अपनी उलझनों के हम यूँ आदी हो गए है
कभी मुजरिम तो कभी फरियादी हो गए है
न होता कुछ तो कुछ और जरूर होता
बस इसी सोच में कोई बर्बादी हो गए है
राजेश’अरमान’
soch
Comments
4 responses to “soch”
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nice one friend
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thnx
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कभी मुजरिम तो कभी फरियादी हो गए है ..nice
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वाह वाह
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