इक मुखौटा है, जिसे लगा कर रखता हूँ,
जमाने से ख़ुद को मैं छुपा कर रखता हूँ।
दुनिया को सच सुनने की आदत नहीं,
सच्चाई को दिल में दबा कर रखता हूँ।
जमाने की सूरत देख बस रोना आता है,
झूठी हँसी चेहरे से सटा कर रखता हूँ।
आएगी ज़िंदगी कभी लौट के मेरे पास,
इंतज़ार में पलकें बिछा कर रखता हूँ।
आज इक नया मुखौटा लगाकर आया हूँ,
मैं कई सारे मुखौटे बना कर रखता हूँ।
यह ग़ज़ल मेरी पुस्तक ‘इंतज़ार’ से ली गई है। इस किताब की स्याही में दिल के और भी कई राज़, अनकहे ख़यालात दफ़्न हैं। अगर ये शब्द आपसे जुड़ पाए, तो पूरी किताब आपका इंतज़ार कर रही है। – पन्ना
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