कोई ख्याल है जो बस गया है दिल में
इक सवाल है जो उठता रहता है बार बार
जिंदगी हो रही है बसर, मगर
मर रहा हूं मैं बार बार
Author: Kapil Singh
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मर रहा हूं मैं बार बार
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बाकी सब ले गया मेरा ‘सब कुछ’
कुछ हर्फ़, चंद अहसास और कुछ खारे से मोती
यही सब बचा है मेरे पास,
बाकी सब ले गया मेरा ‘सब कुछ’ -
कोई खिडकी न खुले और गुजर जाऊं मैं
हादसा ऐसा भी उस कूचे में कर जाऊं मैं
कोई खिडकी न खुले और गुजर जाऊं मैंसुबह होते ही नया एक जजीरा लिख दूं
आज की रात अगर तह में उतर जाऊं मैंमुन्तजिर कब से हूं इक दश्ते करामाती का
वह अगर शाख हिला दे तो बिखर जाऊं मैंजी में आता है कि उस दश्ते सदा से गुजरूं
कोई आवाज ना आये तो किधर जाऊं मैंसारे दरवाजों पे आईने लटकते देखूं
हाथ में संग लिये कौन से घर जाऊं मैं -
मैं पानी का आईना हूं
टूटता हूं फिर से जुड जाता हूं
मैं पानी का आईना हूंघर से लिये हूं रात का सूरज
कहने को मिट्टी का दीया हूंगले गले है पानी लेकिन
धान की सूरत लहराता हूंरस की सोत बनेगी दुश्मन
गन्ने सा चुप सोच रहा हूं -
गायब हर मंजर मेरा
गायब हर मंजर मेरा
ढूढ़े परिंदा घर मेराजंगल में गुम फ़स्ल मेरी
नदी में गुम पत्थर मेरादुआ मेरी गुम सर सर में
भंवर में गुम महवर मेरानाफ़ में गुम सब ख्वाब मेरे
रेत में गुम बिस्तर मेरासब बेनूर क्यास मेरे
गुम सार दफ़्तर मेराकभी कभी सब कुछ गायब
नाम कि गुम अक्सर मेरामैं अपने अंदर की बहार
बानी क्या बाहर मेरा -
तेरी सदा का है सदयों से इन्तेजार मुझे
तेरी सदा का है सदयों से इन्तेजार मुझे
तेरे लहू के समंदर जरा पुकार मुझेमैं अपने घर को बुलंदी पे चढ के क्या देखूं
उरूजे फन! मेरी देहलीज पर उतार मुझेउबलते देखी है सूरज से मैनें तारीकी
न रास आएगी यह सुबह जरनिगार मुझेकहेगा दिल तो मैं पत्थर के पॉव चूमूंगा
जमान लाख करे आके संगसार मुझेवह फ़ाका मस्त हूं जिस राह से गुजरता हूं
सलाम करता है आशोब रोजगार मुझे