Tag: सर्दी पर कविता

  • पुस की रात

    पुस की रात जरा सा ठहर जा।

    तेरे तेज चलने से,
    मैं भूल जाता हूँ अपनो को,
    उनके दिये जख्मों को,
    उन पर छिड़के नमको को।
    पुस की रात जरा …………….

    तेरी ठंड की कसक ,
    कुछ पल तक ही सिहराती हैं।
    अपनों की दी जख्में,
    वक्त-वेवक्त मुझे रुलाती हैं।
    पुस की रात जरा …………….

    पुस की रात तुम तो बस,
    चंद लम्हों के लिए आती हैं।
    अपने की वेवफाई मुझे,
    हर वक्त सुई चुभों जाती हैं।
    पुस की रात जरा …………….

    तेरे सिहरन में वो टिस नही,
    जो भुला दूँ मैं अपने घावों को।
    मैं मिलना भी चाहूँ तो,
    रोक ले मेरे पावों को।
    पुस की रात जरा …………….

  • पूस की रात

    फिर आई वो पूस की काली रात।
    मन है व्याकुल, उठा है झंझावात।।

    पत्तों से ओस की बूँदें टपकना याद है मुझे।
    आँखों से आँसूओं का बहना याद है मुझे।
    सन्नाटे को चीरती, तेज धड़कनों की आवाज़,
    ख़ामोश ज़ुबाँ, कुछ ना कहना याद है मुझे।
    हमारे मोहब्बत के गवाह थे जो सारे,
    नदारद हैं वो चाँद तारों की बारात।
    फिर आई वो पूस की काली रात।
    मन है व्याकुल, उठा है झंझावात।।

    कोहरे से धुंधला हुआ वो मंज़र याद है मुझे।
    चीरती सर्द हवाओं का ख़ंज़र याद है मुझे।
    छुटता हाथों से तेरा हाथ, जुदा होने की बात,
    प्यार का चमन, हो चला बंजर याद है मुझे।
    तेरी जुदाई का गम रह-रह कर,
    हृदय में टीस कर रही कोई बात।
    फिर आई वो पूस की काली रात।
    मन है व्याकुल, उठा है झंझावात।।

    बगैर तुम्हारे रहने का गम रुला गई मुझे।
    फिर गुज़रे लम्हों की याद दिला गई मुझे।
    फिर से आई है, वही पूस की काली रात,
    न जाने कहाँ हो तुम क्यों भूला गई मुझे।
    यादों के समंदर में डूबता जा रहा,
    मेरे काबू में नहीं हैं, मेरे जज़्बात।
    फिर आई वो पूस की काली रात।
    मन है व्याकुल, उठा है झंझावात।।

    देवेश साखरे ‘देव’

    झंझावात- तूफान

  • पूस की रात को

    आखिर क्या कहूँ इस पूस की रात को ?
    झकझोर रहा है मेरे दिल की जज़्बात को ।
    आखिर क्या कहूँ इस पूस की रात को?
    घनघोर अंधेरा छाया है
    देख मेरा मन घबराया है
    सनसन करती सर्द हवाएँ कपकपा रही मेरे गात को।
    आखिर क्या कहूँ इस पूस की रात को ?
    टाट पुराने को लपेटा
    खेतों में मंगरु है लेटा
    सर्दी और चिंता के कारण नींद कहाँ उस गात को?
    आखिर क्या कहूँ इस पूस की रात को ?
    फसल बचाने को पशुओं से
    जाग रहा है खेत में।
    डर आशंका और ख़ुशी के
    भाव जग रहे हैं नेत में।।
    भगवान बचाए रखना केवल इस एक रात को।
    आखिर क्या कहूँ इस पूस की रात को?
    शबनम की बूंद बदल गई
    कैसे एक बारिश में।
    टप-टप बूंदों के संग-संग
    आए ओले रंजिश में।।
    सह नहीं पाई फसल मंगरु के एक हीं आघात को।
    आखिर क्या कहूँ इस पूस की रात को?
    मौसम से लड़ -लड़ कर हालात से लड़ नहीं पाया।
    देख टूटते सपने को “विनयचंद ” सह नहीं पाया।।
    एक किसान की दुखद कहानी कैसे कहूँ इस बात को?
    आखिर क्या कहूँ इस पूस की रात को?

