Tag: मजदूर दिवस पर हिंदी कविता

  • बच्चे हम फूटपाथ के

    बच्चे हम फूटपाथ के

    बच्चे हम फूटपाथ के,

    दो रोटी के वास्ते,

    ईटे -पत्थर  तलाशते,

    तन उघरा मन  बिखरा है,

    बचपन  अपना   उजड़ा है,

    खेल-खिलौने हैं हमसे दूर,

    भोला-भाला  बचपन अपना,

    मेहनत-मजदूरी करने को है मजबूर

    मिठई, आईसक्रीम और गुबबारे,

    लगते बहुत लुभावने ,

    पर बच्चे हम फूटपाथ के,

    ये चीजें नहीं हमारे  वास्ते,

    मन हमारा मानव का है,

    पर पशुओं सा हम उसे पालते,

    कूड़ा-करकट के बीच,

    कोई मीठी गोली तलाशते,

    सर्दी-गर्मी और बरसात,

    करते हम पर हैं वर्जपात,

    पग -पग काँटे हैं चुभते,

    हम फिर भी हैं हँसते,

    पेट जब भर जाए कभी,

    उसी दिन त्योहार है समझते,

    दो रोटी के वास्ते पल-पल जीते -मरते,

    बच्चे हम फूटपाथ के ।।

  • सच में मिली आजादी?

    हिन्द के निवासियों

    धरती माँ पुकारती है

    उठ खड़े हो जाओ तुम

    माँ भारती पुकारती है

    धर्म, जाती-पाती से तुम

    बाहर आकर भी देख लो

    आजाद भारत में आज भी

    मजदूर बंधुआ बने देख लो

    ये आजादी है या भ्रमजाल

    वक्त चल रहा ये कैसी चाल

    भूख की खातिर जहाँ

    जिस्म बिकते देख लो

    शौक की खातिर जहाँ

    जिस्म नुचते देख लो

    मानव की औकात क्या

    पशु असुरक्षित हैं, देख लो

    भारत के कर्णधारों से

    भविष्य के सितारों से

    माँ भारती ये पूछती है

    सच में मिली आजादी है?

    या फिर से कोई सजा दी है?

    सच में आजादी गर चाहते हो

    मत बटने दो देश को

    धर्म-जाती के नाम पर

    और अस्मिता की रक्षा करो

    अपनी जान पर खेल कर

    सुरक्षित स्त्री-पुरुष हों,

    भरपेट भोजन गरीब को

    छत बेघर को मिले,

    आसरा अनाथ को

    जिस दिन यह हो जायेगा

    माँ भारती का बच्चा बच्चा

    आजादी वाले गीत गायेगा

    ऐसा हुआ नहीं कभी तो

    आजादी का दिन मात्र एक

    झंडा फहराने का त्यौहार

    बन कर ही रह जायेगा.

  • आज़ाद हिंद

    आज़ाद हिंद

    सम्पूर्ण ब्रहमण्ड भीतर विराजत  !

    अनेक खंड , चंद्रमा तरेगन  !!

    सूर्य व अनेक उपागम् , !

    किंतु मुख्य नॅव खण्डो  !!

     

    मे पृथ्वी भूखंड !

    अति मुख्य रही सदा   !!

    यहा पर , सप्त द्वीप !

    जॅहा पर , उन समस्त !!

     

    द्वीप मे प्रमुख रहा  !

    भारत का द्वीप सदा !!

    यहाँ पर , भारत को !

    नमाकन कर सोने की !!

     

    चिड़िया ,हिंदोस्ताँ व भारत !

    की उपाधि दे डाली !!

    भारत मेरा प्रतिभाशाली रहा !

    पृथ्वी के आरंभ से  !!

     

    ही तो कमी यहाँ !

    किस बात की रही !!

    महा कवियो मे महाकवी !

    कालिदास , माहाऋषि मे मःआॠषी !!

     

    बाल्मिकी आदि समान महारत्न  !

    पनपे , रचे जिन्होने महाकवय  !!

    सहित रामायण सम्मुख भाती !

    – भाती के ज्ञानवान रत्न  !!

     

    तब पर भी कमी !

    कदाचित् कहाँ थी , सोने !!

    की चिड़िया के पर !

    रोंद कर लूट रहा !!

     

    था ,उसे कोई न कोई  !

    मानो बन के हमराही  !!

    जिस भारत ने संसार  !

    को शून्य व दशमलव !!

     

    दे कर गिनती सिखाई !

    आर्यभट्ट -. चाणक्य की निंदा !!

