डरता हूं

बढती हुई कट्टर हिंदुओं की अराजकता पर कुछ लाइनें

 

अब बाहर निकलने से भी मैं डरता हूं

अपनी गोल टोपी पहनने से डरता हूं

कभी कहीं कोई गाय दिखाई दे तो

झुका लेता हूं दूर से ही सर अपना

मैं अपना सर कट जाने के डरता हूं

महंगी दाल, शक्कर के जमानें में भी

अब सस्ता मांस मैं खाने से डरता हूं

बाहर का हूं या इस देश का समझ नहीं आता

अब भारत को अपना देश कहने से डरता हूं

Previous Poem
Next Poem

लगातार अपडेट रहने के लिए सावन से फ़ेसबुक, ट्विटर, इन्स्टाग्राम, पिन्टरेस्ट पर जुड़े| 

यदि आपको सावन पर किसी भी प्रकार की समस्या आती है तो हमें हमारे फ़ेसबुक पेज पर सूचित करें|

By Anil

4 Comments

  1. Komal - May 18, 2016, 12:18 am

    Nice

  2. Panna - May 18, 2016, 12:39 am

    अच्छी कविता

Leave a Reply