  • पूस की रात।

    पूस की रात।

    थरथरा रहा बदन
    जमा हुआ लगे सदन,
    नींद भी उचट गयी
    रात बैठ कट गयी।
    ठंड का आघात
    पूस की रात।

    हवा भी सर्द है बही
    लगे कि बर्फ की मही,
    धुंध भी दिशा – दिशा
    कि काँपने लगी निशा।
    पीत हुए पात
    पूस की रात।

    वृद्ध सब जकड़ गये
    पोर-पोर अड़ गये,
    जिन्दगी उदास है
    बची न उम्र पास है।
    सुने भी कौन बात
    पूस की रात।

    रात अब कटे नहीं
    ठंड भी घटे नहीं,
    है सिकुड़ गयी शकल
    कुंद हो गयी अकल।
    न ठंड से निजात
    पूस की रात।

    गरम-गरम न वस्त्र है
    सकल कुटुम्ब त्रस्त है,
    आग की मिले तपन
    सेक लूँ समग्र तन।
    धुआँ – धुआँ है प्रात
    पूस की रात।

    अनिल मिश्र प्रहरी।

  • पूस की रात

    पूस की रात मे
    दुनिया देख रही थी सपने
    आलस फैला था चहु ओर
    रात भी लगी थी ऊँघने.

    मैंने छत्त से देखा
    बतखों के झुण्ड को तलाब मे
    तीर सी ठण्डी हवा चलने लगी थी
    रात के आखरी पहर मे.

    मछलिया खूब उछल रही थी
    तेर रही थी इधर -उधर
    सोचा हाथ लगाउ उनको
    पर ना जाने छुप गई किधर.

    तभी कुछ शोर सुनाई दिया आसमान मे
    बागुले उड़ रहे थे एक पंक्ति मे
    जैसे वो सब आजाद है
    मेने भी खुद को आजाद महसूस किया उनकी
    स्वछंद संगती मे.
    ….. राम नरेश…..

  • पूस की रात

    शायरों का हुआ गर्म हर लफ़्ज़
    इस सर्द पूस की रात के महीने में
    दिल भी बहका बहका सा लागे
    इस सर्द पूस की रात के महीने में
    गुड़ सा मीठा अदरक सा तीखा
    पूस की रात का यह महीना
    मैं भी रहूं खोया खोया इश्क में तेरे
    इस पूस की रात के महीने में

  • पूस की रात

    कभी ना भूलेगी वो
    पूस की रात…….

    ठंडी सर्द हवाओं और
    बारिश की बूंदों के साथ……

    मैं और मेरी तन्हाई
    बस दो ही थे।

    उस दिन वो
    बारिश की नर्मी
    और चादर की
    सिलवट वैसी ही थी
    जैसी मैनें छोड़ी थी …..

    मौसम कितना भीगा सा था
    उस पूस की रात में
    बारिश की बूंदों ने
    मन के सारे घावों
    पर मरहम लगा दिया था…….

    मैं और मेरी तन्हाई बस
    डूबने वाले ही थे
    तुम्हारी यादों के
    समंदर में………

    अचानक मैंने देखा कि
    एक बुलबुल काफी
    भीगी हुई कांप रही थी
    बारिश में भीग गई थी शायद…….

    मुझे ऐसे देख रही थी
    मानो मुझसे कह रही हो
    मुझे आज यहीं रहने दो
    एक रात का आसरा दे दो……

    मैं एकटक उसी को
    देखती रही ।
    सुबह जब आंख खुली
    तो देखा धूप बारिश की बूंदों पर
    चमक रही थी …..

    बारिश बंद थी ,
    वह बुलबुल भी जा चुकी थी
    शायद मेरे उठने से पहले ही
    चली गई थी वो……..

    लेकिन उसका एक
    पंख पड़ा था
    शायद मुझे एक रात
    का नजराना या निशानी दे गई थी …….

    उस पंख को
    जब मैंने उठाया तो
    लिखा था कि ‘फिर आऊंगी’……

    आज फिर आ गयी ‘पूस की रात’
    मुझे फिर से उस बुलबुल का
    इन्तज़ार है…

    मुझे कभी ना भूलेगी
    वो बुलबुल वो बारिश और
    वो पूस की रात ………

  • 🌹🌹 वो पूस की रात 🌹🌹

    🌹🌹कभी ना भूलेगी वो 🌹🌹
    पूस की रात…….

