बतलाता हूँ,
    कुछ हीं पल को शांत करो सत्य को कि तुझे दिखता हूँ।
    चलो दिखाऊँ द्रोण पुत्र नयनों के पीछे का संसार,
    कितने हीं संसार छुपे है तेरे इन नयनों के पार।

    आओ अश्वत्थामा आओ ना मुझपे यूँ तुम पछताओ,
    ना खुद पे भी दुख का कोई कारण सुख अब तुम पाओ।
    कृष्ण तत्व मुझपे है तुमने इतना जो उपकार किया,
    बात सही है द्रोण पुत्र ने भी सबका अपकार किया।

    पर दुष्कर्म किये जो इसने अब तक मूल्य चुकाता है,
    सत्य तथ्य ना ज्ञात मित्र को नाहक हीं पछताता है।
    जैसे मेरे मन ने  चित पर भ्रम का  जाल बिछाया था,
    सत्य कथ्य दिखला कर तूने माया जाल हटाया था।

    है गिरिधर अब आगे आएं द्रोण पुत्र को भी समझाएँ,
    जो कुछ अबतक समझ रहा भ्रम है कैसे भी बतलाएं।
    नाहक हीं क्यों समझ रहा है दुर्योधन ना मिट पाया।
    कृष्ण बताएं कुछ तो इसको दुर्योधन ना टिक पाया।

    कान खड़े हुए विस्मित था ये कैसा दुर्योधन है,
    धर्मराज जो कहते आए थे वैसा सुयोधन है।
    कैसे दिल की तपन आग को दुर्योधन सब भूल गया,
    अब ऐसा दृष्टिगोचित होता द्वेष क्रोध निर्मूल गया।

    जिससे जलता लड़ता था उसको हीं आज बुलाता है,
    ये  कैसा  दुर्योधन  है  जो खुद को आग लगाता है?
    जिस  कृष्ण  के  कारण हीं तो ऐसा दुष्फल पाता हूँ,
    जाने  खुद  को  कैसे  कैसे  कारण  दे पछताता हूँ।

    अश्वत्थामा द्रोण पुत्र आओ तो आओ मेरे साथ,
    मैं हीं तो हूँ मित्र तुम्हारा और कृष्ण भी मेरे साथ।
    आँख बंद करो इक क्षण को देखों तो कैसा संसार,
    क्या  जग का परम तत्व क्या है इस जग का सार।

    सुन बात मित्र की मन मे अतिशय थे संशय आये,
    पर  सोचा द्रोण पुत्र ने और कोई ना रहा उपाय।
    चलो दुर्योधन के हित मैंने इतना पापाचार किया,
    जो खुद भी ना सोचा मैंने कैसा था व्यापार किया।

    बात मानकर इसकी क्षण को देखे अब होता है क्या,
    आँख  मूंदकर  बैठा था वो देखें अब होता है क्या?
    कुछ हीं क्षण में नयनों के आगे दो ज्योति निकट हूई,
    तन से टूट गया था रिश्ता मन की द्योति  प्रकट हुई।

    इस  धरती  के  पार  चला था देह छोड़ चंदा तारे,
    अति गहन असीमित गहराई जैसे लगते अंधियारे।
    सांस नहीं ले पाता था क्या जिंदा था या सपना था,
    ज्योति रूप थे कृष्ण साथ साथ मित्र भी अपना था।

    मुक्त हो गया अश्वत्थामा मुक्त हो गई उसकी देह ,
    कृष्ण संग भी साथ चले थे और दुर्योधन साथ विदेह।
    द्रोण पुत्र को हुआ ज्ञात कि धर्म पाप सब रहते हैं ,
    ये खुद पे निर्भर करता क्या ज्ञान प्राप्त वो करते हैं ?

    फुल भी होते हैं धरती है और शूल भी होते हैं ,
    चित्त पे फुल खिले वैसे जैसे धरती पर बोते हैं ।
    जिसकी जैसी रही अपेक्षा वैसा फल टिक पाता है
    दुर्योधन ना टिक पाता ना दुर्योधन मिट पाता है ।

    अजय अमिताभ सुमन:सर्वाधिकार सुरक्षित

  • मन

    खुद को जब खंगाला मैंने,
    क्या बोलूँ क्या पाया मैंने?
    अति कठिन है मित्र तथ्य वो,
    बामुश्किल ही मैं कहता हूँ,
    हौले कविता मैं गढ़ता हूँ,
    हौले कविता मैं गढ़ता हूँ।

    अजय अमिताभ सुमन
    सर्वाधिकार सुरक्षित

  • दुर्योधन कब मिट पाया:भाग-32

    इस क्षणभंगुर संसार में जो नर निज पराक्रम की गाथा रच जन मानस के पटल पर अपनी अमिट छाप छोड़ जाता है उसी का जीवन सफल होता है। अश्वत्थामा का अद्भुत पराक्रम देखकर कृतवर्मा और कृपाचार्य भी मरने मारने का निश्चय लेकर आगे बढ़ चले।

    कुछ क्षण पहले शंकित था मन ना दृष्टित थी कोई आशा ,

    द्रोणपुत्र के पुरुषार्थ से हुआ तिरोहित खौफ निराशा ।

    या मर जाये या मारे चित्त में कर के ये दृढ निश्चय,

    शत्रु शिविर को हुए अग्रसर हार फले कि या हो जय।

    याद किये फिर अरिसिंधु में मर के जो अशेष रहा,

    वो नर हीं विशेष रहा हाँ वो नर हीं विशेष रहा ।

    कि शत्रुसलिला में जिस नर के हाथों में तलवार रहे ,

    या क्षय की हो दृढ प्रतीति परिलक्षित संहार बहे।

    वो मानव जो झुके नहीं कतिपय निश्चित एक हार में,

    डग योद्धा का डिगे नहीं अरि के भीषण प्रहार में।

    ज्ञात मनुज के चित्त में किंचित सर्वगर्भा का ओज बहे ,

    अभिज्ञान रहे निज कृत्यों का कर्तव्यों की हीं खोज रहे।

    अकम्पत्व का हीं तन पे मन पे धारण पोशाक हो ,

    रण डाकिनी के रक्त मज्जा खेल का मश्शाक हो।

    क्षण का हीं तो मन है ये क्षण को हीं टिका हुआ,

    और तन का क्या मिट्टी का मिटटी में मिटा हुआ।

    पर हार का वरण भी करके जो रहा अवशेष है,

    जिस वीर के वीरत्व का जन में स्मृति शेष है।

    सुवाड़वाग्नि सिंधु में नर मर के भी अशेष है,

    जीवन वही विशेष है मानव वही विशेष है।

    अजय अमिताभ सुमन:सर्वाधिकार सुरक्षित

  • दुर्योधन कब मिट पाया:भाग-30

    अश्वत्थामा दुर्योधन को आगे बताता है कि शिव जी के जल्दी प्रसन्न होने की प्रवृति का भान होने पर वो उनको प्रसन्न करने को अग्रसर हुआ । परंतु प्रयास करने के लिए मात्र रात्रि भर का हीं समय बचा हुआ था। अब प्रश्न ये था कि इतने अल्प समय में शिवजी को प्रसन्न किया जाए भी तो कैसे?

