आज फिर मुलाकात हुई उससे,
किसी और के ज़रिए,
किसी की बातों में उसका ज़िक्र आया।
किसी ने फिर से खोल के रखी उसकी बातें।
किसी ने फिर याद दिलाया वो पुराना फलसफा।
किसी ने फिर बताई उसकी शिकायतें।
किसी ने फिर पूछ लिया उसका हाल।
किसी ने फिर जीवंत कर दिए पुराने जज़्बात।
किसी ने फिर छेड़े शून्य हुए दिल के तार।
किसी ने फिर सोचने में मजबूर किया उसके लिए।
किसी ने फिर दिलाया उसके होने का एहसास।
किसी ने फिर बताया उसके जीवन में होने का महत्व।
किसी ने फिर पिटारा खोल दिया उन तमाम खातों का।
किसी ने फिर उधेड़ दिया सिले हुए ज़ख्मो को।
किसी ने फिर दिया अप्रत्यक्ष रूप से उसका संदेश।
उसे भूलने की कड़ी में,
हर बार कोई आया
और जोड़ गया उन सारी भुलाई कड़ियों को
उसकी यादों के साथ
और अंत में रह गई
उसकी यादें, उसकी बातें, उसका होना,
अप्रत्यक्ष रूप से सिर्फ़ वो!!
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