मित्र कौन !

 

सच्चा मित्र —— होता है : संघरित्र !

आपसे जुड़कर—आपका विषाद बाँटता है
आपकी ऊष्मा आत्मसात् करता है
……….. आपको ऊर्जा से भरता है.

सच्चे मित्र के मुँह पर ; ऊगते हैं : बबूल !
वह गुलाब–सा ललचा कर
लहू——-लुहान नहीं करता
: अनचाहे–अनजाने काँटे नहीं चुभाता
आपकी परछाई होता है………………..
……………..आप पर हावी नहीं हो जाता .

सच्चा मित्र …… आपकी ज़रुरत होता है !
वह आपके ” मन के खलिहान ” में
सजग प्रहरी सा सोता है
जब आप बेख़बर होते हैं
वह…… जाग रहा होता है
: आपके दुश्मनों के पीछे
———– भाग रहा होता है.

आप !
मित्र के कांधे पर सिर टिकाकर
————— रो सकते हैं
मित्र के विश्वास से महकते मन में
————— सो सकते हैं.

सच्चा मित्र ; आप से कभी प्रतिदान नहीं चाहता !
वह ” कर्ण– विदुर या भामाशाह ” सा होता है
वही तो अनुभव के महासागर की थाह होता है.

सच्चा मित्र ; जीवन की परम् उपलब्धि होता है
” सब कुछ ” खो जाता है
: जब सच्चा मित्र खोता है.

तो; क्या ‘ हम ‘ भी !
किसी का सच्चा मित्र बन पाए हैं ?
: अनुपम त्रिपाठी
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संघरित्र— एक उपकरण जो ऊर्जा का संचय करता है/Condenser./capacitor
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4 Comments

  1. Anjali Gupta - December 30, 2015, 10:34 pm

    nice 🙂

  2. Ajay Nawal - December 30, 2015, 11:22 pm

    ekdam sahi kaha aapne..nice

  3. Akanksha Malhotra - December 31, 2015, 1:29 am

    true lines 🙂

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