    वक्त नहीं था चिरकाल तक टिककर एक प्रयास करूँ ,
    शिलाधिस्त हो तृणालंबितलक्ष्य सिद्ध उपवास करूँ।
    एक पाद का दृढ़ालंबन ना कल्पों हो सकता था ,
    नहीं सहस्त्रों साल शैल वासी होना हो सकता था।

    ना सुयोग था ऐसा अर्जुन जैसा मैं पुरुषार्थ रचाता,
    भक्ति को हीं साध्य बनाके मैं कोई निजस्वार्थ फलाता।
    अतिअल्प था काल शेष किसी ज्ञानी को कैसे लाता?
    मंत्रोच्चारित यज्ञ रचाकर मन चाहा वर को पाता?

    इधर क्षितिज पे दिनकर दृष्टित उधर शत्रु की बाहों में,
    अस्त्र शस्त्र प्रचंड अति होते प्रकटित निगाहों में।
    निज बाहू गांडीव पार्थ धर सज्जित होकर आ जाता,
    निश्चिय हीं पौरुष परिलक्षित लज्जित करके हीं जाता।

    भीमनकुल उद्भट योद्धा का भी कुछ कम था नाम नहीं,
    धर्म राज और सहदेव से था कतिपय अनजान नहीं।
    एक रात्रि हीं पहर बची थी उसी पहर का रोना था ,
    शिवजी से वरदान प्राप्त कर निष्कंटक पथ होना था।

    अगर रात्रि से पहले मैने महाकाल ना तुष्ट किया,
    वचन नहीं पूरा होने को समझो बस अवयुष्ट किया।
    महादेव को उस हीं पल में मन का मर्म बताना था,
    जो कुछ भी करना था मुझको क्षणमें कर्म रचाना था।

    अजय अमिताभ सुमन: सर्वाधिकार सुरक्षित

  • दुर्योधन कब मिट पाया:भाग-29

    महाकाल क्रुद्ध होने पर कामदेव को भस्म करने में एक क्षण भी नहीं लगाते तो वहीं पर तुष्ट होने पर भस्मासुर को ऐसा वर प्रदान कर देते हैं जिस कारण उनको अपनी जान बचाने के लिए भागना भी पड़ा। ऐसे महादेव के समक्ष अश्वत्थामा सोच विचार में तल्लीन था।

    कभी बद्ध प्रारब्द्ध काम ने जो शिव पे आघात किया,
    भस्म हुआ क्षण में जलकर क्रोध क्षोभ हीं प्राप्त किया।
    अन्य गुण भी ज्ञात हुए शिव हैं भोले अभिज्ञान हुआ,
    आशुतोष भी क्यों कहलाते हैं इसका प्रतिज्ञान हुआ।

    भान हुआ था शिव शंकर हैं आदि ज्ञान के विज्ञाता,
    वेदादि गुढ़ गहन ध्यान और अगम शास्त्र के व्याख्याता।
    एक मुख से बहती जिनके वेदों की अविकल धारा,
    नाथों के है नाथ तंत्र और मंत्र आदि अधिपति सारा।

    सुर दानव में भेद नहीं है या कोई पशु या नर नारी,
    भस्मासुर की कथा ज्ञात वर उनकी कैसी बनी लाचारी।
    उनसे हीं आशीष प्राप्त कर कैसा वो व्यवहार किया?
    पशुपतिनाथ को उनके हीं वर से कैसे प्रहार किया?

    कथ्य सत्य ये कटु तथ्य था अतिशीघ्र तुष्ट हो जाते है
    जन्मों का जो फल होता शिव से क्षण में मिल जाते है।
    पर उस रात्रि एक पहर क्या पल भी हमपे भारी था,
    कालिरात्रि थी तिमिर घनेरा काल नहीं हितकारी था।

    विदित हुआ जब महाकाल से अड़कर ना कुछ पाएंगे,
    अशुतोष हैं महादेव उनपे अब शीश नवाएँगे।
    बिना वर को प्राप्त किये अपना अभियान ना पूरा था,
    यही सोच कर कर्म रचाना था अभिध्यान अधुरा था।

    अजय अमिताभ सुमन:सर्वाधिकार सुरक्षित

  • दुर्योधन कब मिट पाया:भाग-28 

    जब अश्वत्थामा ने अपने अंतर्मन की सलाह मान बाहुबल के स्थान पर स्वविवेक के उपयोग करने का निश्चय किया, उसको महादेव के सुलभ तुष्ट होने की प्रवृत्ति का भान तत्क्षण हीं हो गया। तो क्या अश्वत्थामा अहंकार भाव वशीभूत होकर हीं इस तथ्य के प्रति अबतक उदासीन रहा था?

    तीव्र वेग से वह्नि आती क्या तुम तनकर रहते हो?
    तो भूतेश से अश्वत्थामा क्यों ठनकर यूँ रहते हो?
    क्यों युक्ति ऐसे रचते जिससे अति दुष्कर होता ध्येय,
    तुम तो ऐसे नहीं हो योद्धा रुद्र दीप्ति ना जिसको ज्ञेय?

    जो विपक्ष को आन खड़े है तुम भैरव निज पक्ष करो।
    और कर्म ना धृष्ट फला कर शिव जी को निष्पक्ष करो।
    निष्प्रयोजन लड़कर इनसे लक्ष्य रुष्ट क्यों करते हो?
    विरुपाक्ष भोले शंकर भी तुष्ट नहीं क्यों करते हो?

    और विदित हो तुझको योद्धा तुम भी तो हो कैलाशी,
    रूद्रपति का अंश है तुझमे तुम अनश्वर अविनाशी।
    ध्यान करो जो अशुतोष हैं हर्षित होते अति सत्वर,
    वो तेरे चित्त को उत्कंठित दान नहीं क्यों करते वर?

