अभी भी मेरी आंखों में

कदम हैं अब भी हरकत में कहीं ठहरा नहीं हूं मैं,
यक़ीनन टूट चुका हूं मगर बिखरा नहीं हूं मैं l

अभी भी आईने में खुद को अक्सर ढूढ लेता हूं,
सुनो ऐ गर्दिश-ए-हालात बस चेहरा नहीं हूं मैं l

अभी भी मेरे दम से ही मेरी परवाज़ होती है,
कभी रहम-ओ-करम पर आज तक फहरा नहीं हूं मैं l

अभी भी मेरी आंखों में मुहब्बत डूब सकती है,
तुझे ऐसा क्यूं लगता है कि अब गहरा नहीं हूं मैं l

मेरी गर मौज निकली तो तेरा सब डूब जायेगा,
मैं “सागर” अब भी “सागर” हूं कोई सहरा नहीं हूं मैं ll

// सहरा=रेत का मैदान/रेगिस्तान //

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-Er Anand Sagar Pandey

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Responses

  1. I never think f myself or my life in terms of success that needs to be achieved. I guess I feel successful when I get to do what I want every day. Im just 31 and single, but I can come and go as I please which suits me just fine. Success is relative. For me, being able to afford to do life enriching things is su.-css.ec= The Dame´s last blog .. =-.

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