निगाहें उठाकर जिधर देखते हैं
निगाहें उठाकर जिधर देखते हैं
उडीं हैं गुबारों सी अब हसरतें भी
न कर पाई आबाद शहरों की बस्ती
अंधेरे की चादर से बाहर निकल कर
किया जो पता जीस्त का अपनी हासिल
किसी संगदिल को भी जो मोम कर दे
कभी धूप में आरज़ू की जले हम
Comments
15 responses to “निगाहें उठाकर जिधर देखते हैं”
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Bahut hi sundar ghazal….manbhaavan 🙂
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हार्दिक धन्यवाद
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nice poem 🙂
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बहुत धन्यवाद
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लाजवाब
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शुक्रिया
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was! very nice
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Thanks
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बहुत धन्यवाद
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बहुत धन्यवाद भाई
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बहुत धन्यवाद
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धन्यवाद
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Aati Sundar
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वाह
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वाह बहुत सुंदर

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