    जय मार्ग पर विचलित होना मंजिल का अवसान नहीं,
    वक्त पड़े तो झुक जाने में ना खोता स्वाभिमान कहीं।
    अभिप्राय अभी पृथक दृष्ट जो तुम ना इससे घबड़ाओ,
    महादेव परितुष्ट करो और मनचाहा तुम वर पाओ।

    तब निज अंतर मन की बातों को सच में मैंने पहचाना ,
    स्वविवेक में दीप्ति कैसी उस दिन हीं तत्क्षण ये जाना।
    निज बुद्धि प्रतिरुद्ध अड़ा था स्व बाहु अभिमान रहा,
    पर अब जाकर शिवशम्भू की शक्ति का परिज्ञान हुआ।

    अजय अमिताभ सुमन: सर्वाधिकार सुरक्षित

  • दुर्योधन कब मिट पाया:भाग-27

    शिवजी के समक्ष हताश अश्वत्थामा को उसके चित्त ने जब बल के स्थान पर स्वविवेक के प्रति जागरूक होने के लिए प्रोत्साहित किया, तब अश्वत्थामा में नई ऊर्जा का संचार हुआ और उसने शिव जी समक्ष बल के स्थान पर अपनी बुद्धि के इस्तेमाल का निश्चय किया । प्रस्तुत है दीर्घ कविता “दुर्योधन कब मिट पाया ” का सताईसवाँ भाग।

    एक प्रत्यक्षण महाकाल का और भयाकुल ये व्यवहार?
    मेघ गहन तम घोर घनेरे चित्त में क्योंकर है स्वीकार ?
    जीत हार आते जाते पर जीवन कब रुकता रहता है?
    एक जीत भी क्षण को हीं हार कहाँ भी टिक रहता है?

    जीवन पथ की राहों पर घनघोर तूफ़ां जब भी आते हैं,
    गहन हताशा के अंधियारे मानस पट पर छा जाते हैं।
    इतिवृत के मुख्य पृष्ठ पर वो अध्याय बना पाते हैं ,
    कंटक राहों से होकर जो निज व्यवसाय चला पाते हैं।

    अभी धरा पर घायल हो पर लक्ष्य प्रबल अनजान नहीं,
    विजयअग्नि की शिखाशांत है पर तुम हो नाकाम नहीं।
    दृष्टि के मात्र आवर्तन से सूक्ष्म विघ्न भी बढ़ जाती है,
    स्वविवेक अभिज्ञान करो कैसी भी बाधा हो जाती है।

    जिस नदिया की नौका जाके नदिया के ना धार बहे ,
    उस नौका का बचना मुश्किल कोई भी पतवार रहे?
    जिन्हें चाह है इस जीवन में ईक्छित एक उजाले की,
    उन राहों पे स्वागत करते शूल जनित पग छाले भी।

    पैरों की पीड़ा छालों का संज्ञान अति आवश्यक है,
    साहस श्रेयकर बिना ज्ञान के पर अभ्यास निरर्थक है।
    व्यवधान आते रहते हैं पर परित्राण जरूरी है,
    द्वंद्व कष्ट से मुक्ति कैसे मन का त्राण जरूरी है?

    लड़कर वांछित प्राप्त नहीं तो अभिप्राय इतना हीं है ,
    अन्य मार्ग संधान आवश्यक तुच्छप्राय कितना हीं है।
    सोचो देखो क्या मिलता है नाहक शिव से लड़ने में ,
    किंचित अब उपाय बचा है मैं तजकर शिव हरने में।

    अजय अमिताभ सुमन:सर्वाधिकार सुरक्षित

  • दुर्योधन कब मिट पाया:भाग-26

    विपरीत परिस्थितियों में एक पुरुष का किंकर्तव्यविमूढ़ होना एक समान्य बात है । मानव यदि चित्तोन्मुख होकर समाधान की ओर अग्रसर हो तो राह दिखाई पड़ हीं जाती है। जब अश्वत्थामा को इस बात की प्रतीति हुई कि शिव जी अपराजेय है, तब हताश तो वो भी हुए थे। परंतु इन भीषण परिस्थितियों में उन्होंने हार नहीं मानी और अंतर मन में झाँका तो निज चित्त द्वारा सुझाए गए मार्ग पर समाधान दृष्टि गोचित होने लगा । प्रस्तुत है दीर्घ कविता “दुर्योधन कब मिट पाया ” का छब्बीसवां भाग।

    शिव शम्भू का दर्शन जब हम तीनों को साक्षात हुआ?
    आगे कहने लगे द्रोण के पुत्र हमें तब ज्ञात हुआ,
    महा देव ना ऐसे थे जो रुक जाएं हम तीनों से,
    वो सूरज क्या छुप सकते थे हम तीन मात्र नगीनों से?

    ज्ञात हमें जो कुछ भी था हो सकता था उपाय भला,
    चला लिए थे सब शिव पर पर मसला निरुपाय फला।
    ज्ञात हुआ जो कर्म किये थे उसमें बस अभिमान रहा,
    नर की शक्ति के बाहर हैं महा देव तब भान रहा।

    अग्नि रूप देदिव्यमान दृष्टित पशुपति से थी ज्वाला,
    मैं कृतवर्मा कृपाचार्य के सन्मुख था यम का प्याला।
    हिमपति से लड़ना क्या था कीट दृश जल मरना था ,
    नहीं राह कोई दृष्टि गोचित क्या लड़ना अड़ना था?

    मुझे कदापि क्षोभ नहीं था शिव के हाथों मरने का,
    पर एक चिंता सता रही थी प्रण पूर्ण ना करने का।
    जो भी वचन दिया था मैंने उसको पूर्ण कराऊँ कैसे?
    महादेव प्रति पक्ष अड़े थे उनसे प्राण बचाऊँ कैसे?

    विचलित मन कम्पित बाहर से ध्यान हटा न पाता था,
    हताशा का बादल छलिया प्रकट कभी छुप जाता था।
    निज का भान रहा ना मुझको कि सोचूं कुछ अंदर भी ,
    उत्तर भीतर छुपा हुआ है झांकूँ चित्त समंदर भी।

    कृपाचार्य ने पर रुक कर जो थोड़ा ज्ञान कराया ,
    निजचित्त का अवबोध हुआ दुविधा का भान कराया।
    युद्ध छिड़े थे जो मन में निज चित्त ने मुक्ति दिलाई ,
    विकट विघ्न था पर निस्तारण हेतु युक्ति सुझाई।

