आ जाओ

मलय पवन बन,
आ जाओ मन उपवन में,
सजल नयन है,झील कमल है,
लोक-परलोक का कौतूहल,
है निज चितवन में ।
प्रखर  सूर्य  बन ,
आ जाओ मन दर्पण में,
धूमिल छवि है, स्तब्ध पड़ी है,
नव किरणो का संभल दे कर,
तन मन अलंकृत कर दो ।
पूर्ण  चन्द्र  बन,
आ जाओ गुनगुनी निद्रा में,
दिवा स्वप्न के द्वारे,झिलमिल तारे,
चाँदनी का रूप निखारें,
ऐसे ही शीतलता दे कर,
सपनो को मेरे सँवारो ।
निर्झर की निर्मल धारा बन,

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 जाओ समय के इस क्षण  में,

अविरल बहना,नदिया में रहना,

ऐसे ही जीवन डगर पर संग रहना ।।

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