    ठंडी सर्द हवाओं और
    बारिश की बूंदों के साथ……
    ⚘⚘⚘
    मैं और मेरी तन्हाई
    बस दो ही थे।
    ⚘⚘⚘
    उस दिन वो
    बारिश की नर्मी
    और चादर की
    सिलवट वैसी ही थी
    जैसी मैनें छोड़ी थी …..
    ⚘⚘⚘
    मौसम कितना भीगा सा था
    उस पूस की रात में
    बारिश की बूंदों ने
    मन के सारे घावों
    पर मरहम लगा दिया था…….
    ⚘⚘⚘
    मैं और मेरी तन्हाई बस
    डूबने वाले ही थे
    तुम्हारी यादों के
    समंदर में………
    ⚘⚘⚘
    अचानक मैंने देखा कि
    एक बुलबुल काफी
    भीगी हुई कांप रही थी
    बारिश में भीग गई थी शायद…….
    ⚘⚘⚘
    मुझे ऐसे देख रही थी
    मानो मुझसे कह रही हो
    मुझे आज यहीं रहने दो
    एक रात का आसरा दे दो……
    ⚘⚘⚘
    मैं एकटक उसी को
    देखती रही ।
    सुबह जब आंख खुली
    तो देखा धूप बारिश की बूंदों पर
    चमक रही थी …..
    ⚘⚘⚘⚘⚘
    बारिश बंद थी ,
    वह बुलबुल भी जा चुकी थी
    शायद मेरे उठने से पहले ही
    चली गई थी वो……..
    ⚘⚘⚘
    लेकिन उसका एक
    पंख पड़ा था
    शायद मुझे एक रात
    का नजराना या निशानी दे गई थी …….
    ⚘⚘⚘
    उस पंख को
    जब मैंने उठाया तो
    लिखा था कि ‘फिर आऊंगी’……🦜🦜🦜
    ⚘⚘⚘
    आज फिर आ गयी ‘पूस की रात’
    मुझे फिर से उस बुलबुल का
    इन्तज़ार है……
    ⚘⚘⚘
    मुझे कभी ना भूलेगी
    वो बुलबुल वो बारिश और
    ‘पूस की रात’…………….. 🧤

    🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹

  • ऐ बेदर्द सर्दी! तुम्हारा भी कोई हिसाब नहीं

    ऐ बेदर्द सर्दी ! तुम्हारा भी कोई हिसाब नहीं।
    कहीं मंद शीतल हवाएँ ।
    कहीं शबनम की ऱवाएँ ।।
    दिन को रात किया कोहरे का कोई जवाब नहीं।
    ऐ बेदर्द सर्दी ! तुम्हारा भी कोई हिसाब नहीं।।
    कोई चिथड़े में लिपटा ।
    कोई घर में है सिमटा ।।
    कोई कोट पैंट में भी आके बनता नवाब नहीं।
    ऐ बेदर्द सर्दी,,,, ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,।।
    रंग बिरंगे कपड़ों में बच्चे ।
    आँगन में खेले लगते अच्छे ।।
    दादा -दादी के पहरे का कोई हिसाब नहीं।
    ऐ बेदर्द सर्दी ! तुम्हारा,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,।।
    रंग -बिरंगी फूलों की क्यारी।
    पीले खेत सरसों की न्यारी।।
    मटर मूंगफली गाजर के खाने का कोई जवाब नहीं।
    ऐ बेदर्द सर्दी…………………………………………………।।
    खोज रही है धूप सुहानी ।
    जड़-चेतन व सकल प्राणी।।
    एक सहारा जिसका सबको ऐसा कोई लिहाफ नहीं।
    मन की गर्मी रख “विनयचंद ” ऐसा कोई ताव नहीं।।
    ऐ बेदर्द सर्दी!…………………………………………………।।

  • सर्दी

    रज़ाई ओढ़ जब चैन की नींद हम सोते हैं।
    ठण्ड की मार सहते, ऐसे भी कुछ होते हैं।।

    जिनके न घर-बार, ना ठौर-ठिकाना।
    मुश्किल दो वक़्त कि रोटी जुटाना।
    दिन तो जैसे – तैसे कट ही जाता है,
    रूह काँपती सोच, सर्द रातें बिताना।
    गरीबी का अभिशाप ये सर अपने ढोते हैं।
    ठण्ड की मार सहते, ऐसे भी कुछ होते हैं।।

    भले हम छत का इंतज़ाम न कर सकें।
    पर जो कर सकते भलाई से क्यों चूकें।
    ठंड से बचने में मदद कर ही सकते हैं,
    ताकि इनकी भी ज़िन्दगी सुरक्षित बचे।
    कर भला तो, हो भला का बीज बोते हैं।
    ठण्ड की मार सहते, ऐसे भी कुछ होते हैं।।

