कुछ पाया और कुछ खोया

कुछ पाया और कुछ खोया,
क्यों मुझे इस बात पर रोना आया!
क्यों बिछड़ते रहे अपने,
क्यों अजनबियों के बीच मुझे रहना आया!
सपनें टूटते बिखरते रहे,
उसे समेटते दिल भर आया,
कुछ खोया और कुछ पाया।

क्या हुआ जो सब टूटा,
मेरे भीतर के दर्द को, 
कब मैंने समेटा,
जो खोया उसे ठुकराया,
जानकर भी इस बात पर क्यों,
इन आँखों ने सैलाब बहाया।
क्यो मुझे सिर्फ खोना ही आया!
कुछ पाये थे वो लम्हें, वो बातें।
इन सब से दूर अब मुझको जीना आया।
कुछ खोया और कुछ पाया।


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12 Comments

  1. Geeta kumari - September 1, 2020, 5:41 pm

    संजीदा रचना का सुंदर प्रस्तुतीकरण

  2. प्रतिमा चौधरी - September 1, 2020, 5:52 pm

    बहुत बहुत धन्यवाद मैम

  3. Priya Choudhary - September 1, 2020, 6:48 pm

    खोना और पाना जीवन के दोनों पहलुओं का बहुत सुंदर प्रस्तुतीकरण है👏👏👏

  4. मोहन सिंह मानुष - September 1, 2020, 7:59 pm

    बहुत ही बेहतरीन

  5. Sulekha yadav - September 1, 2020, 8:23 pm

    amazing poetry

  6. प्रतिमा चौधरी - September 2, 2020, 8:39 am

    धन्यवाद

  7. Pt, vinay shastri 'vinaychand' - September 2, 2020, 1:52 pm

    Sunder

  8. प्रतिमा चौधरी - September 2, 2020, 2:09 pm

    Thank you sir

  9. Deep Patel - September 24, 2020, 11:09 am

    amazing poetry

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