    नाही , ओषधि मे महात्मा !

    बुद्ध बने जगत के !!

     

    अनुरागी ,योग व ओषधि !

    से करत चले गये !!

    दूर समस्त बुराई , आज !

    इस भारत की दुर्गति !!

     

    देखो के प्रत्येक रास्ट्र !

    अभी भी लूटना चाहता  !!

    हो इसे भाई , वह !

    समाए क्या कम था !!

     

    जब जो भक्ति काल !

    से आदि काल से !!

    लेकर आधुनिक काल तलाक़ !

    डच-डेनिश , मुगल-हीमायू !!

     

    अकबर – बाबर ने लूटा !

    से .क्षतिग्रस्त करा भारत !!

    के प्रत्येक राज्य के !

    कन- कन को , जैसे  !!

     

    हो बचा  कही कोई !

    अंदेशा नहीं तब  कर  !!

    भी ,पनपे भारत के !

    भाषीय स्तर पर धुरन्दर !!

     

    महाकवी तुलसीदास ,सूरदास व !

    कबीरदास तो सभी अब !!

    भी ईर्षा क्या कम !

    थी जो , आगमन अंग्रेज़ो !!

     

    का हो गया, सोना !

    उगलने वाली माटी को !!

    अफ़सोस तब पर भी !

    न हुआ , ब्रहमण्ड -क्षत्रिय  !!

     

    शुद्रा व वैश्य क्या !

    बैर रखते जब चोट !!

    पड़ती थी खानी अंग्रेज़ो !

    की , गुलामी के दिवस  !!

     

    मे क्या चोट थी !

    वह कुछ नहीं दर्द !!

    तो कायम रही ह्रदाए !

    के भीतर , नस्तर समान !!

     

    चूबा रहे थे सर्यंत्र !

    स्वयं का मानो यह !!

    रास्ट्र हो,उनका ससुराल !

    बहन-बेटी की इज़्ज़त !!

     

    से खेल, भाइयो के !

    खून का कर रहे !!

    थे व्यापार , वह तो !

    क्रांतिवीर थे जिन्होने गरमदल !!

     

    व नरमदल रूप मे !

    कई सारे अथक प्रयास !!

    करे , राष्ट्र की आज़ादी !

    हेतु कई वीर मृत्यु  !!

     

    के घाट जले , फाँसी !

    चड़े अजर-अमर मंगल पांडे !!

    राजगुरू -सुखदेव व भग्त सिह  !

    न जाने आज कहाँ !!

     

    गये जो बच गये !

    वे तो मानो आज !!

    भी राजनेताओ के रूप  !

    मे दीमक बन अंग्रेज़ो !!

     

    के शासन का पालन  !

    ही करते जा रहे  !!

    है , भारतीय सभ्यता को !

    पश्चिमी सभ्यता ने लूटा !!

     

    अब नग्नता उमड़ रही !

    यहाँ पर है , पन्द्रह !!

    अगस्त १९४७ की पहचान  !

    करू तो करू किससे !!

     

    जब आज भी राष्ट्र !

    स्वयं के जातिवाद के !!

    गुलामी से जूज रहा है !

    अंबेडकर जी के क़ानून !!

     

    पस्त होते दिख रहे !

    हिंदू मुस्लिम सिख व ! !

    ईसाई समस्त कोई दुर्जन !

    बन आपस मे लड़ !!

     

    रहा , आज भी खून !

    ख़राबा , बलात्कार व नारी !!

    पर अत्याचार है , बंधुवा !

    मज़दूरी मे बँधा वह !!

     

    बालक मजदूर बेबस व !

    लाचार है, क्या खूब !!

    पदवी है , मेरे राष्ट्र !

    ” आज़ाद हिंद ”   की के !!

     

    ये आज़ाद हो कर !

    भी पूर्ण रूप से लाचार !!

    है , अपाहिज व बीमार  !

    है , ग़रीबो का शोषण !!

     

    थाना कचहरी मे मानो !

    अमीरो की सरकार है !!

    योग्य व्यक्ति लगता ठेला !

    अग्यानी व्यक्ति करता  देश !!

     

    का व्यापार है , कोन !

    कहता की आज १५ !!

    अगस्त २०१६ तलक मे भी !

    हमारा हिंदोस्ताँ आज़ाद है !!

     

    यह तो बेबसी मे !

    डूबता जाता किंतु लगता !!

    किसी ने मुख्य मंत्री रूप !

    मे इसे संभालना चाहा !!

