अखबारों के पतंग बना

बचपन में हम उन दिनों
बहुत ज्यादा शरमाते थे.
कविता के दो लाइन भी
खुलकर नही बोल पाते थे.

दूरदर्शन के आगे बैठ
जंगल- जिंगल गाते थे.
पापा घर में आ जाये तब
डर से उनके घबराते थे.

स्कूल में हम परीक्षाओं में
अंक बहुत अच्छे पाते थे.
लालटेन की मंद रौशनी में
पढ़ते-पढ़ते सो जाते थे.

मुहल्ले के साथियों को
कहानियाँ खूब सुनाते थे.
एक रूपये का नोट छुपाकर
किताबों में, हम इतराते थे.

जाड़े की धूप में छत पे बैठ
हम आधे बाल्टी नहाते थे.
माँ से थप्पर खा कर ही
फिर दिन में सो पाते थे.

मेहमाँ जो घर में आये कोई
देख मिठाइयाँ ललचाते थे.
शीशी, गत्ते, कबाड़ बेच के
मलाई बर्फ हम खाते थे.

अखबारों के पतंग बना
जैसे तैसे उड़ाते थे.
दादाजी के पाँव दबा
चार आने हथियाते थे.


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जोगबनी-कटिहार छोटी रेल खंड के बिच की यात्रा के दौरान कविता ही मेरी संगिनी रही. हास्य, व्यंग्य, ग़ज़ल कहना सुनना अच्छा लगता है.

6 Comments

  1. Kanchan Dwivedi - March 10, 2020, 12:15 pm

    Nice

  2. Kanchan Dwivedi - March 10, 2020, 12:16 pm

    Bachpan yaad aa gya

  3. Satish Pandey - August 22, 2020, 3:32 pm

    अतिसुंदर

  4. Satish Pandey - August 22, 2020, 3:33 pm

    बहुत खूब

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