जीवन का सच

जीवन मृत्यु सच जीवन का
इनसे ना कोई बच पाया है।
सब जानते हैं जाना है वहां!
जहां परमात्मा का साया है।
फिर भी भटके भटके रहते,
लालच में हम अटके रहते।
नहीं जान सके कि सच क्या है!
बस झूठ में हम लटके रहते।
जान लो सच इस जीवन का,
पहचान लो क्या यह खेल रचा।
हम तो कठपुतली भर ही हैं,
प्रभु के हाथों में धागा लगा।
शतरंज बिछाए बैठे हैं,
प्रभु खेल जमाए बैठे हैं,
मोहरे है सभी प्राणी जग के,
प्रभु हमें नचाए बैठे हैं।
जब मन चाहा डोरी खींची
जब चाहा जीवनदान दिया।
जब चाहा चक्र में बांध दिया,
जब चाहा मोक्षधाम दिया।
निमिषा सिंघल

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