देवेश साखरे 'देव', Author at Saavan's Posts

मय ही मय

हमें तो पता ही न था, ये नशा क्या शय है। हिज्र-ए-महबूब के बाद, बस मय ही मय है। दुनिया हमारी शराफ़त की मिसाल देती थी, शरीफ़ों मे ही नहीं, रिंदों के बीच भी गये हैं। देवेश साखरे ‘देव’ रिंद- शराबी »

मसरूफ़

यह सब बहाने ही हैं कि वक़्त नहीं। इतना भी मसरूफ़ कमबख़्त नहीं। मिला करो कभी कभार, जो हमसे करते हैं प्यार। इतना भी दिल को करो सख्त नहीं। यह सब बहाने ही हैं कि वक़्त नहीं। मिलो कभी बगैर तलब, कभी यूँ ही बिना मतलब। मतलब से मिलने की जरूरत नहीं। यह सब बहाने ही हैं कि वक़्त नहीं। क्या पता कल हों ना हों, दिल में कोई मलाल ना हो। प्रेम ज़रूरी, संबंध ज़रूरी रक्त नहीं। यह सब बहाने ही हैं कि वक़्त नहीं। मिलने ... »

तेरी खुबसूरती

तेरी कातिल निगाहें देखकर, मैं गज़ल पढ़ दूँ। तेरी खुबसूरती पर क़सीदे, मैं हर पल गढ़ दूँ। तेरी खुबसूरती अल्फ़ाज़ों की मोहताज़ नहीं, गर तू कहे तो, तारीफों के चार चाँद जड़ दूँ। देवेश साखरे ‘देव’ »

ख्वाब

खुली आँखों का ख्वाब जरूर मुकम्मल होता है। नींद में दिखा ख्वाब तो, याद भी ना कल होता है। ज़िद है, ख्वाब पूरे होंगे अपने एक दिन यकीनन, खुद पर यकीन रख, फिर मन क्यों बेकल होता है। भाव का कद्र तो उसे पता, जिसने अभाव देखा हो, उसके प्रभाव से ही दुनिया, उसका क़ायल होता है। घमासान जंग छिड़ी है, जिंदगी और मेरे दरम्यान, देखें कौन सूरमा होता है और कौन घायल होता है। आओ आज को जी भर जी लें, कल किसने देखा, आज को ... »

वक्त

वक्त से मैं बेवक्त उलझता रहा। वक्त से बड़ा कद समझता रहा। वक्त ने इस कदर उलझाया मुझे, वक्त ना वक्त पर सुलझता रहा। देवेश साखरे ‘देव’ »

शायर

इश्क का दरिया जब ज़ेहन के समंदर से मिलता है। दिल के साहिल से टकरा, गज़ल बह निकलता है। हिज़्रे-महबूब का गम हो, या वस्ले-सनम की खुशी, ज़ेहन में अल्फ़ाज़ों का सैलाब उफनता, उतरता है। जिसने भी कभी इश्क किया, वो शायर ज़रूर हुआ, इश्क रब से करता है, या फिर महबूब से करता है। दिल से निकले जज़्बात, उनके दिल में उतर जाए, हो गई गज़ल, फिर ज़रूरी नहीं क़ाफ़िया मिलता है। देवेश साखरे ‘देव’ »

प्रेम

मेरी लेखनी में अभी जंग लगा नहीं। प्रेम के सिवा दूजा कोई रंग चढ़ा नहीं। प्रेम में लिखता हूँ, प्रेम हेतु लिखता हूँ। प्रेम पर लिखता हूँ, प्रेम ही लिखता हूँ। प्रेम के सिवा मुझे कोई ढंग पता नहीं। प्रेम के सिवा दूजा कोई रंग चढ़ा नहीं। प्रेम श्रृगांर लिखता हूँ, प्रेम मनुहार लिखता हूँ। प्रेम अपार लिखता हूँ, प्रेम उद्धार लिखता हूँ। प्रेम से भला कभी कोई तंग हुआ नहीं। प्रेम के सिवा दूजा कोई रंग चढ़ा नहीं। प्... »

जां तक निसार हुआ

तुम्हीं ने कहा था, हां मुझे भी तुमसे प्यार हुआ। हुई क्या खता, तुम्हारी नजरों में गुनहगार हुआ। हमने तो डाल दी, सारी खुशियां तुम्हारे दामन में, क्या रह गई कमी, प्यार में जां तक निसार हुआ। करते रहे हम, सारी उम्र बेपनाह मोहब्बत तुमसे, मेरी मोहब्बत का फिर भी ना, तुझे ऐतबार हुआ। कल तक जो थकते ना थे, लेते नाम हमारा, आज क्यों तुम्हारे वास्ते, ‘देव’ खतावार हुआ। देवेश साखरे ‘देव’ »

तिरंगा

तिरंगे का रंग जब सर चढ़ता है। बेजान शख्स भी उठ पड़ता है। झुकाने की औकात नहीं किसी की, दुश्मन लाख अपनी एड़ी रगड़ता है। केसरिया रंग बांध अपने सर पर, जवान जब सरहद पर लड़ता है। श्वेत रंग दिलों में जो धारण किया, शांति का पाठ दुनिया में पढ़ता है। हरे रंग की चादर से लिपटी धरती, हरित क्रांति किसान पसीने से गढ़ता है। अशोक चक्र बांध अपने रथ पे ‘देव’, मेरा भारत प्रति पल आगे बढ़ता है। देवेश साखरे ... »

संगदिल हमराज

ताज है मोहताज, सरताज कहाँ से लाऊँ। बना रखा है ताज, मुमताज कहाँ से लाऊँ। साथ निभाने का वादा करते थे कल तक, बीता हुआ वो कल, आज कहाँ से लाऊँ। संगदिल कहूँ या फिर दिले-कातिल कहूँ, किस नाम पुकारूं, अल्फ़ाज़ कहाँ से लाऊँ। जो कल तक थे, मुझ बेजुबां की आवाज, फिर बुला सकूँ, वो आवाज़ कहाँ से लाऊँ। दिल जोड़ना, फिर तोड़ना, क्या फन तुम्हारा, करार दे दिल को, वो साज कहाँ से लाऊँ। छोड़ा बीच राह, यहीं तक था साथ हमार... »

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