ऐ इंसान सम्भल जा

एक प्रश्न है मुझे,
ये इंसान क्या हो गया है तुझे?
क्यों कर रहा है ऐसे काम,
जिससे हो रहे हो बदनाम।
क्या हक़ है तुझे,
कर रहा इस सृष्टि को नष्ट,
ये इंसान होगा तुझे ही कष्ट।
मैंने तम्हे बनया है श्रेष्ठ,
ये इंसान न कर इतना कलेश।
तुझे क्या लगता है ?? तुझसे चल रहा है यह संसार,
ये मुर्ख इंसान कर थोड़ा विचार।
तूने काट डाले सारे पौधे और पेड़,
क्यों करता जा रहा है अधेड़।
ख़त्म कर डाले तूने झील और नदिया,
कहाँ गए वो सुन्दर चहचहाती चिड़या।
ना रहा स्वच्छ ये पानी, न शुद्ध रही यह हवा,
जन्म से ही खा रहे शिशु दवा।
पैसो के पीछे भाग रहे हो तुम,
भागते भागते हो गए हो ग़ुम।
मैने दिया था तम्हे ये बुद्धि,
अब कर रहे तुम हर जंतु की शुद्धि।
मेरे लिए हर जंतु है सामान,
ये नादान इंसान ना कर इतना अभिमान।
समय है ये नादान सम्भल जा,
नहीं तो अपनी अग्नि में स्वयं ही जल जा।
तुझे होगा एक दिन प्रायाचित करना,
तुझे अपने कर्मो का फल होगा भरना।

…….. सौंदर्य निधि………

Comments

2 responses to “ऐ इंसान सम्भल जा”

  1. राम नरेशपुरवाला

    Good

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