माटी

जिस्म ऐ माटी में इस रूह को डालता कौन है,
बनाकर इन पुतलों को ज़मी पर पालता कौन है,

मिलाकर हवा पानी आसमाँ आग पृथ्वी को,
वक्त वक्त पर ख़ुशी और गम में ढालता कौन हैं,

तमाम नस्ल के रंगों में रहगुजर उस “राही” को,
जानने की चाहत में अब यूँही खंगालता कौन है।।

राही अंजाना

Comments

4 responses to “माटी”

  1. महेश गुप्ता जौनपुरी Avatar
    महेश गुप्ता जौनपुरी

    वाह बहुत सुंदर रचना

  2. राम नरेशपुरवाला

    Good

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