    अजय अमिताभ सुमन:सर्वाधिकार सुरक्षित

  • दुर्योधन कब मिट पाया:भाग-25

    हिमालय पर्वत के बारे में सुनकर या पढ़कर उसके बारे में जानकरी प्राप्त करना एक बात है और हिमालय पर्वत के हिम आच्छादित तुंग शिखर पर चढ़कर साक्षात अनुभूति करना और बात । शिवजी की असीमित शक्ति के बारे में अश्वत्थामा ने सुन तो रखा था परंतु उनकी ताकत का प्रत्यक्ष अनुभव तब हुआ जब उसने जो भी अस्त्र शिव जी पर चलाये सारे के सारे उनमें ही विलुप्त हो गए। ये बात उसकी समझ मे आ हीं गई थी कि महादेव से पार पाना असम्भव था। अब मुद्दा ये था कि इस बात की प्रतीति होने के बाद क्या हो? आईये देखते हैं दीर्घ कविता “दुर्योधन कब मिट पाया” का पच्चीसवाँ भाग।
    किससे लड़ने चला द्रोण पुत्र थोड़ा तो था अंदेशा,
    तन पे भस्म विभूति जिनके मृत्युमूर्त रूप संदेशा।
    कृपिपुत्र को मालूम तो था मृत्युंजय गणपतिधारी,
    वामदेव विरुपाक्ष भूत पति विष्णु वल्लभ त्रिपुरारी।
    चिर वैरागी योगनिष्ठ हिमशैल कैलाश के निवासी,
    हाथों में रुद्राक्ष की माला महाकाल है अविनाशी।
    डमरूधारी के डम डम पर सृष्टि का व्यवहार फले,
    और कृपा हो इनकी जीवन नैया भव के पार चले।
    सृष्टि रचयिता सकल जीव प्राणी जंतु के सर्वेश्वर,
    प्रभु राम की बाधा हरकर कहलाये थे रामेश्वर।
    तन पे मृग का चर्म चढाते भूतों के हैं नाथ कहाते,
    चंद्र सुशोभित मस्तक पर जो पर्वत ध्यान लगाते।
    जिनकी सोच के हीं कारण गोचित ये संसार फला,
    त्रिनेत्र जग जाए जब भी तांडव का व्यापार फला।
    अमृत मंथन में कंठों को विष का पान कराए थे,
    तभी देवों के देव महादेव नीलकंठ कहलाए थे।
    वो पर्वत पर रहने वाले हैं सिद्धेश्वर सुखकर्ता,
    किंतु दुष्टों के मान हरण करते रहते जीवन हर्ता।
    त्रिभुवनपति त्रिनेत्री त्रिशूल सुशोभित जिनके हाथ,
    काल मुठ्ठी में धरते जो प्रातिपक्ष खड़े थे गौरीनाथ।
    हो समक्ष सागर तब लड़कर रहना ना उपाय भला,
    लहरों के संग जो बहता है होता ना निरुपाय भला।
    महाकाल से यूँ भिड़ने का ना कोई भी अर्थ रहा,
    प्राप्त हुआ था ये अनुभव शिवसे लड़ना व्यर्थ रहा।
    अजय अमिताभ सुमन:सर्वाधिकार सुरक्षित

  • दुर्योधन कब मिट पाया:भाग-24

    मानव को ये तो ज्ञात है हीं कि शारीरिक रूप से सिंह से लड़ना , पहाड़ को अपने छोटे छोटे कदमों से पार करने की कोशिश करना आदि उसके लिए लगभग असंभव हीं है। फिर भी यदि परिस्थियाँ उसको ऐसी हीं मुश्किलों का सामना करने के लिए मजबूर कर दे तो क्या हो? कम से कम मुसीबतों की गंभीरता के बारे में जानकारी होनी तो चाहिए हीं। कम से कम इतना तो पता होना हीं चाहिए कि आखिर बाधा है किस तरह की? कृतवर्मा दुर्योधन को आगे बताते हैं कि नियति ने अश्वत्थामा और उन दोनों योद्धाओ को महादेव शिव जी के समक्ष ला कर खड़ा कर दिया था। पर क्या उन तीनों को इस बात का स्पष्ट अंदेशा था कि नियति ने उनके सामने किस तरह की परीक्षा पूर्व निश्चित कर रखी थी? क्या अश्वत्थामा और उन दोनों योद्धाओं को अपने मार्ग में आन पड़ी बाधा की भीषणता के बारे में वास्तविक जानकारी थी? आइए देखते हैं इस दीर्घ कविता “दुर्योधन कब मिट पाया” के चौबीसवें भाग में।
    क्या तीव्र था अस्त्र आमंत्रण शस्त्र दीप्ति थी क्या उत्साह,
    जैसे बरस रहा गिरिधर पर तीव्र नीर लिए जलद प्रवाह।
    राजपुत्र दुर्योधन सच में इस योद्धा को जाना हमने,
    क्या इसने दु:साध्य रचे थे उस दिन हीं पहचाना हमने।
    लक्ष्य असंभव दिखता किन्तु निज वचन के फलितार्थ,
    स्वप्नमय था लड़ना शिव से द्रोण पुत्र ने किया यथार्थ।
    जाने कैसे शस्त्र प्रकटित कर क्षण में धार लगाता था,
    शिक्षण उसको प्राप्त हुआ था कैसा ये दिखलाता था।
    पर जो वाण चलाता सारे शिव में हीं खो जाते थे,
    जितने भी आयुध जगाए क्षण में सब सो जाते थे।
    निडर रहो पर निज प्रज्ञा का थोड़ा सा तो ज्ञान रहे ,
    शक्ति सही है साधन का पर थोड़ा तो संज्ञान रहे।
    शिव पुरुष हैं महा काल क्या इसमें भी संदेह भला ,
    जिनके गर्दन विषधर माला और माथे पे चाँद फला।
    भीष्म पितामह माता जिनके सर से झरझर बहती है,
    उज्जवल पावन गंगा जिन मस्तक को धोती रहती है।
    आशुतोष हो तुष्ट अगर तो पत्थर को पर्वत करते,
    और अगर हो रुष्ट पहर जो वासी गणपर्वत रहते।
    खेल खेल में बलशाली जो भी आते हो जाते धूल,
    महाकाल के हो समक्ष जो मिट जाते होते निर्मूल।
    क्या सागर क्या नदिया चंदा सूरज जो हरते अंधियारे,
    कृपा आकांक्षी महादेव के जगमग जग करते जो तारे।
    ऐसे शिव से लड़ने भिड़ने के शायद वो काबिल ना था,
    जैसा भी था द्रोण पुत्र पर कायर में वो शामिल ना था।
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  • दुर्योधन कब मिट पाया:भाग-23

