Jay Mishra
अनकही
March 30, 2016 in हिन्दी-उर्दू कविता
दिल की दवात से
स्याही लहू का बहता रहा,
कभी वक्त ने मुझको लिखा,
कभी तारीख अपनी मैं लिखता रहा ।
कभी लिखा बेमुकद्दर दस्ताने-जीस्त अपनी,
कभी अस्क बहाती आरज़ूओं को कहता रहा ।
कभी लिखी खोई खनक ख्वाबों की,
कभी दर्द वसल का सहता रहा ।
पर लिख न पाया दूरियाँ उन फासलों की
जो दरमियाँ थी फलक और ज़मीं में,
और लिख न पाया दर्द उन पलों की
ख्वाईश जिसे जीने की, बदल न पाया यकीं में ।
लिख न पाया उस प्यास को
कागज़ों से रिसते लहू से जिसे भिगोता रहा ।
लिख न पाया उस अनजानी आस को
सीने के अन्तर में हरदम जो सोता रहा ।
कही हर बात जितनी वो चुप हैं, खामोश हैं ।
हर नज़्म मेरी, ज़िन्दगी के लगते अवशेष हैं ।
और कहने को थी जितनी बातें, जितने किस्से
वो आज भी अनकही, शेष हैं ।
छलक जाए दिल से तो मोहब्बत
March 30, 2016 in हिन्दी-उर्दू कविता
वो मिला ले नज़र तो इनायत,
वो फेर ले नज़र तो शिकायत ।
वो पत्थर की सही पर,
करता मैं उसकी इबादत ।
चखता वो मेरे दिल को देकर अपनी उल्फ़त,
बढ़ता है नशा उतना जितनी बढ़ती है कुर्बत ।
दर्द वो जो भर दे दिल को,
ग़र छलक जाए दिल से तो मोहब्बत ।