खुद से जुदा भी नहीं

खुद से जुदा भी नहीं मुखातिब भी नहीं
खुद को बयां करूँ ऐसा कातिब भी नहीं
गुमगश्ता फिरती है नाशाद रूह जिसकी
फ़िदाई बन भी सकूँ ऐसा जाज़िब भी नहीं
राजेश’अरमान’

फ़िदाई= प्रेमी
कातिब= लेखक
गुमगश्ता= भटकता हुआ, खोया हुआ
जाज़िब= मनमोहक, आकर्षक

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