Barbarta

Note: एक छोटी सी कविता यह दर्शाते हुए की किस तरह एक भीड़ दंगो का रूप ले लेती है और कौन उसे इतना भड़काता है


बर्बरता


वोह बोले हमसे वार करो,

न चुप बैठो प्रहार करो,

जो औरत, बूड़े, बच्चे आये,

टूकड़े तुम हज़ार करो ।

आतंकी रथ सवार करो,

और मृत्यु का प्रचार करो,

यमलोक भी थर-थर कांप उठे,

ऐसा भीषण नरसंहार करो ।

असुरो को त्यार करो,

और मानवता की हार करो,

धरती का धड़ चीर-फाड़ के,

नर्क का तुम आविष्कार करो ।

विवेक का भहिष्कार करो

बर्बरता का विस्तार करो

सत्ता पर हम जड़े जमा लें,

सपना तुम साकार करो ।

-पियूष निर्वाण

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