     

    तो भी उस दीलेर !

    पर लगे  कई इल्ज़ाम !!

    है , कुरीतीयो मे डूबा !

    विष को जहन मे !!

     

    रख जूबा से उडेलता !

    ख़ाता रास्ट्र की व !!

    अलकता अन्य की वह !

    दुराचार व पाखंड मृत्युदंड !!

     

    के काबिल भया ,अब्दुल  !

    रहीम  , यह समस्त अंश !!

    ” आज़ाद हिंद ” के रहे !!

    न जाने क्यो आज !!

     

    भी ह्रदय ,भारत के !

    आज़ाद होने पर भी !!

    रूदन कर रहा !!!

  • बाल श्रमिक

    मंदिर में पानी भरती वह बच्ची
    चूल्हे चौके में छुकती छुटकी
    भट्टी में रोटी सा तपता रामू
    ढावे पर चाय-चाय की आवाज लगाता गुमशुदा श्यामू रिक्से पर बेबसी का बोझ ढोता चवन्नी फैक्ट्रीयों की खड़खड़ में पिसता अठन्नी
    सड़कों,स्टेशनों,बसस्टॉपों पर भीख माँगते बच्चे भूखे अधनंगे
    कचरे में धूँढते नन्हे हाथ किस्मत के टुकड़े
    खो गया कमाई में पत्थर घिसने वाला छोटे
    किसी तिराहे चौराहे पर बनाता सिलता सबके टूटे चप्पल जूते।
    दीवार की ओट से खड़ी वो उदासी
    है बेबस, है लाचार इन मासूमों की मायूसी
    दिनरात की मजदूरी है मजबूरी
    फिर भी है भूखा वह, भूखे माँ-बाप और बहन उसकी।
    कुछ ऐसा था आलम उस पुताई वाले का
    पोतता था घर भूख से बिलखता।
    कुछ माँगने पर फूफा से मिलती थी मार लताड़।
    इसी तरह बेबस शोषित हो रहे हैं
    कितने ही बच्चे बार-बार।
    न इनकी चीखें सुन रहा, न नम आँखें देख रहा
    वक्त, समाज, सरकार!!!
    होना था छात्र, होता बस्ता हाथ में,
    इनका बचपन भी खेलता,
    साथियों व खिलौनों के साथ में।
    पर जकड़ा !!
    गरीबी,मजदूरी,भुखमरी और बेबसी ने इनके बचपन को!
    शर्मिंदा कर रही इनकी मासूमियत समाज की मानवता को।
    दी सरकार ने…
    जो स्कूलों में निशुल्क भोजन पढाई की व्यवस्था
    पेट भरते है उससे अधिकारि ही ज्यादा।
    फिर क्या मिला ?
    इन्हें इस समाज से
    बना दिया सरकार ने..
    बस एक ” बाल श्रमिक दिवस”इनके नाम से।
    ** ” पारुल शर्मा ” **

  • मजदूर

    गरीबी में पला बड़ा,धूप छाँव रहा खड़ा,

    मजबूरी में पनपा,किस्मत का मारा है ।

    मेहनत पर जीता रहा,हर गम पीता रहा,
    देख कभी लेता नही,किसी का सहारा है ।

    दो समय के खाने को,लेता नही बहाने वो,
    अपने तन की पीड़ा,खुद ही नाकारा है ।

    दर्द उसे भी होता है,मन ही मन रोता है,
    मजदूरी के अलावा, पर नही चारा है ।।

    नवीन श्रोत्रिय”उत्कर्ष”

  • ~~”मजदुर”~~

    ~~”मजदुर”~~

    ~~”मजदुर”~~

    ..वह ‘सृजनकर्ता’ है ‘दुख’ सहके भी ‘सुख’ बांटता है..

    ..वो ‘मजे’ में ‘चूर’ हैं, बस इसलिए ‘मग़रूर’ हैं..
    ..हम ‘मजे’ से ‘दूर’ हैं, बस इसलिए ‘मजदूर’ हैं..

    ..सेतु , नेहेरे , बांध उसके, ‘श्रम’ से ही ‘साकार’ है..
    ..’देश’ की ‘सम्पन्नता’ का बस वही ‘आधार’ है..

    ..चाहें लग जाए ‘सावन’, या चल रहा हो ‘वसंत’..
    ..पर रेहता है हमेशा , ‘पतझड़’ की तरह ‘झरता’ हुआ..

    ….✒…01/05….