    मृग मरीचिका की तरह होता है झूठ। माया के आवरण में छिपा हुआ होता है सत्य। जल तो होता नहीं, मात्र जल की प्रतीति हीं होती है। आप जल के जितने करीब जाने की कोशिश करते हैं, जल की प्रतीति उतनी हीं दूर चली जाती है। सत्य की जानकारी सत्य के पास जाने से कतई नहीं, परंतु दृष्टिकोण के बदलने से होता है। मृग मरीचिका जैसी कोई चीज होती तो नहीं फिर भी होती तो है। माया जैसी कोई चीज होती तो नहीं, पर होती तो है। और सारा का सारा ये मन का खेल है। अगर मृग मरीचिका है तो उसका निदान भी है। महत्वपूर्ण बात ये है कि कौन सी घटना एक व्यक्ति के आगे पड़े हुए भ्रम के जाल को हटा पाती है?
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    कुछ हीं क्षण में ज्ञात हुआ सारे संशय छँट जाते थे,
    जो भी धुँआ पड़ा हुआ सब नयनों से हट जाते थे।
    नाहक हीं दुर्योधन मैंने तुमपे ना विश्वास किया।
    द्रोणपुत्र ने मित्रधर्म का सार्थक एक प्रयास किया।
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    हाँ प्रयास वो किंचित ऐसा ना सपने में कर पाते,
    जो उस नर में दृष्टिगोचित साहस संचय कर पाते।
    बुद्धि प्रज्ञा कुंद पड़ी थी हम दुविधा में थे मजबूर,
    ऐसा दृश्य दिखा नयनों के आगे दोनों हुए विमूढ़।
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    गुरु द्रोण का पुत्र प्रदर्शित अद्भुत तांडव करता था,
    धनुर्विद्या में दक्ष पार्थ के दृश पांडव हीं दिखता था।
    हम जो सोचनहीं सकते थे उसने एक प्रयास किया ,
    महाकाल को हर लेने का खुद पे था विश्वास किया।
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    कैसे कैसे अस्त्र पड़े थे उस उद्भट की बाँहों में ,
    तरकश में जो शस्त्र पड़े सब परिलक्षित निगाहों में।
    उग्र धनुष पर वाण चढ़ाकर और उठा हाथों तलवार,
    मृगशावक एक बढ़ा चलाथा एक सिंह पे करने वार।
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    क्या देखते ताल थोक कर लड़ने का साहस करता,
    महाकाल से अश्वत्थामा अदभुत दु:साहस करता?
    हे दुर्योधन विकट विघ्न को ऐसे हीं ना पार किया ,
    था तो उसके कुछ तोअन्दर महा देव पर वार किया ।
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    पितृप्रशिक्षण का प्रतिफलआज सभीदिखाया उसने,
    अश्वत्थामा महाकाल पर कंटक वाण चलाया उसने।
    शत्रु वंश का सर्व संहर्ता अरिदल जिससे अनजाना,
    हम तीनों में द्रोण पुत्र तब सर्व श्रेष्ठ हैं ये माना।
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    अजय अमिताभ सुमन:सर्वाधिकार सुरक्षित

  • दुर्योधन कब मिट पाया:भाग-22

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    मन की प्रकृति बड़ी विचित्र है। किसी भी छोटी सी समस्या का समाधान न मिलने पर उसको बहुत बढ़ा चढ़ा कर देखने लगता है। यदि निदान नहीं मिलता है तो एक बिगड़ैल घोड़े की तरह मन ऐसी ऐसी दिशाओं में भटकने लगता है जिसका समस्या से कोई लेना देना नहीं होता। कृतवर्मा को भी सच्चाई नहीं दिख रही थी। वो कभी दुर्योधन को , कभी कृष्ण को दोष देते तो कभी प्रारब्ध कर्म और नियति का खेल समझकर अपने प्रश्नों के हल निकालने की कोशिश करते । जब समाधान न मिला तो दुर्योधन के प्रति सहज सहानुभूति का भाव जग गया और अंततोगत्वा स्वयं द्वारा दुर्योधन के प्रति उठाये गए संशयात्मक प्रश्नों पर पछताने भी लगे। प्रस्तुत है दीर्ध कविता “दुर्योधन कब मिट पाया का बाइसवाँ भाग।
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    मेरे भुज बल की शक्ति क्या दुर्योधन ने ना देखा?
    कृपाचार्य की शक्ति का कैसे कर सकते अनदेखा?
    दुःख भी होता था हमको और किंचित इर्ष्या होती थी,
    मानवोचित विष अग्नि उर में जलती थी बुझती थी।
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    युद्ध लड़ा था जो दुर्योधन के हित में था प्रतिफल क्या?
    बीज चने के भुने हुए थे क्षेत्र परिश्रम ऋतु फल क्या?
    शायद मुझसे भूल हुई जो ऐसा कटु फल पाता था,
    या विवेक में कमी रही थी कंटक दुख पल पाता था।
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    या समय का रचा हुआ लगता था पूर्व निर्धारित खेल,
    या मेरे प्रारब्ध कर्म का दुचित वक्त प्रवाहित मेल।
    या स्वीकार करूँ दुर्योधन का मतिभ्रम था ये कहकर,
    या दुर्भाग्य हुआ प्रस्फुटण आज देख स्वर्णिम अवसर।
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    मन में शंका के बादल जो उमड़ घुमड़ कर आते थे,
    शेष बची थी जो कुछ प्रज्ञा धुंध घने कर जाते थे ।
    क्यों कर कान्हा ने मुझको दुर्योधन के साथ किया?
    या नाहक का हीं था भ्रम ना केशव ने साथ दिया?
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    या गिरिधर की कोई लीला थी शायद उपाय भला,
    या अल्प बुद्धि अभिमानी पे माया का जाल फला।
    अविवेक नयनों पे इतना सत्य दृष्टि ना फलता था,
    या मैंने स्वकर्म रचे जो उसका हीं फल पलता था?
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    या दुर्बुद्धि फलित हुई थी ना इतना सम्मान किया,
    मृतशैया पर मित्र पड़ा था ना इतना भी ध्यान दिया।
    क्या सोचकर मृतगामी दुर्योधन के विरुद्ध पड़ा ,
    निज मन चितवन घने द्वंद्व में मैं मेरे प्रतिरुद्ध अड़ा।
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  • दुर्योधन कब मिट पाया:भाग:21

