मुक्तक

आईना

अपने को आप से मिलाने का जरिया है आईना । जज्बातों से लड़ने का दरिया है आईना ।। »

कामयाबी

ठोकर लगने पर भी आगे मैं बढ़ता जाऊंगा कैसा भी हो कामयाबी का रास्ता हर तरीके को अपनाउँगा जरूरत पड़ी तो खुद को मैं जलाऊंगा छू लूंगा आसमान धुआं मैं बन जाऊंगा »

नाक घुसाओगे

अगर धर्मात्मा इतने ही हो तुम तुम्हें पूरा हिंदुस्तान दिलवाएँगे पर करनी होगी देश की सेवा हर गली में नारा लगवाएँगे तुम बस भड़काने वालों में से हो जो आग लगाकर पीछे हट जाएंगे बनवा दो पूरे भारत में इंसानियत के मंदिर मस्जिद करोड़ों लोगों की दुआएं तुम्हें दिलवाएंगे पर तुम्हें वास्ता अलगाव से है बस अयोध्या की 66 करोड़ एकड़ जमीन मे ही अपनी नाक घुसाओगे. »

अयोध्या

इंतज़ार मे सब खड़े है जाने क्या निकलेगा अयोध्या की गहराई में. जैसे-जैसे खुदाई गहरी होती जाती है लोगों के दिल की धड़कन बढ़ती जाती है जाने अब क्या निकल आएगा खुदाई में. परिणाम अपने आप ही निकल आएगा देखे कितना सच है किसकी कितनी सच्चाई मे. अयोध्या को खोदने की जरूरत कभी ना पड़ती वही स्मारक बन जाते हिन्दू मुसलमान की यादों की अच्छाई में. »

राम नाम

राम – राम कहके ही मिलना अच्छा लगता है, राम – नाम का धागा ही एक सच्चा लगता है, पृथ्वी पर आने जाने का एक रस्ता दिखता है, मानव रूप में राम रंग ही एक पक्का लगता है।। राही अंजाना »

दर्द

दर्द

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किताबें

किताबें दोस्त थी मेरी, दुख सुख की साथी, अकेलेपन में किसी की कमी ना खलने देने वाली, हंसती मुस्कुराती। मुझे जहां भी कोई किताब मिल जाती मेरे पुस्तकालय में सुशोभित हो जाती। इंटरनेट ने तो कहीं का ना छोड़ा लोगों ने किसानों से नाता ही तोड़ा। सूनी पड़ी रहती पुस्तकालय एक बटन दबाते ही फोन में सब कुछ आ जाता। पर किताबें हमसे बहुत कुछ कहती हैं जो यह फोन नहीं कह पाता। निमिषा सिंघल »

खुदगर्ज

सोचो अगर हर जीव खुदगर्ज हो जाता पल पल हर पल थम सा जाता ना पेड़ देता फल कोई वह पेड़ पर ही सड़ जाता वह जाओ ना देते तो पथिक रास्ता कैसे तय कर पाता नदिया जो पानी ना देती हर जीव प्यासा मर जाता वह समंदर में ना गिरती तो हर घर पानी में बह जाता ना मां देती जन्म बच्चे को जीवन मरण चक्कर रुक जाता जो हो जाती खुदगर्ज वह कोई घर नहीं बस पाता हवा अगर थम जाती तो दम सभी का घुट जाता वह ना हर जगह बहती तो जीवो का प्राण... »

मोह

उड़ चलता है हर पक्षी घोंसला बनाने होते ही उम्मीदों का सवेरा श्याम को थक्कर ढूंढता फिरे अपना ही रैन बसेरा भटकती फिरे हर मधुमक्खी फूल फूल पत्ता पत्ता करके शहद इकट्ठा हजारों फूलों को छानती बार-बार पहुंचती देखने अपना छत्ता इंसान भी मोह का पुलिंदा हैमो परिवार की फिकर उसे सताती रहती है मुंह के बस में हर प्राणी सृष्टि सारी यही कहती है »

भौर

बाला घट भरने चल पड़ी भौर की लालिमा नभ मे बिखर पड़ी पगो से रोंदते हुए ओंस की बूँद बाला पनघट की ओर मुड़ चली. रस्सी खींचती सुकोमल हाथों से बिन कहे ही कहती बातें आँखों से हार गया तुम्हारी मनमोहनी चालो से सुंदरता का बखान कैसे करू मै तुछ बातों से. घट सर पर रख मंद- मंद मुस्काए नखरे करें और खूब इतराए कमरिया तेरी लचकती जाये अधजल गगरी छलकती जाये. देखता उसे मै रह गया गाँव की गलियों मे वो खो गई कुछ डग भरे उसकी ओ... »

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