आजादी

आजादी के इतने वर्षों बाद भी,
आजादी को हम जूझ रहे आज भी ।।

कभी नक्सलियों, आतंकियों से आजादी,
कभी रिश्वतखोरों, भ्रष्टाचारियों से आजादी ।
कब ली राहत की साँस हमने,
भूली बिसरी बातें हैं, नहीं अब याद भी ।
आजादी के इतने वर्षों बाद भी,
आजादी को हम जूझ रहे आज भी ।।

चल रही कहीं जिस्म की निलामी,
बरकरार है दहशत की गुलामी ।
बारूद के ढेर पे बैठे हम सारे,
कब निगल जाए हमें और हमारे औलाद भी।
आजादी के इतने वर्षों बाद भी,
आजादी को हम जूझ रहे आज भी ।।

कभी जात – पात की बंदिशें,
कभी मजहब के नाम पे रंजिशें।
साम्प्रदायिक बेड़ियों में जकड़े हुए हम,
समानता की लाख कर लो फरियाद भी।
आजादी के इतने वर्षों बाद भी,
आजादी को हम जूझ रहे आज भी ।।

अदृश्य गुलामी से हम क्या उबर पायेंगे,
सही मायने में आजादी महसूस कर पायेंगे ।
दूसरों की गुलामी ही क्या गुलामी है,
पल-पल की गुलामी से हो रहे भले बर्बाद भी।
आजादी के इतने वर्षों बाद भी,
आजादी को हम जूझ रहे आज भी ।।

आओ आजादी की एक लौ जलाते हैं,
जश्ने – आजादी दिल से मनाते हैं ।
संकल्प लें आज स्वस्थ भारत बनाने की,
नई पीढ़ी को दें, संपूर्ण आजादी की सौगात भी।
आजादी के इतने वर्षों बाद भी,
आजादी को हम जूझ रहे आज भी ।।

देवेश साखरे ‘देव’


लगातार अपडेट रहने के लिए सावन से फ़ेसबुक, ट्विटर, इन्स्टाग्राम पर जुड़े| 

यदि आपको सावन पर किसी भी प्रकार की समस्या आती है तो हमें हमारे फ़ेसबुक पेज पर सूचित करें|

8 Comments

  1. Annu Burnwal - December 17, 2018, 4:25 pm

    बहुत सुन्दर

  2. Ashmita Sinha - December 17, 2018, 4:51 pm

    Nice poem

  3. राही अंजाना - December 18, 2018, 7:19 pm

    बढ़िया

  4. राम नरेशपुरवाला - September 10, 2019, 10:27 pm

    Good

Leave a Reply