चांद..

कल फिर गया था मैं घर की छत पर
उस चांद को देखने
इस उम्मीद में की शायद
तुम भी उस पल उसे ही निहार रही होंगी
देख रही होंगी उसपर बने दाग के उस भाग को
जिसे मैं देख रहा था..
आखिर..
प्यार भी अजीब हैना..
मिलने के कैसे-कैसे बहाने ढूंढ लेता है..

-सोनित

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9 Comments

  1. Kavi Manohar - July 12, 2016, 7:17 pm

    Nice

  2. मन की बात - July 13, 2016, 2:58 pm

    बहुत खूब

  3. महेश गुप्ता जौनपुरी - September 11, 2019, 11:06 pm

    बहुत सुंदर

  4. राम नरेशपुरवाला - September 21, 2019, 4:40 pm

    वाह

  5. nitu kandera - November 26, 2019, 12:28 pm

    Wah

  6. Abhishek kumar - January 1, 2020, 9:45 pm

    Nice one

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