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    किसी व्यक्ति के चित्त में जब हीनता की भावना आती है तब उसका मन उसके द्वारा किये गए उत्तम कार्यों को याद दिलाकर उसमें वीरता की पुनर्स्थापना करने की कोशिश करता है। कुछ इसी तरह की स्थिति में कृपाचार्य पड़े हुए थे। तब उनको युद्ध स्वयं द्वारा किया गया वो पराक्रम याद आने लगा जब उन्होंने अकेले हीं पांडव महारथियों भीम , युधिष्ठिर, नकुल, सहदेव, द्रुपद, शिखंडी, धृष्टद्युम आदि से भिड़कर उन्हें आगे बढ़ने से रोक दिया था। इस तरह का पराक्रम प्रदर्शित करने के बाद भी वो अस्वत्थामा की तरह दुर्योधन का विश्वास जीत नहीं पाए थे। उनकी समझ में नहीं आ रहा था आखिर किस तरह का पराक्रम दुर्योधन के विश्वास को जीतने के लिए चाहिए था? प्रस्तुत है दीर्घ कविता “दुर्योधन कब मिट पाया” का इक्कीसवां भाग।
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    शत्रुदल के जीवन हरते जब निजबाहु खडग विशाल,
    तब जाके कहीं किसी वीर के उन्नत होते गर्वित भाल।
    निज मुख निज प्रशंसा करना है वीरों का काम नहीं,
    कर्म मुख्य परिचय योद्धा का उससे होता नाम कहीं।
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    मैं भी तो निज को उस कोटि का हीं योद्धा कहता हूँ,
    निज शस्त्रों को अरि रक्त से अक्सर धोता रहता हूँ।
    खुद के रचे पराक्रम पर तब निश्चित संशय होता है,
    जब अपना पुरुषार्थ उपेक्षित संचय अपक्षय होता है।
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    विस्मृत हुआ दुर्योधन को हों भीमसेन या युधिष्ठिर,
    किसको घायल ना करते मेरे विष वामन करते तीर।
    भीमसेन के ध्वजा चाप का फलित हुआ था अवखंडन ,
    अपने सत्तर वाणों से किया अति दर्प का परिखंडन।
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    लुप्त हुआ स्मृति पटल से कब चाप की वो टंकार,
    धृष्टद्युम्न को दंडित करते मेरे तरकश के प्रहार।
    द्रुपद घटोत्कच शिखंडी ना जीत सके समरांगण में,
    पांडव सैनिक कोष्ठबद्ध आ टूट पड़े रण प्रांगण में।
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    पर शत्रु को सबक सिखाता एक अकेला जो योद्धा,
    प्रतिरोध का मतलब क्या उनको बतलाता प्रतिरोद्धा।
    हरि कृष्ण का वचन मान जब धारित करता दुर्लेखा,
    दुख तो अतिशय होता हीं जब रह जाता वो अनदेखा।
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    अति पीड़ा मन में होती ना कुरु कुंवर को याद रहा,
    सबके मरने पर जिंदा कृतवर्मा भी ना ज्ञात रहा।
    क्या ऐसा भी पौरुष कतिपय नाकाफी दुर्योधन को?
    एक कृतवर्मा का भीड़ जाना नाकाफी दुर्योधन को?
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  • दुर्योधन कब मिट पाया:भाग:20

    कृपाचार्य और कृतवर्मा के जीवित रहते हुए भी ,जब उन दोनों की उपेक्षा करके दुर्योधन ने अश्वत्थामा को सेनापतित्व का भार सौंपा , तब कृतवर्मा को लगा था कि कुरु कुंवर दुर्योधन उन दोनों का अपमान कर रहे हैं। फिर कृतवर्मा मानवोचित स्वभाव का प्रदर्शन करते हुए अपने चित्त में उठते हुए द्वंद्वात्मक तरंगों को दबाने के लिए विपरीत भाव का परिलक्षण करने लगते हैं। प्रस्तुत है दीर्घ कविता “दुर्योधन कब मिट पाया” का बीसवां भाग।
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    क्षोभ युक्त बोले कृत वर्मा नासमझी थी बात भला ,
    प्रश्न उठे थे क्या दुर्योधन मुझसे थे से अज्ञात भला?
    नाहक हीं मैंने माना दुर्योधन ने परिहास किया,
    मुझे उपेक्षित करके अश्वत्थामा पे विश्वास किया?
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    सोच सोच के मन में संशय संचय हो कर आते थे,
    दुर्योधन के प्रति निष्ठा में रंध्र क्षय कर जाते थे।
    कभी मित्र अश्वत्थामा के प्रति प्रतिलक्षित द्वेष भाव,
    कभी रोष चित्त में व्यापे कभी निज सम्मान अभाव।
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    सत्यभाष पे जब भी मानव देता रहता अतुलित जोर,
    समझो मिथ्या हुई है हावी और हुआ है सच कमजोर।
    अपरभाव प्रगाढ़ित चित्त पर जग लक्षित अनन्य भाव,
    निजप्रवृत्ति का अनुचर बनता स्वामी है मानव स्वभाव।
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    और पुरुष के अंतर मन की जो करनी हो पहचान,
    कर ज्ञापित उस नर कर्णों में कोई शक्ति महान।
    संशय में हो प्राण मनुज के भयाकान्त हो वो अतिशय,
    छद्म बल साहस का अक्सर देने लगता नर परिचय।
    ===========================
    उर में नर के गर स्थापित गहन वेदना गूढ़ व्यथा,
    होठ प्रदर्शित करने लगते मिथ्या मुस्कानों की गाथा।
    मैं भी तो एक मानव हीं था मृत्य लोक वासी व्यवहार,
    शंकित होता था मन मेरा जग लक्षित विपरीतअचार।
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    मुदित भाव का ज्ञान नहीं जो बेहतर था पद पाता था,
    किंतु हीन चित्त मैं लेकर हीं अगन द्वेष फल पाता था।
    किस भाँति भी मैं कर पाता अश्वत्थामा को स्वीकार,
    अंतर में तो द्वंद्व फल रहे आंदोलित हो रहे विकार?
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  • दुर्योधन कब मिट पाया:भाग:19

