Dharamveer Verma, Author at Saavan's Posts

निगाहों में आ गयीं

निगाहों में आ गयीं

शाम फिर खिसक कर, निगाहों में आ गयी बांते कुछ उभरकर, आंखों में छा गयीं अब रात हो रही है, मैं कहाँ ही अकेला हूँ मैं हूँ, और लंबी रातें हैं, यादों का लंबा मेला है न मैं सोता हूँ, न सोती हैं ये मेरी यादें पूरी-पूरी रातों का यही तो झमेला है जागते-जागते सूरज की लालिमा आ गयी भोर होने लगी, सुहानी सुबह आ गयी तभी तो दिखने लगा सब आंखों में लाली छा गयी बातें कुछ बिसरी सी, आंखों में फिर से छा गयी 2-दिल चुपचाप ... »

हे। कृष्ण तुम्हें फिर आना होगा

हे। कृष्ण तुम्हें फिर आना होगा हे। कृष्ण तुम्हें फिर आना होगा फुफकारों से भरी वसुंधरा आकर उसे मिटाना होगा विष फैलाते असंख्य कालिया आकर मर्दन दिखाना होगा काट शीश को दुष्ट पापियों के सुर्दशन तुम्हें चलाना होगा हे। कृष्ण तुम्हें फिर आना होगा हे। कृष्ण तुम्हें फिर आना होगा। आस्तीनों में सांप पल रहे रिश्ते-रिश्तों को नित डस रहे किसे बताएं अपना साथी किस पर हम विश्वास करें हर रिश्ता, अब कंस बन गया अब कैस... »

कितना कहर ढाया होगा

आज आंखों ने कितना कहर ढाया होगा देखकर, फौजी बेटे का धड़ माँ का दिल भर आया होगा पिलाने को अंतिम स्नेह अमृत बुझाने को ममतामयी प्यास उसके पावन स्तनों का दूध आज फिर उतर आया होगा आज आंखों ने कितना कहर ढाया होगा उठता नहीं है बोझ तिनके का भी बुढ़ापे में उस जर्जर बाप से किस कदर उसने बेटे का शव उठाया होगा उठाकर कांधे पे कैसे उसने चिता पर लिटाया होगा देकर मुखाग्नि उसको क्या सागर की गहराई सा दिल उसका भर नहीं... »

वृद्ध की अभिलाषा

एक-एक करके चले गए, जो बने थे मेरे सब अपने क्रम-क्रम से बिखर गये वो सुन्दर रचित मेरे सपने अब तो तन्हा हूँ, तन्हाई है बाकी कुछ अब शेष नहीं सब मिट गया, इक अधंड में बाकी कुछ अवशेष नहीं मात्र जिन्दा हूँ, मरा नहीं मरना अभी शेष है बाकी शरीर उठाये फिरता हूँ जिसमें हड्ड है, लहू नहीं है बाकी। यादों का सुन्दर झोंका फागुन का, अहसास कराता है हंसाता है, रुलाता है, मुझकों पतझड़ बनाकर जाता है इस जर्जर देह पर इक त... »

वक्त से गुजारिश

उस सूखे पेड़ पर क्या चिड़िया फिर न चहचहाएंगी सूख गया जो शजर वक्त की बेवक्त मार से क्या उस शजर की डालियाँ फिर न लहराएगी जिन्दगी बन गयी गुमसुम और, हम गुमनाम बनकर रह गए क्या जीवन में खुशियों की वो घडियां, कभी लौटकर न आएंगी आखिर क्या उदासी ही छाई रहेगी इधर कभी खुशियाँ इधर न आएंगी। 2-वक्तकी मार से झुलसी हुई जमीं क्या सूखे से बच, पुनः जीवित हो जाएगी सूख गई जो फसलें, इक- इक पल के इन्तजार में क्या पलटेगी ... »