Author: Viraat

  • नवसंवत्सर को नज़राना

    फाल्गुन की ब्यार में,
    कोयल की थी कूक

    गिरते हुए पत्तों की सरसराहट
    उर में उठाती थी हूक॥

    जीवंत हो उठी झंझाएँ
    मानो कुछ कहती थीं

    रह-रहकर आती चिड़ियों की चहचहाहट
    निज क्रंदन का राग सुनाती थीं।

    बलखाती-लहराती वृक्षों की डाली,
    मानो मुझे बुलाती थीं।

    सन्नाटे उस उजली धूप के,
    स्पष्ट सुनाई देते थे

    झिलमिलाती किरणें आ पत्तों के बीच से,
    प्रकाशमय वर्णों को कर जाती थीं,

    त्वरित-घटित निज गाथाओं
    याद मुझे दिलाती थीं

    मानव-उर के निजी क्रंदन का,
    दुर्लभ अनुभव मुझे कराती थीं॥

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