मुक्तक 27

तमाम गुलाबो की खुश्बू है तेरे इकरार में साकी ,

कही ऐसा न हो मैं खुश्बुओं की चाह ही रख लू..

…atr

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ठान लूँ गर मैं तो कुछ भी कर सकती हूँ ठान लूँ गर मैं तो असंभव भी संभव कर सकती हूँ ठान लूँ गर मैं…

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