मुक्तक

मैं हर बात पर रूठ जाता हूं

जरा सी बात में टूट जाता हूं , गुस्से से आकर फुट जाता हूँ। लोग समझते है आदत है मेरी मैं हर बात पर रुठ जाता हूँ। हृदय पर हल्की घाट होती है, बिना बात की बात होती है। बढ़ जाता है द्वेष का किस्सा, फिर मन मे खुराफात होती है।। गलतफहमी धीरे से बढ़ जाती है। गुरुर दिमाग में गढ़ जाती है। मन मे बनती है ख्याली पुलाव, कुछ और ब्यथा बढ़ जाती है।। बुराई का मैं सरताज नही हूँ। बुझदिलों का आवाज नही हूँ। प्रलयकारी होता है... »

प्रेम कविता

प्रेम कवितासबने प्रेम पर जाने क्या-क्या लिखा फ़िर भी अधूरी ही रही हर प्रेम कविता »

Barsaat

इन हाथों में अरसों तक थी उनके हाथ की खुशबु। जैसे रातरानी से महकती रात की खुशबु। इत्र हो गई जो बूंदें लिपटकर उनसे, दुनिया को ये भरम कि ये बरसात की खुशबु। »

माईने

सच और झूठ के माईने बदल गए, ऐसा हुआ क्या के आईने बदल गए, साध के बनाई जब हाथों की लकीरें, तो राहों में लोग क्यों लाईने बदल गए, राही अंजाना »

दिखावे के प्यार

दिखावे के प्यार दिखावे का खुला आसमां मिला जब भी उड़ना चाहा मुझको बस नीचे का रास्ता मिला »

बिजली चले जाने पर हम

बिजली चले जाने पर हम रात चांद के तले बिताते हैं क्रंक्रीट की छत पर बैठ हम प्रकृति को कोसते हैं हवाओं से मिन्नते करते शहरों की छतों पर तपती गरमी में नई सभ्यता रचते दौड़ जाती हमारी आवेषों में बिजली कंदराओं के मानव आग की खोज में इतरा रहा था एडिषन एक बल्ब में इतना परेषान था हम उस बिजली के लिए शहरों में तपते छतों में इतिहास नहीं बने हवाओं के बहने और पानी के बरसने में हमने रूकावटे खड़ी कर दी क्रंक्रीट की ... »

हुकूमत बदल जाओ

चंद वक्त ले लो दुनिया भी बदल लो। एक एहसान करो तुम ही बदल जाओ आजकल में चीखों को सुनो फिर सोचो क्या तुम काबिल हो। एक बार तुम घर में बैठ जाओ देखों लोग कैसे बदलते हैं- जमाना। बस तुम चले जाओ देखो की कैसे बदलता है सबका जीवन तुम सब जिम्मेदार बनो तो जानो की कैसे बदलता है हुकूमत की सत्ता देखो कैसे बनते लोग तख्त तुम उलट जाओ फिर देखो बदलती नई तस्वीर। जिंदा है हम तैयार हैं बस तुम चले जाओ अबकी बार हमें बैठाओ ह... »

पहरा

ख्वाबों ख्यालों में किसी का कोई पहरा नज़र नहीं आता, जो नज़र में आता तो उसका कोई चहरा नज़र नहीं आता, घूमती गुमराह सी नज़र आती हैं जो खामोश राहें हमको, उन राहों पे ढूंढ़े से दूर तलक कोई ठहरा नज़र नहीं आता, राही अंजाना »

मुक्तक

तेरे बग़ैर तेरी तस्वीरों का क्या करूँ? मैं तेरे ख़्यालों की जंज़ीरों का क्या करूँ? अश्क़ों को छुपा लेता हूँ पलकों में लेकिन- मैं तेरे सपनों की ज़ाग़ीरों का क्या करूँ? मुक्तककार- #मिथिलेश_राय »

शिकार

शिकार करने चली थी बाज का, हुस्न के गुरूर मे ।। हँसी थामे ‘सच’ कहू … पर भी ना मिला कबुतर का ।। ~ सचिन सनसनवाल »

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