देवेश साखरे 'देव', Author at Saavan's Posts

बुजुर्गों का साया

बेशक दौलत बेशुमार नहीं कमाया है। मगर मेरे सर पर, बुजुर्गों का साया है। ज़हां की दौलत कम है, मेरे खजाने से, दुआओं का खजाना, मेरा सरमाया है। हादसा सर से गुजर गया, मैं बच गया, लगता है, दुआओं ने असर दिखाया है। पाँव में काँटा, कभी चुभ नहीं सकता, पाँव जिसने भी, बुजुर्गों का दबाया है। जन्नत सुना था, ज़मीं पर ही देख लिया, कदमों में इनके, जब भी सर झुकाया है। देवेश साखरे ‘देव’ सरमाया- संपत्ति »

दुनिया एक अखाड़ा

ये दुनिया बनता एक अखाड़ा है। हर कोई लिए हथियार खड़ा है।। कभी मजहब के नाम फसाद। तो कभी सबब ज़मीं जायदाद। हर एक, दूसरे से बड़ा है। हर कोई लिए हथियार खड़ा है। ये दुनिया बनता एक अखाड़ा है।। भाई, भाई के खून का प्यासा। नहीं बचा प्रेमभाव जरा सा। इंसान किस फेर में पड़ा है। हर कोई लिए हथियार खड़ा है। ये दुनिया बनता एक अखाड़ा है।। कल तक, नारी को पूजता संसार। आज है, उनकी आबरू तार-तार। देखो कैसे मानसिकता सड़ा... »

गुरूर है

देर मिलता है, पर मिलता जरूर है। किस्मत पे अपने, इतना तो गुरूर है। खामोशी मेरी, लगने लगी कमजोरी, रहम दिल हूं, बस इतना कुसूर है। छत है सर, फिर भी हूं बेघर, घर जिनके हैं, वो कितने मगरूर हैं। हैं सब, पर कोई भी नहीं अब, सोच है मेरी, या मेरा फितूर है। हर हाल में, करुं ना मलाल मैं, नफरत से तो ‘देव’ होते सभी दूर हैं। देवेश साखरे ‘देव’ »

तसव्वुर तेरी

कम्बख़त तसव्वुर तेरी की जाती नहीं है। भरी महफिल भी मुझे अब भाती नहीं है। जिंदगी तो अब बेसुर-ताल सी होने लगी, नया तराना भी कोई अब गाती नहीं है। पुकारूं कैसे, अल्फ़ाज़ हलक में घुटने लगे, सदा भी सुन मेरी तू अब आती नहीं है। कहकहे नस्तर से दिल में चुभने लगे, सूखी निगाहें अश्क अब बहाती नहीं है। संग दिल से दिल मेरा संगदिल हो गया, कोई गम भी मुझे अब रुलाती नहीं है। देवेश साखरे ‘देव’ »

तुम्हें क्या कहूँ

तुम्हें चांद कहूं, नहीं, तुम उससे भी हंसीन हो। तुम्हें फूल कहूं, नहीं, तुम उससे भी कमसीन हो। तुम्हें नूर कहूं, नहीं, तुम उससे ज्यादा रौशन हो। तुम्हें बहार कहूं, नहीं, तुम सावन का मौसम हो। तुम्हें मय कहूं, नहीं, तुममें उससे भी ज्यादा खुमार है। तुम्हें नगीना कहूं, नहीं, तुम्हारे हुस्न का दौलत बेशुमार है। तुम्हें सूरज कहूं, नहीं, तुममें उससे भी ज्यादा तपीश है। तुम्हें तश्नगी कहूं, नहीं, तुममें उससे भ... »

जन्नत

तेरे कांधे पर, सर रख सोना चाहता हूँ। तेरे आगोश में, सब कुछ खोना चाहता हूँ। जन्नत सुना था, तेरी बाँहों में देख भी लिया, दो जिस्म और एक जान होना चाहता हूँ। »

मायूस

बड़े मायूस होकर, तेरे कूचे से हम निकले। देखा न एक नज़र, तुम क्यों बेरहम निकले। तेरी गलियों में फिरता हूँ, एक दीद को तेरी, दर से बाहर फिर क्यों न, तेरे कदम निकले। घूरती निगाहें अक्सर मुझसे पूछा करती हैं, क्यों यह आवारा, गलियों से हरदम निकले। मेरी शराफत की लोग मिसाल देते न थकते, फिर क्यों उनकी नज़रों में, बेशरम निकले। ख्वाहिश पाने की नहीं, अपना बनाने की है, हमदम के बाँहों में ही, बस मेरा दम निकले। दे... »

हिंदी की व्यथा

“हिंदी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ” क्या सुनाऊँ मैं, हिंदी की व्यथा। वर्तमान सत्य है, नहीं कोई कथा। आजकल के बच्चे A B C D… तो फर्राटे से हाँकते हैं। ‘ककहरा’ पूछ लो तो बंगले झाँकते हैं। आजकल के बच्चे वन, टू, थ्री… तो एक लय में बोलते हैं। ‘उन्यासी’ बोल दो तो मुँह ताकते हैं। आजकल के बच्चे अंग्रेजी शब्दों में ‘Silent’ अक्षर भी लिख जाते हैं। हि... »

नाज़ करे

ऐसी हो जिंदगी जिस पर नाज़ करे। खुदा तुम्हें, मेरी भी उम्र दराज़ करें। हर राह रौशन, काँटों से महफूज़ दामन, इतनी खुशियाँ बख्शे गम ना आज करें। »

किसे कदर देखेगा

कुछ ऐसा कर जाएंगे, सारा शहर देखेगा। मेरे शहर का, अब हर एक बशर देखेगा। मेरे सितारे भी चमकेंगे एक दिन यकीनन, गुज़रूं जहां से, हर शख्स एक नज़र देखेगा। कुछ कर गुजरने की ख्वाहिश है गर तुझमें, तो फिर क्या शब और क्या सहर देखेगा। चलना है ज़िंदगी, मुश्किलें हजार फिर भी, तेरा ज़ुनून अब यह लंबा सफर देखेगा। जिन्हें शक था ‘देव’ काबिलियत पर कभी, आज वह भी हैरत से किस कदर देखेगा। देवेश साखरे ‘दे... »

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