2 Comments

  1. मकड़ी जैसे हीं मकड़ी का,
    जाल बिछाते धीरे से।

    यही देश में आग लगाते.
    और राख की बात फैलाते ,
    क्या बात है !बहुत सुन्दर एवं यथार्थ परक पंक्तियां।

Leave a Reply