देखती हूँ चांद को – लगता है बहुत भला , सोचती हूँ कईं बार – अगर आह्वान करूं चांद का क्या आएगा चांद धरती पर? अगर आ भी गया तो बदले में कन्या रत्न ना […]

आसमां के तारों में वो एक सितारा क्यों लगता है अपना सा। पलकें बंद कर देखूं तो सब क्यों लगता है सपना सा। बाहें किरणों की पसरा कर वह देख मुझे मुस्काता है। बस वही […]

महक रही है फिजा कुछ इस तरह, खुली पलकों में तसव्वुर अब पलने लगे है। पिंघल रही है चांदनी कुछ इस तरह , ख्याल तेरे गज़लों में अब ढलने लगे है। उभर रही है आंधियां […]

शीशे का एक महल तुम्हारा, शीशे का एक महल हमारा. फिर पत्थर क्यों हाथों में आओ मिल बैठें , ना घात करें । प्रीत भरें बीतें लम्हों को, नवदीप जलाकर याद करें – पूनम अग्रवाल

मेघों में फंसे सूरज, तुम हो कहाँ? सोये से अलसाए से, रश्मी को समेटे हुए, तुम हो कहाँ ? मेरे उजालों से पूछों – मेरी तपिश से पूंछो- सूरज हूँ पर सूरज सा दीखता नहीं […]

ट्रेन के डस्टबिन के पास मैले -कुचेले फटेहाल वस्त्रों से अपना तन ढकती, गोद में स्केलेटन सा बिलखता बच्चा थामे, डालती है अपना हाथ डस्टबिन में वो । कचरे के बीच बचे -खुचे खाने से […]

तुम्हें न देखा न स्पर्श किया, नाही सुना है अब तक पर तुम कितने खास बन गए हो, तुम्हारे आने की जब से हुई है दस्तक ! तुम्हारे आने का इन्तजार है अब तुम्हे पाने […]