हे मानस सुत , मात धरणि के,
क्यों निज कुटुंब से बैर करे।
पीर हरण न कर सके स्वजन जो,
तो क्यों शीर धर धारण तेज़ किए।
दिया अमिट है, घाव रक्तपात से,
लिया न सुध निज अभिमान में ।
कैसे करूं आभार व्यक्त माँ धरणि की,
‘आभारी’ शब्द बिन जिह्व हुए।
ना समझो सरस बात ये कोरी,
समेटे कितने हैं राज़ ये काल के हाथ धरे।
अगर पुष्प की चाह हुई तो,
काटों से हाथ डरे ना डरे ।
मिले पुष्प रुपी अभिलाषा या,
कुछ अहित नवीन खिल मधुर पड़े।
धन्यवाद उस मात धरणि को ,
जिनकी कोख, आँचल में पले बढ़े।
हो सके भले ही ना भला मात का तो भी,
मन मलिन अंतर्रुदन कर आभार करे।
Author: Vishal Bhoomihar
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मैं धुंध शीत शीतलहरी भी ,
हूं ज्येष्ठ की तपती गरमी भी।
मैं आभा, मोहक प्रकृति की,
विश्वपटल, निज अंतिम भी।हैं अतिशय परिवर्तन रुप मेरे,
मैं दैत्य भँवर विवर्तन भी ।
मैं शान्त शालिनी जोगन सी,
हूँ ज्वार!, सरिस विनाशन भी।निज के अगण्य संतान हुए,
ले परिवर्तन अंतर्धान हुए।
हाँ! हैं,वे नित्य अवलंब मुझी से,
कभी जड़ तो कभी चेतन रहते।बहुदा हैं देखें हर्ष हम्हीं नें ,
कहो वसंत या नवमंगल मेले।
हाँ!, विपदा भी भारी देखा है,
कब आँखों ने अश्रु ना उड़ेला है।प्रतिपल मिलते नए रंग हमें,
तो प्रतिपल ही होते शोर घनेरे।
बहु विचित्र चित्र हैं, बनती मेरी,
क्या लिखोगे?, मेरी आत्मनिहारी! -
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हे परमतेज! , हे परमतपस्वी !
तुम कब किस देह में रहते हो ?
नहीं दिखते, रहते ओझल निरंतर,
जाने कब किधर विचरते हो ?हुआ उदय अकाल! हर्ष-उल्लास सहित,
जाने कब नूतन फूटेगा ?
निज निशा-दिवाकर भी तरसे,
जाने कब तेज-तपस्वी उठेगा।हां! हुई निरंतर आशा कंटक,
बस राई सा आस बच पाया है।
नहीं भाष-आभाष किसलय का किधर भी,
यह बात असह्य निज-निर्जन है।क्यूँ ? लेते नहीं अवतार हो अवतरण,
आख़िर कब तक चित्कार दिखाओगे ?
हाँ! देख लिया स्व क्षत-विक्षत देह का,
अब तो रुदन भी निज का गरल शत्रु है।हुयी दीन-हीन रुप स्वमेव की,
मैं प्रकृति माया की आभा हूँ ।
बस कर दे, मेरा उद्धार अंतक्षण में,
यहां मृत कामना भी सुख शाया है।हुई असह्य, ये अगण्य नव वेश्या,
काल निष्ठुर अति मर्दन है ।
हे! तेज-तपस्वी दिग्विजयी, आतप हो उद्धार करो,
हरो निज का विपदा, ना बेबस बरस निष्प्राण करो।