Author: Bhawna Sati

  • घर वापिस बुलाए कोई।

    मैं दूर आ चला हूं घर से बहुत,
    मुझे वापिस घर बुलाए कोई,

    ये शहर अजनबियों का मेला लगता है
    यहां मुझे अपना बताए कोई

    मैं आवारा घूम रहा हूं इन गलियों में कब से
    मुझ भटकते को ठिकाना दिखाए कोई

    अरसा हो गया उसे गए हुए दूर मुझसे
    वो अब नहीं आएगी, मुझ बावरे को ये समझाए कोई

    हो गया है पत्थर अब ये दिल मेरा
    मुझे अपना बता कर मुझे फिर रुलाए कोई

    मैं बेहिसाब सोचता हूं, बेमतलब बातों पर
    मुझे काम में उलझाकर मेरा ध्यान हटाए कोई

    सफ़र ये अब थकाने लगा है,
    मुझे गले से लगा कर आराम दिलाए कोई

    मैं दूर आ चला हूं घर से बहुत,
    मुझे वापिस घर बुलाए कोई!!

  • सिर्फ़ वो

    आज फिर मुलाकात हुई उससे,
    किसी और के ज़रिए,
    किसी की बातों में उसका ज़िक्र आया।
    किसी ने फिर से खोल के रखी उसकी बातें।
    किसी ने फिर याद दिलाया वो पुराना फलसफा।
    किसी ने फिर बताई उसकी शिकायतें।
    किसी ने फिर पूछ लिया उसका हाल।
    किसी ने फिर जीवंत कर दिए पुराने जज़्बात।
    किसी ने फिर छेड़े शून्य हुए दिल के तार।
    किसी ने फिर सोचने में मजबूर किया उसके लिए।
    किसी ने फिर दिलाया उसके होने का एहसास।
    किसी ने फिर बताया उसके जीवन में होने का महत्व।
    किसी ने फिर पिटारा खोल दिया उन तमाम खातों का।
    किसी ने फिर उधेड़ दिया सिले हुए ज़ख्मो को।
    किसी ने फिर दिया अप्रत्यक्ष रूप से उसका संदेश।

    उसे भूलने की कड़ी में,
    हर बार कोई आया
    और जोड़ गया उन सारी भुलाई कड़ियों को
    उसकी यादों के साथ
    और अंत में रह गई
    उसकी यादें, उसकी बातें, उसका होना,
    अप्रत्यक्ष रूप से सिर्फ़ वो!!

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