    कृपाचार्य दुर्योधन को बताते है कि हमारे पास दो विकल्प थे, या तो महाकाल से डरकर भाग जाते या उनसे लड़कर मृत्युवर के अधिकारी होते। कृपाचार्य अश्वत्थामा के मामा थे और उसके दु:साहसी प्रवृत्ति को बचपन से हीं जानते थे। अश्वत्थामा द्वारा पुरुषार्थ का मार्ग चुनना उसके दु:साहसी प्रवृत्ति के अनुकूल था, जो कि उसके सेनापतित्व को चरितार्थ हीं करता था। प्रस्तुत है दीर्घ कविता दुर्योधन कब मिट पाया का उन्नीसवां भाग।
    ==============
    विकट विघ्न जब भी आता ,
    या तो संबल आ जाता है ,
    या जो सुप्त रहा मानव में ,
    ओज प्रबल हो आता है।
    ==============
    भयाक्रांत संतप्त धूमिल ,
    होने लगते मानव के स्वर ,
    या थर्र थर्र थर्र कम्पित होते ,
    डग कुछ ऐसे होते नर ।
    ==============
    विकट विघ्न अनुताप जला हो ,
    क्षुधाग्नि संताप फला हो ,
    अति दरिद्रता का जो मारा ,
    कितने हीं आवेग सहा हो ।
    ==============
    जिसकी माता श्वेत रंग के ,
    आंटे में भर देती पानी,
    दूध समझकर जो पी जाता ,
    कैसी करता था नादानी ।
    ==============
    गुरु द्रोण का पुत्र वही ,
    जिसका जीवन बिता कुछ ऐसे ,
    दुर्दिन से भिड़कर रहना हीं ,
    जीवन यापन लगता जैसे।
    ==============
    पिता द्रोण और द्रुपद मित्र के ,
    देख देखकर जीवन गाथा,
    अश्वत्थामा जान गया था ,
    कैसी कमती जीवन व्यथा।
    ==============
    यही जानकर सुदर्शन हर ,
    लेगा ये अपलक्षण रखता ,
    सक्षम न था तन उसका ,
    पर मन में आकर्षण रखता ।
    ==============
    गुरु द्रोण का पुत्र वोही क्या ,
    विघ्न बाधा से डर जाता ,
    दुर्योधन वो मित्र तुम्हारा ,
    क्या भय से फिर भर जाता ?
    ==============
    थोड़े रूककर कृपाचार्य फिर ,
    हौले दुर्योधन से बोले ,
    अश्वत्थामा के नयनों में ,
    दहक रहे अग्नि के शोले ।
    ==============
    घोर विघ्न को किंचित हीं ,
    पुरुषार्थ हेतु अवसर माने ,
    अश्वत्थामा द्रोण पुत्र ,
    ले चला शरासन तत्तपर ताने।
    ==============
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  • दुर्योधन कब मिट पाया:भाग-33

    अश्रेयकर लक्ष्य संधान हेतु क्रियाशील हुए व्यक्ति को अगर सहयोगियों का साथ मिल जाता है तब उचित या अनुचित का द्वंद्व क्षीण हो जाता है। अश्वत्थामा दुर्योधन को आगे बताता है कि कृतवर्मा और कृपाचार्य का साथ मिल जाने के कारण उसका मनोबल बढ़ गया और वो पूरे जोश के साथ लक्ष्यसिद्धि हेतु अग्रसर हो चला। 
    ========
    कृपाचार्य कृतवर्मा सहचर
    मुझको फिर क्या होता भय, 
    जिसे प्राप्त हो वरदहस्त शिव का
    उसकी हीं होती जय।
    ========
    त्रास नहीं था मन मे  किंचित
    निज तन मन व प्राण का,
    पर चिंता एक सता रही
    पुरुषार्थ त्वरित अभियान का।
    ========
    धर्माधर्म  की  बात नहीं
    न्यूनांश ना मुझको दिखता था,
    रिपु मुंड के अतिरिक्त ना
    ध्येय अक्षि में टिकता था।
    ========
    ना सिंह भांति निश्चित हीं 
    किसी एक श्रृगाल की भाँति,
    घात लगा हम किये प्रतीक्षा
    रात्रिपहर व्याल की भाँति।  
    ========
    कटु  सत्य है दिन में लड़कर
    ना इनको हर सकता था,
    भला एक हीं  अश्वत्थामा 
    युद्ध  कहाँ लड़ सकता  था?
    ========
    जब तन्द्रा में सारे थे छिप कर
    निज अस्त्र उठाया मैंने ,
    निहत्थों पर चुनचुन कर हीं
    घातक शस्त्र चलाया मैंने।
    ========
    दुश्कर,दुर्लभ,दूभर,मुश्किल
    कर्म रचा जो बतलाता हूँ , 
    ना चित्त में अफ़सोस बचा
    ना रहा ताप ना पछताता हूँ। 
    ========
    तन मन पे भारी रहा बोझ अब
    हल्का  हल्का लगता है,
    आप्त हुआ है व्रण चित्त का ना
    आज ह्रदय में फलता है।  
    ========
    जो सैनिक  योद्धा  बचे हुए थे
    उनके  प्राण प्रहारक  हूँ , 
    शिखंडी  का  शीश  विक्षेपक  
    धृष्टद्युम्न  संहारक  हूँ।
    ======== 
    जो पितृवध से दबा हुआ
    जीता था कल तक रुष्ट हुआ,
    गाजर मुली सादृश्य  काट आज
    अश्वत्थामा तुष्ट  हुआ। 
    ========
    अजय अमिताभ सुमन
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  • दुर्योधन कब मिट पाया:भाग-32

    इस क्षणभंगुर संसार में जो नर निज पराक्रम की गाथा रच जन मानस के पटल पर अपनी अमिट छाप छोड़ जाता है उसी का जीवन सफल होता है। अश्वत्थामा का अद्भुत पराक्रम देखकर कृतवर्मा और कृपाचार्य भी मरने मारने का निश्चय लेकर आगे बढ़ चले।
    ========
    कुछ क्षण पहले शंकित था मन
    ना दृष्टित थी कोई आशा ,
    द्रोणपुत्र के पुरुषार्थ से
    हुआ तिरोहित खौफ निराशा।
    =======
    या मर जाये या मारे
    चित्त में कर के ये दृढ निश्चय,
    शत्रु शिविर को हुए अग्रसर
    हार फले कि या हो जय।
    =======
    याद किये फिर अरिसिंधु में
    मर के जो अशेष रहा,
    वो नर हीं विशेष रहा हाँ
    वो नर हीं विशेष रहा ।
    =======
    कि शत्रुसलिला में जिस नर के
    हाथों में तलवार रहे ,
    या क्षय की हो दृढ प्रतीति
    परिलक्षित संहार बहे।
    =======
    वो मानव जो झुके नहीं
    कतिपय निश्चित एक हार में,
    डग योद्धा का डिगे नहीं
    अरि के भीषण प्रहार में।
    =======
    ज्ञात मनुज के चित्त में किंचित
    सर्वगर्भा काओज बहे ,
    अभिज्ञान रहे निज कृत्यों का
    कर्तव्यों की हीं खोज रहे।
    =======
    अकम्पत्व का हीं तन पे मन पे
    धारण पोशाक हो ,
    रण डाकिनी के रक्त मज्जा
    खेल का मश्शाक हो।
    ========
    क्षण का हीं तो मन है ये
    क्षण को हीं टिका हुआ,
    और तन का क्या मिट्टी का
    मिटटी में मिटा हुआ।
    ========
    पर हार का वरण भी करके
    जो रहा अवशेष है,
    जिस वीर के वीरत्व का
    जन में स्मृति शेष है।
    ========
    सुवाड़वाग्नि सिंधु में नर
    मर के भी अशेष है,
    जीवन वही विशेष है
    मानव वही विशेष है।
    ========
    अजय अमिताभ सुमन
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  • दुर्योधन कब मिट पाया:भाग:31

