मैं दूर आ चला हूं घर से बहुत,
मुझे वापिस घर बुलाए कोई,
ये शहर अजनबियों का मेला लगता है
यहां मुझे अपना बताए कोई
मैं आवारा घूम रहा हूं इन गलियों में कब से
मुझ भटकते को ठिकाना दिखाए कोई
अरसा हो गया उसे गए हुए दूर मुझसे
वो अब नहीं आएगी, मुझ बावरे को ये समझाए कोई
हो गया है पत्थर अब ये दिल मेरा
मुझे अपना बता कर मुझे फिर रुलाए कोई
मैं बेहिसाब सोचता हूं, बेमतलब बातों पर
मुझे काम में उलझाकर मेरा ध्यान हटाए कोई
सफ़र ये अब थकाने लगा है,
मुझे गले से लगा कर आराम दिलाए कोई
मैं दूर आ चला हूं घर से बहुत,
मुझे वापिस घर बुलाए कोई!!
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