कविता

“गान मेरे रुदन करते”(मेरी पुरानी रचना)
गान मेरे रुदन करते कैसे मैं गीत सुनाऊँ
जैसे भी हो हंस लेते तुम क्यों मैं तुझे रुलाऊँ |
हृदय वेदना बतलाऊँ या जीवन सार सुनाऊँ
दोनों का रिश्ता सांसो से छोड़ूं किसको अपनाऊँ ||
तुमने दिया गरल तो क्या मैं नित नित विष पीता हुँ
गिन गिन के जीवन के पल मरता हुँ और जीता हुँ|
यदि मैं तुझे सूना दुँ तो क्या तुम मुझे समझ पाओगे
डरता हुँ तुम भी तज दोगे क्या तुम अपनाओगे !!
मैं निज व्यथा किसे कैसे किस रस के साथ सुनाऊँ
सुंदर रचना कहते है जब मैं अपनी तपन बताऊँ !
मन में जीवन नद धारा की तुझको क्या गति बतलाऊँ
डुबूं और उतराऊँ मतिहीन लेकिन पार ना पाऊँ !!
उपाध्याय (मतिहीन)

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