मुक्तक

उष्णत्तर उरदाह की अनुभूति क्या तुम कर सकोगे
कृत्य नीज संज्ञान कर अभिशप्तता मे तर सकोगे !
एक एक प्रकृति की विमुखता पर पांव धर कर
जी लिये अपने लिये तो दुसरों पर मर सकोगे !!
पतवार बिन मजधार में टूटी फुटी नैया फंसी जो
क्या करूं प्रत्यय कि उससे पार तुम उतर सकोगे |
बस तनिक स्पर्श बोधित कामना जाग्रत भई जो
सुमन निशि कंटक सघन में क्या कभी निखर सकोगे!!
… उपाध्याय…

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