  • आखिरी मुंसिफ

    मैं भी देश के सम्मान को सबसे ऊपर समझता हूँ
    तो क्या हुआ कि साहित्यकारों की निंदा पर जुदा राय रखता हूँ
    अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हूँ पक्षधर
    स्त्री-सम्मान को रखता हूँ सबसे ऊपर
    मैं नहीं मानता उन्हें माओवादी
    नाइंसाफियों के जो होते हैं विरोधी
    मजदूर-किसानों की बात को जो उठाए
    वे क्यों विकास-विरोधी कहलाएं ?
    ना बात-बेबात पाकिस्तान को गालियां देता हूँ
    और ना देश के झंडे को ले जज्बाती ही होता हूँ
    नेहरू को गाली व पटेल-सुभाष से तुलना
    जैसे, पीछे को देख आगे को बढना
    पढना अच्छा लगता है, किताबों से प्रेम करता हूँ
    (देश में) तानाशाही की आवश्यकता को, शर्म समझता हूँ
    विचार भी करता हूँ, करता हूँ बहस भी
    असहमतियों को मैं मानता हूँ सहज भी
    क्या इसीलिए दोषी-देशद्रोही हूँ ?
    कि आपके विचारों का समर्थक नहीं हूँ….
    किंचित नहीं मैं विचलित, ध्यान दीजिए
    और अच्छा हो यह बात आप भी समझ लीजिए
    निंदा-भर्त्सना का, आपका सिलेक्टिव अप्रोच
    धीरे धीरे मेरी, बदलने लगा है सोच
    आज चाहे ना मानो इसे सही,
    पर आखिरी मुंसिफ़, हूँ मैं ही !!

  • चलो थोड़ा जादू करते हैं

    चलो थोड़ा जादू करते हैं
    जनता के दिल को छूती हुई एक कविता लिखते हैं

    झोपड़ियों में पल रही भूख से टकराते हैं
    छोटे छोटे मासूमों की चीख
    और डूबती हुई ज़िंदगियों को
    कविता का विषय बनाते हैं

    लड़ते हैं
    अफगानिस्तान की पहाड़ियों के बीच पल रहे आतंक से
    अफ्रीका के अँधेरे से
    अमेरकियों के पूजी वाद से
    सीरिया में इस्लामिक स्टेट से टकराते हैं
    ईराक़ और ईरान की कुछ बाते करते हैं
    नक्सलियों के नक्सलवाद से मिलते है
    आओ राजधानी से निकलकर
    गांव और देहात में चलते हैं
    थोड़ा कविता को धूप दिखाते हैं
    चूल्हे का धुआं खिलाते हैं

    जब कविता खेत में हल चलाएगी
    तभी परिश्रम का अर्थ समझ पाएगी
    केंवल मानसिक जुगाली न रहकर
    समाज के कुछ काम आएगी

    आओ कविता लिखते हैं
    चरवाहों और किसानों की
    सीमा पर मर रहे जवानों की
    बिल्डिंग के नीव में लग रहे है
    मज़दूर के खून की
    आदमी और आदमियत के ज़मीन की

    आओ कविता लिखते हैं
    मानववाद की
    इंसानी स्वाभाव की
    विषमता के प्रभाव की
    औरत के दर्द की
    सूखा और सर्द की

    आओ
    कविता को तलवार बना दें
    सारे भेदों को मिटा कर
    अभेद उपजा दें
    आओ कविता को सबकी आवाज़ बना दें

    कविता को मोटी सी दीवार बना दें
    सारी खाई मिटा दें
    आओ सपनों का संसार बना लें
    हर किसी को उसमे जगह दें
    जीने की सबको वज़ह दें ।

    तेज

  • अपने काम आप करो

    ……कविता…….

    अपने काम, आप करो,
    मजदूरों को माफ़ करो।
    रहना है, अगर ठाठ से; 
    तो साफ-सुथरा इंसाफ करो।
    हमको तुम, माफ़ करो,
    अपना, मन साफ़ करो।
    अपनाना है, अगर हमें; 
    तो पहले सीधे मुँह बात करो।
    अपने दिल पर हाथ रखो,
    फ़िर प्यार की बात रखो।
    अब हमसे, मत कहना,
    अच्छे दिन पर विश्वास रखो ।
    अब और नहीं  सौगात रखो,
    मेहनत का अहसास रखो ।
    और नहीं, चमकाना मुझे,
    कपड़े ,बर्तन अपने पास रखो।
    वेतन की नहीं बात करो,
    तारिखों पर हिसाब करो।  
    अब मज़दूरी रहने दो
    हिस्सेदारी की शुरुवात करो।
    ओमप्रकाश चंदेल”अवसर”
    पाटन दुर्ग छत्तीसगढ़ 
    7693919758

