मधु छलके भीतर

कोई दिक्कत है अगर
सीधे सीधे बोल,
भीतर-भीतर विष जड़ी
मत रखना तू घोल।
मत रखना तू घोल
जहर दूजे को देने,
पड़ जायेंगे कभी
तुझे लेने के देने।
कहे लेखनी अमिय,
बाँट ले बाहर भीतर,
होंठों में हो हँसी
और मधु छलके भीतर।


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5 Comments

  1. Antariksha Saha - January 24, 2021, 10:37 pm

    खूब कहा

  2. MS Lohaghat - January 25, 2021, 8:10 am

    बहुत ही बढ़िया

  3. Devi Kamla - January 25, 2021, 8:13 am

    बहुत उम्दा रचना

  4. Pt, vinay shastri 'vinaychand' - January 25, 2021, 8:17 am

    अतिसुंदर भाव

  5. Geeta kumari - January 25, 2021, 9:37 pm

    “मधु छलके भीतर” कवि सतीश जी की बहुत सुंदर कविता

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