    ज़रूरी नहीं, युद्ध हर बार करना पड़े।
    आहत होते कई बार जवान बगैर लड़े।
    तत्पर वतन की सुरक्षा के लिए हमेशा,
    ठण्ड में भी सरहद पर सदा होते खड़े।
    खून भी जम जाए पर संयम नहीं खोते हैं।
    ठण्ड की मार सहते, ऐसे भी कुछ होते हैं।।

    देवेश साखरे ‘देव’

  • बेवफाई की ठण्ड

    ये दोस्त!देखो आखिर लग ही गयी तुम्हे बेवफाई की ठण्ड।

    कितना कहा था कि मेरे प्यार और वफ़ा की चादर ओढ़ कर रखना।

  • सर्दी का मौसम

    तुम मुझे ओढ़ लो और मैं तुम्हें ओढ़ लेता हूँ,
    सर्दी के मौसम को मैं एक नया मोड़ देता दूँ।

    ये लिहाफ ये कम्बल तुम्हें बचा नहीं पाएंगे,
    अब देख लो तुम मैं सब तुमपे छोड़ देता हूँ।

    सर्द हवाओ का पहरा है दूर तलक कोहरा है,
    जो देख न पाये तुम्हे मैं वो नज़र तोड़ देता हूँ।

    लकड़ियाँ जलाकर भी माहोल गर्म हुआ नहीं,
    एक बार कहदो मैं नर्म हाथों को जोड़ देता हूँ।

    ज़रूरत नहीं है कि पुराने बिस्तर निकाले जाएँ,
    सहज ये रहेगा मैं जिस्मानी चादर मरोड़ देता हूँ।।

    राही अंजाना

  • सर्दी

    वसंत को कहा अलविदा, ग्रीष्म और वर्षा काल बीता
    अब शरद और हेमंत अायी, सर्दी शिशिर तक छाई
    ये सर्द सर्द सी राते, इसकी बड़ी अजीब है बातें
    कहीं मुस्कान अोस सी फैलायी, कहीं दर्द दिल को दे आयी

    जब संग ये मावठ लाती, बारिश संग उम्मीद जगाती
    रबी की फसले हर इक, खेतों की शान बढ़ाती
    बर्फिली हवाओं बीच, करता किसान रखवाली
    लेकिन जब पाला गिरता, फिकी हो जाती दीवाली

    माना व्यापार है बढ़ता, शादी का सीजन खुलता
    संक्रांत क्रिसमिस, न्यू ईयर, सर्दी के आंचल में खिलता
    लेकिन कुछ को सरदर्दी, लगने लगती है सर्दी
    जब ना हो जेब में पैसा, और ठिठुराने लगे बेदर्दी

    बच्चों का अजीब सा नाता, यह मौसम उन्हें बड़ा भाता
    छुट्टियां यह कई ले आता, जब शीतकालीन सत्र है आता
    अस्पतालों में भी हरदम, तैयार रहती डॉक्टर की फौज
    कोई ना कोई कहीं, बीमार पड़ता हर रोज

    यह खट्टी मीठी सर्दी, सबके मन को बड़ी भाये
    गर्मी में सोचे कब आये, सर्दी में पीछा कब छोड़ जाये
    कभी आ जाती टाइम पर, कभी हो जाती है लेट
    इंडिया की सर्दी ग्रेट, सब करते इसका वेट

  • सर्दी

    तेरा चुपके से आना गजब,
    घंटो धूप में बिताना गजब।
    आग के पास सुस्ताने लगे हैं,
    तुझे हर वक्त पास पाने लगे हैं।
    तेरे यादों को मन में समेटे बैठे हैं

    तन को कम्बल में लपेटे बैठे हैं।
    तु आती हर साल हमें मिलाने के लिए,
    मिठी यादो को जिंदगी में घुलानें के लिए।
    सर्दी सिर्फ तु ही मेरे साथ वफा करती हैं,
    प्रेयसी के यादों को जिंदा करती हैं।

