जुगनुओं का क़त्ल करने, काली रात आई है,
माहताबों 1 ने अपनी सूरत, बादलों में छुपाई है।
सहर का नाम मत लो, शब न ख़त्म होगी कभी,
तूफ़ानों के तांडव ने, हर तरफ़ तबाही मचाई है।
मौन है जर्रा-जर्रा 2, ख़ल्क 3 कब से ख़ामोश है,
गुलिस्ताँ उजड़ गए सब, वीरानों की बारी आई है।
इक दीये को ख़त्म करने, हजारों तूफ़ाँ चल पड़े,
रोशनी ने अपनी रूह, अब ज़मीन में दफ़नाई है।
लहू-सा लाल आफ़ताब कब आयेगा, सवाल है,
हर तरफ़, हर जगह बस काली घटा ही छाई है।
1. चाँद; 2. कण-कण; 3. सृष्टि।
यह ग़ज़ल मेरी पुस्तक ‘इंतज़ार’ से ली गई है। इस किताब की स्याही में दिल के और भी कई राज़, अनकहे ख़यालात दफ़्न हैं। अगर ये शब्द आपसे जुड़ पाए, तो पूरी किताब आपका इंतज़ार कर रही है। – पन्ना
Leave a Reply
You must be logged in to post a comment.