अदाओं से उसकी पिघलने लगा हूँ,
खुदी की गिरह से निकलने लगा हूँ।
बना मैं दिवाना मुहब्बत में उसकी,
मुहब्बत में उसकी बदलने लगा हूँ।
किसे फ़िक्र है अब कहे क्या जमाना,
उसे देखकर अब सवरने लगा हूँ।
कभी बेवज़ह ही करो रुख़ इधर का,
ख्यालों से तेरे मचलने लगा हूँ।
नशा तो नशा है ये मय हो क़ि आँखें,
पिए बिन मैं साक़ी बहकने लगा हूँ।
नहीं आरजू मेरी है चाँद तारे,
मिला है जो तू तो चहकने लगा हूँ।
ये आग़ोश तेरा ये बाहों के साये,
ख़ुदा की क़सम मैं महकने लगा हूँ।
तेरा जिस्म है या कुई संगमरमर,
हुआ राब्ता तो फिसलने लगा हूँ।
तराशा ख़ुदा ने बड़ी रहमतों से,
तेरी ओर खुद मैं दरकने लगा हूँ।
कहीं आइना भी न कर दे बग़ावत,
ये सोचूँ अगर मैं उलझने लगा हूँ।
बड़ा संगदिल है सनम तेरा काफ़िर,
जुदाई की सोचूँ तो मरने लगा हूँ।
#काफ़िर (10/06/2016)
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