Rajneesh Kannaujiya

नदिया का पानी था मीठा, उसे खारा समझा,
मेरे अन्दर के दर्द को उसने पारा समझा।
नज़र न लगे इसलिए देखते नहीं थे,
उसने तो मुझे गालियों वाला आवारा समझा।

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