नवदीप

शीशे का एक महल तुम्हारा,
शीशे का एक महल हमारा.

फिर पत्थर क्यों हाथों में
आओ मिल बैठें , ना घात करें ।

प्रीत भरें बीतें लम्हों को,
नवदीप जलाकर याद करें

– पूनम अग्रवाल

Comments

3 responses to “नवदीप”

  1. Anirudh sethi Avatar

    बेहतरीन कवित पूनम जी

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