हे मानस सुत , मात धरणि के, क्यों निज कुटुंब से बैर करे। पीर हरण न कर सके स्वजन जो, तो क्यों शीर धर धारण तेज़ किए। दिया अमिट है, घाव रक्तपात से, लिया न […]

मैं धुंध शीत शीतलहरी भी , हूं ज्येष्ठ की तपती गरमी भी। मैं आभा, मोहक प्रकृति की, विश्वपटल, निज अंतिम भी। हैं अतिशय परिवर्तन रुप मेरे, मैं  दैत्य  भँवर  विवर्तन  भी । मैं शान्त शालिनी […]

हे परमतेज! , हे परमतपस्वी ! तुम कब किस देह में रहते हो ? नहीं दिखते, रहते ओझल निरंतर, जाने कब किधर विचरते हो ? हुआ उदय अकाल! हर्ष-उल्लास सहित, जाने कब नूतन फूटेगा ? […]