पूस की रात

पूस की रात मे
दुनिया देख रही थी सपने
आलस फैला था चहु ओर
रात भी लगी थी ऊँघने.

मैंने छत्त से देखा
बतखों के झुण्ड को तलाब मे
तीर सी ठण्डी हवा चलने लगी थी
रात के आखरी पहर मे.

मछलिया खूब उछल रही थी
तेर रही थी इधर -उधर
सोचा हाथ लगाउ उनको
पर ना जाने छुप गई किधर.

तभी कुछ शोर सुनाई दिया आसमान मे
बागुले उड़ रहे थे एक पंक्ति मे
जैसे वो सब आजाद है
मेने भी खुद को आजाद महसूस किया उनकी
स्वछंद संगती मे.
….. राम नरेश…..

Comments

16 responses to “पूस की रात”

  1. Pt, vinay shastri ‘vinaychand’

    सुंंदर

  2. Amod Kumar Ray Avatar
    Amod Kumar Ray

    Good

  3. Kandera Fitness

    Wah

  4. kandera study

    Cool

  5. sudesh ronjhwal

    Wah

  6. D.K jake gamer

    Good

  7. Sudesh Ronjhwal

    Wah

  8. राम नरेशपुरवाला

    Good

  9. Ishwari Ronjhwal

    Wah

  10. sandhya Singh

    Nice

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