  • सिर पर जूता पेट पर लात

    सिर पर जूता पेट पर लात

    सिर पे जूता, पेट पे लात।
    दिल खट्टा और मीठी बात॥
    नियम, कानून अमीरों का,
    अपने तो बस खाली हाथ॥

    पूछ परख लो भूखों से
    क्या है तुम्हारी जात?
    पेट भरो बातों से,
    गोदाम तले रखो अनाज।

    मजबूरी है मजदूरी
    मेहनत का नहीं देना दात।
    वादों से क्या भूख मिटे
    या चूल्हों में जलती आग।।

    वोट मांग लो हमसे
    पर रहने दो यह सौगात।
    नारों से क्या तन ढक लें?
    समझ गये तुम्हारी बात।।

    उठो, बैठो, सब करो
    स्वांग रचा लो सारे आज।
    फर्क नहीं पड़ता अब
    बहुत कर लिये हैं विश्वास ।।

    ओमप्रकाश चंदेल”अवसर”

    पाटन दुर्ग छत्तीसगढ़

     

  • लौट आओ अपने खेतों पर

    लौट आओ अपने खेतों पर

    लौट आओ अपने खेतों पर अब हरित क्रान्ति लिख देंगे।
    उजाड़ गौशाला को सजाकर अब श्वेत क्रान्ति लिख देंगे।

    फिर से नाम किसानों का  लाल बहादुर शास्त्री लिख देंगे।
    अपनी लहू सिंचित करके माटी को अन्नदात्री लिख देगे॥

    कर्ज से तुम मत घबराना धान की बाली से वादी लिख देंगे।
    गेहूँ मक्का गन्ना जौं  की फसलों को सोना चांदी लिख देंगे॥

    बीती बात बिसार दो नई तकनीकों से अमिट कहानी लिख देंगे।
    खेतों पर तपने वाली माँ, बहनों को झांसी की रानी लिख देंगे॥

    सुखी हुई धरती पर हल चलाकर आज जवानी लिख देगें।
    सुनाकर रहट की सरगम अब रुठे बादल में पानी लिख देंगे।

    लाल काली  मिट्टी  से मजदूरों  को वीर शिवाजी लिख देंगे।
    घाटे के सौदों को अपने बाहू बल से जीती बाजी लिख देंगे।।

    जामुन अर्जुन के शाखों को, हम अपनी दादी नानी लिख देंगे।
    बंजर हो चुके मेड़ों के  जर्रे-जर्रे को पुरखों निशानी लिख देंगे॥

    हिम्मत हारना कायरता है मेहनत के बल पर गांधी लिख देंगे।
    खेत के हर एक पत्थर पर हम अब दशरथ मांझी  लिख देंगे।

    निरझर बहते हुये पसीनों से  हम ,नहरों को वैतरणी लिख देंगे।
    भारत माता के वीर सपूत अब खलिहानों को जननी लिख देंगे।।

    नेताओं के झुठे वादे बहुत हो चुके अब तो इनको बासी लिख देंगे।
    कुछ तो सच बोलो अब, नहीं तो तुम्हें अतीत के वासी लिख देंगे।

    कुछ योजना हमारे लिये बनाओ वर्ना तुम्हारी अय्यासी लिख देंगे।
    काली करतूतें  बहुत हो चुकीं अब सारी जाल -साझी लिख देंगे॥

    ओमप्रकाश चन्देल”अवसर”

    पाटन दुर्ग छत्तीसगढ़

    7693919758

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  • पसीना भी हर इक मजदूर का………….

    कभी दीवार गिरती है, कभी छप्पर टपकता है

    कि आंधी और तूफां को भी मेरा घर खटकता है।

    चमकते शहर ऐसे ही नहीं मन को लुभाते हैं

    पसीना भी हर इक मजदूर का इसमें चमकता है।

    गए परदेस रोटी को तो घर सब हो गए सूने

    कहीं बिंदियां चमकती है न अब कंगन खनकता है।

    यूं ही होते नहीं है रास्ते आसान मंजिल के

    सड़क बनती है तो मजदूर का तलवा सुलगता है।

    ये अपने घर लिये फिरते हैं सब अपने ही कांधों पर

    नहीं मालूम बसकर फिर कहां जाकर उजड़ता है।

    —————-सतीश कसेरा

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