बर्बाद-ओ-बेकस1 दिल का कोई सहारा भी हो,
उनके मकाँ-ए-दिल में एक कोना हमारा भी हो।
जो बात ज़ेहन 2 में थी, वो ज़ुबाँ पर आ न सकी,
कहा नहीं हमने जो, शायद उन्होंने सुना भी हो।
शाम-ओ-सहर 3 उनके ख़्यालों में खोए रहते हैं,
तसव्वुर 4 में उनके, इक ख़्याल हमारा भी हो।
आए हैं कई सारे ख़त हमें चाहने वालों के आज,
इन ख़तों में कोई ख़त काश उनका लिखा भी हो।
हमारी हर नज़्म-ओ-लफ़्ज़ में बस वही हैं नज़र,
उनकी बातों में कभी तो ज़िक्र हमारा भी हो।
1. तबाह और मजबूर; 2. मन; 3. शाम और सुबह; 4. कल्पना।
यह ग़ज़ल मेरी पुस्तक ‘इंतज़ार’ से ली गई है। इस किताब की स्याही में दिल के और भी कई राज़, अनकहे ख़यालात दफ़्न हैं। अगर ये शब्द आपसे जुड़ पाए, तो पूरी किताब आपका इंतज़ार कर रही है। – पन्ना
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