देवेश साखरे 'देव', Author at Saavan's Posts

# समाप्त धारा 370

खुशियों की डंका बजा दिया। इनकी तो लंका ढहा दिया।। हो सकते हैं अपने भी, अब सेब के बागान। डल झील में तैरता, होगा अपना भी मकान। दिलों से शंका हटा दिया। खुशियों की डंका बजा दिया। इनकी तो लंका ढहा दिया।। काश्मीर में भी अब तिरंगा, शान से लहराने लगा। धरती का स्वर्ग यकिनन, अब स्वर्ग कहलाने लगा। गौरव का झोंका बहा दिया। खुशियों की डंका बजा दिया। इनकी तो लंका ढहा दिया।। बहुत भोग लिए अब तक, तुम दोहरी नागरिकता... »

और एक जाम

खत्म न हो जश्ने-रौनक हँसीन शाम की। आ टकरा लें प्याला और एक जाम की। देखो साकी खाली ना होने पाए पैमाना, ले आओ सारी मय, मयकदे तमाम की। आ टकरा लें प्याला और एक जाम की। वक्त की क्या हो बात, जब दोस्त हों साथ, फिर किसे परवाह, हालाते-अंजाम की। आ टकरा लें प्याला और एक जाम की। कोई गम नहीं, फिर होश रहे या ना रहे , पर्ची लिख छोड़ी जेब में, अपने नाम की। आ टकरा लें प्याला और एक जाम की। चार दिन की है ये जवानी, ये... »

मुहब्बत का खुमार

तेरे आने से दिल को करार आया है। तुझे पाकर खुशियां बेशुमार पाया है। मैंने पी नहीं लेकिन, मैं नशे में चूर हूं, मुहब्बत का ये कैसा, खुमार छाया है। मौसमें भी अब रंगीन सी लगने लगी, पतझड़ ने भी कैसा, बहार लाया है। एक दूजे में हम, डूबे कुछ इस कदर, तू जिस्म है, तो मेरा आकार साया है। मेरी जिंदगी तो है, एक खुली किताब, फिर क्यों लगता, असरार छिपाया है। तेरे सिवा कोई और नज़र आता नहीं, निगाहों में बस तेरा, निगा... »

मैं ऐसा होता काश…..

सोचता हूं, मैं पानी होता काश, तुम्हारे प्यासे होठों की बुझाता प्यास। सोचता हूं, मैं हवा होता काश, हर पल अपने स्पर्श का दिलाता एहसास। सोचता हूं, मैं खुशबू होता काश, तुम्हारे तन को महकाता मैं बेतहाश। सोचता हूं, मैं खुशी होता काश, ना होने देता तुम्हें कभी उदास। सोचता हूं, मैं उम्मीद होता काश, आंखें बंद कर मुझ पर करती विश्वास। सोचता हूं, मैं मंजिल होता काश, तो खत्म मुझ पर होती तुम्हारी तलाश। सोचता हूं... »

नारी सब पर भारी

सत्य है नारी, सब पर है भारी। अब मलेरिया को ही देख लो, नर एनाफिलीज की, नहीं है औकात। ये तो है मादा एनाफिलीज की सौगात। दुनिया होती, भगवान को प्यारी। सत्य है नारी, सब पर है भारी। सुन्दरता की गर बात करें तो, मोरनी ने भले, सुन्दर पंख नहीं पाया। परन्तु मोर को, स्वयं के लिए नचाया। मूक जीव भी, नारी पर बलिहारी। सत्य है नारी, सब पर है भारी।। विश्वामित्र जैसे तपस्वी भी, अछूते ना रहे, कामदेव के काम वार से। बच... »

खुदा का फैसला

खुदा से बढ़ कर खुद कोई, नवाब नहीं होता। उसकी मर्ज़ी के बिना कोई, कामयाब नही होता। खुदा से खौफ खा बंदे, गुनाह करने से पहले, कौन कहता गुनाहों का कोई, हिसाब नहीं होता। यहीं भुगतना सभी को, अपने कर्मों का फल, उसके फैसले का भी कोई, ज़वाब नहीं होता। देवेश साखरे ‘देव’ »

छोड़ दिया

मैंने ज़ाम से ज़ाम टकराना छोड़ दिया। यारों मैंने पीना – पिलाना छोड़ दिया। खबर जो फैली, कि मैं हो चला बै-रागी, दोस्तों ने महफ़िल में बुलाना छोड़ दिया। दोस्ती का मतलब जानता हूं मैं, लेकिन, मतलब कि दोस्ती निभाना छोड़ दिया। हुए क्या ज़रा जो दूर, हम महफ़िल से, मुश्किलों में मिलना मिलाना छोड़ दिया। दोस्तों पे दोस्ती निसार है आज भी ‘देव’, दोस्तों ने दोस्ती आजमाना छोड़ दिया। देवेश साखरे ... »

अहंकार

उन दरख्तों को हमने उखड़ते देखा है। जो तूफान में तन कर खड़े होते हैं। तूफान का झुककर जो सम्मान नहीं करते, वो जमीन पर उखड़ कर पड़े होते हैं। इंसानों को भी टूट कर बिखरते देखा है, जो झूठे अहंकार में जकड़े होते हैं। अक्सर तन्हा रह जाते हैं वो इंसान, खुद की नजर में जो दूसरों से बड़े होते हैं। बद हालातों में जो खुदा को याद नहीं करते, उनसे ‘देव’ खुदा भी मुंह मोड़े होते हैं। देवेश साखरे ‘... »

अंजान सफर

मंज़िल पता नहीं, निकला हूं अंजान सफर में। अमृत ढुंढने निकला हूं , दुनिया भरी ज़हर में। इंसानियत बांध कर सभी ने, रख दी ताक पर, डरता हूं कहीं गिर ना जाऊं, खुद की नज़र में। नज़रें चुराकर चले हैं जो, ज़ुल्म होता देखकर, आईना बेचने निकला हूं मैं, अंधों के शहर में। आबरू महफूज़ है, ना कोई जाने- हाफ़िज़ है, लूटने के बाद निकले हैं लेकर, शम्मा डगर में। ख़ुदा भी खुद रोया होगा, हालाते-जहां देखकर, ऐसी तो न सौंप... »

दौर आ चला है

देखो फिर किचड़ उछालने का दौर आ चला है। खुद का दामन संभालने का दौर आ चला है। लाख दाग सही, खुद का गिरेबां बेदाग नहीं, दुसरों की गलतियां गिनाने का दौर आ चला है। वादों की फेहरिस्त तो, फिर से लंबी हो चली, इरादों को समझने समझाने का दौर आ चला है। बरसों से निशां पे फ़ना हैं, कुछ एक नादां मुरीद, शख्सियत पे बदलाव लाने का दौर आ चला है। वहां रसूख़दारों की मिलीभगत, पूरे ज़ोरों पर है, यहां दोस्तों के लड़ने लड़ा... »

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