  • Ai sardi suhani si

    किसी नाजुक कली सी,
    आंखें कुछ झुकी हुई शरमाई सी,
    हौले हौले दबे पांव आई ही गई सर्दी सलोनी सी,
    खिली हुई मखमली धूप में, आई किसी की याद सुहानी सी,
    दबी दबी मुस्कुराहट, होठों पर छाई सी,
    पता चला नहीं कब ढल गया दिन यूं ही,
    आई ठिठुरन की रात लिए कुहासों की चादर सी,
    सुबह धुंध का पहरा है, लगता बादलों का जमावड़ा सा,
    ढकी है चादर धुंध की राहों में,
    दूर-दूर तक कुछ भी नजर नहीं आता राहों में,
    गर्म चाय की चुस्की दे रही थोड़ी गर्माहट सी,
    अलाव के पास बैठना दे रहा सुकून सा,
    हरी हरी घास पर ओस की बुंदे हैं चमक रही शीशे सी,
    कांपते होठों ने तुमसे कुछ कहा,
    रह गई वह बातें क्यों मेरी दबी सी

  • सर्दी और बेबस गरीब बच्चे

    रूह भी कांपती है ठंडक मे कभी- कभी,

    याद आती है हर मजबूरियाँ सभी तभी। 

    इन्सान को ज़िन्दगी की कीमत समझनी चाहिये, 

    जो हो सके मुनासिब वह रहम करना चाहिये। 

    जीवन है बहुत कठिन कैसे यह सब बताऊँ? 

    मजारों पर शबाब के लिए चादर क्यों चढ़ाऊँ? 

    ठिठुरता हुआ मुफलिस दुआयें कम न देगा, 

    खुदा क्या इस बात पर मुझे रहमत न देगा।।

  • सर्दियों की धूप-सी

    सर्दियों की धूप सी
    लग रही है यह घड़ी

    यह जो नया एहसास है
    अजनबी है अजनबी

    सुना है मन वीरान है
    मेरा जहां आज क्यूं

    यादों में है डूबा दिल
    ना आ रहा है बाज क्यूं

    नजरें कर रही है इज़हार
    दिल में दबा है राज क्यूं

    कहने थे जो लफ्ज़
    बदला है हर अल्फाज क्यूं

    सर्दियों की धूप में भी
    इतनी धुंध छाई आज क्यूँ

    सर्दियों ने ओढ़ ली है
    धूप की चादर अभी

    धूप है आँगन में उतरी
    बन के दुल्हन आज क्यूँ

    धीमी-धीमी उजली-उजली
    महकती है आज क्यूँ

    ये गुलाबी सर्दियाँ भी
    मन को हैं कितना लुभाती

    कोहरे में कांपते हैं
    आज मेरे हाँथ क्यूँ

    मन पर है छाई उदासी
    इतने अर्से बाद क्यूँ ।

  • जाड़ा

    जब तक नारियल तैल जम न जाये,
    युगपुरुष केजरीवाल जी मफलर न बाँधने लगे
    और बोरो प्लस का विज्ञापन आना न चालू हो जाये……

    तब तक मै नही मानता की सर्दी आ गयी!!

  • सर्दी नहीं जाने वाली

    सर्दी नहीं जाने वाली


    बन्द मुट्ठी में हैं मगर कैद में नहीं आने वाली,
    हाथों की लकीरों की नर्मी नहीं जाने वाली,

    आलम सर्द है मेरे ज़हन का इस कदर क्या कहूँ,
    के ये बुढ़ापे की गर्मी है यूँही नहीं जाने वाली,

    जमाकर बैठा हूँ आज मैं भी चौकड़ी यारों के साथ,
    अब अकेले रहने से तो ये सर्दी नहीं जाने वाली।।

    राही (अंजाना)

  • सर्दी गर्मी या वर्षा हो, चाहे अमावस रात हो

    सर्दी गर्मी या वर्षा हो, चाहे अमावस रात हो
    हैं अडिग हर तूफानों में, चाहे पौष की ठंडी रात हो
    खड़े रहते हैं सरहद पर, चाहे गोली की बौछार हो
    मौत से होता है मिलन यूँ, कि जैसे गले का हार हो
    दुश्मनों के दल में जब वो, तांडव करते हैं
    हों सैकड़ों महाकाल वो, ऐसे लगते हैं
    कितना दुर्गम रास्ता हो, वो नहीं डरते हैं
    हैं नजर से पारखी वो, दुश्मनों पे नजर रखते हैं
    वो राम राज्य लाने को, रहते हैं सदा उतावले
    पर निज स्वारथ के कारण, नहीं चाहते कुछ अंदर वाले

    ~Ram Shukla
    कटरा बाजार, गोंडा उत्तर प्रदेश

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