धैर्य

निश्चित छोड़ अनिश्चित को धावे ।
मुट्ठी से निश्चित खोवे अनिश्चित हाथ न आवे ।
“विनयचंद “धैर्य बिना क्या पावे?


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1 Comment

  1. Kanchan Dwivedi - March 6, 2020, 5:27 pm

    Correct

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