    जिद चाहे सही हो या गलत  यदि उसमें अश्वत्थामा जैसा समर्पण हो तो उसे पूर्ण होने से कोई रोक नहीं सकता, यहाँ तक कि महादेव भी नहीं। जब पांडव पक्ष के बचे हुए योद्धाओं की रक्षा कर रहे जटाधर को अश्वत्थामा ने यज्ञाग्नि में अपना सिर काटकर हवनकुंड में अर्पित कर दिया  तब उनको भी अश्वत्थामा के हठ की आगे झुकना पड़ा और पांडव पक्ष के बाकी बचे हुए योद्धाओं को अश्वत्थामा के हाथों मृत्यु प्राप्त करने के लिए छोड़ दिया ।
    ========
    क्या  यत्न  करता उस क्षण
    जब युक्ति समझ नहीं  आती थी,
    त्रिकाग्निकाल से निज प्रज्ञा
    मुक्ति का  मार्ग  दिखाती  थी।   
    ========
    अकिलेश्वर को हरना  दुश्कर
    कार्य जटिल ना साध्य कहीं,
    जटिल राह थी कठिन लक्ष्य था 
    मार्ग अति  दू:साध्य कहीं।
    =========
    अतिशय साहस संबल  संचय 
    करके भीषण लक्ष्य किया,
    प्रण धरकर ये निश्चय लेकर
    निजमस्तक हव भक्ष्य किया।
    ========
    अति  वेदना  थी तन  में 
    निज  मस्तक  अग्नि  धरने  में ,
    पर निज प्रण अपूर्णित करके 
    भी  क्या  रखा लड़ने  में?
    ========
    जो उद्भट निज प्रण का किंचित
    ना जीवन में मान रखे,
    उस योद्धा का जीवन रण में 
    कोई  क्या  सम्मान रखे?
    ========
    या अहन्त्य  को हरना था या
    शिव के  हाथों मरना था,
    या शिशार्पण यज्ञअग्नि को
    मृत्यु आलिंगन करना था?
    =========
    हठ मेरा  वो सही गलत क्या
    इसका मुझको ज्ञान नहीं,
    कपर्दिन  को  जिद  मेरी थी 
    कैसी पर था  भान कहीं।
    =========
    हवन कुंड में जलने की पीड़ा
    सह कर वर प्राप्त किया,
    मंजिल से  बाधा हट जाने
    का सुअवसर प्राप्त किया।
    =========
    त्रिपुरान्तक के हट जाने से
    लक्ष्य  प्रबल आसान हुआ,
    भीषण बाधा परिलक्षित थी
    निश्चय हीं अवसान हुआ।
    =========
    गणादिप का संबल पा  था
    यही समय कुछ करने का,
    या पांडवजन को मृत्यु देने 
    या उनसे  लड़ मरने  का।
    =========
    अजय अमिताभ सुमन
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  • Man and Nature

    This existence is regulated by strict orderly  pattern and discipline. A Man,on the contrary, by his very own nature desires freedom from everything ,be it any kind of control, discipline, rules, order or regulation etc. He treats the same as different types of bondages. In such a scenario , Conflict between a man and the existence is bound to happen.
    …….
    Birds jump to the branches
    of trees at sunrise,
    But in the morning man
    wrestles with whys.
    ……….
    Why do there seem to be
    too many cuckoos?
    Why chirping so noisy
    what are the clues?
    ……….
    In morning the sleep
    descends from its core,
    and chittering of pigeons
    hurts a man more.
    ……….
    There is a lot of tension
    and a lot of stress.
    Working late at night is a
    suffering a mess.
    ………..
    Yes fatigue on mind,
    whenever Man feels,
    At times, smoking or
    drinking appeals.
    ………..
    At roaming late night
    the cosmos retort.
    A Reckless freedom is
    not its support.
    …………
    Be it testy coca-cola or
    a pizza or a cake,
    Nature always opposes
    without a mistake.
    …………
    The sweet, the chicken,
    the fish, juicy curd,
    The cosmos advises
    that these are absurd.
    …………
    While Orderly pattern is
    nature’s workforce,
    But freedom is nature of
    a man of course.
    ………..
    As many are options and
    choices so gobs.
    A Man and this nature
    are always at odds.
    ………….
    Ajay Amitabh Suman
    All Rights Reserved

  • विगत साल भी बीत गया

    अनगिनत शक्तिशाली महान राष्ट्रों को धराशायी करते हुए ,मानव के स्वछंदिता, संप्रभुता एवं अहम भाव को अनुशासित, मर्यादित करते हुए और शोक संदेशो से भरे हुए गुजरे साल की अच्छी बात ये है कि बुरे वक्त को भी बीत जाना होना है और ये भी बीत गया।

    जग हारा अंतक जीत गया
    आमोद  मोद मधुगीत गया,
    थे तन्हा तन्हा रात दिन  वक्त 
    शोकाकुल  व्यतीत गया।
    ==========
    कुछ राष्ट्र   बड़े जो  बनते थे
    दीनों  पर तनकर  रहते थे ,
    उनकी मर्यादा अनुशासित वो
    अहमभाव अपनीत गया।  
    ===========
    खाली  खाली  सारी सड़कें
    थी  सुनीं  सुनी  सब गलियां,
    जीवन की वीणा  बजती ना
    वो  राग मधुर   संगीत गया। 
    ===========
    गत साल भरा था काँटों से
    मन शंकित शंकित रहता था,
    शोक  संदेशे   सुन सुन कर 
    उर का सारा वो गीत गया।
    ===========
    मदमाता सावन आया कब
    कब कोयल कूक सुनाती थी,
    विस्मृत   बाग   में फूलों  के
    हिलने  डुलने का रीत गया।
    ===========
    निजनिलयों में रहकर जीना
    था डर का विषप्याला पीना,
    बढ़ती दुरी  थी  अपनों में  वो
    अपनापन  वो प्रीत  गया।
    ===========
    तन पर तो  थोड़े चोट  पड़े
    पर  मन पर  थे  वो बड़े बड़े ,
    अब तक चित्त पर जो हरे भरे
    देकर  कैसा अतीत गया। 
    ===========
    पर बुरी  बात  की एक बात
    अच्छी सबको हीं लगती है,
    जो दौर बुरा ले विगत साल
    आया था अब वो बीत गया।
    ===========
    बाधा आती हैं आयेंगी जग
    में जीवन  कब रुकता है,
    नए आगत का स्वागत मन से
    ऊर्जा आशा संप्रीत नया।
    ===========
    चित्त के  पल्लव  मुस्काएंगे
    उल्लास  कुसुम छा जाएंगे,  
    नव साल पुनः  हम गायेंगे  
    जीवन का न्यारा गीत नया।  
    =========== 
    अजय अमिताभ सुमन:
    सर्वाधिकार सुरक्षित

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