मुझको मिले हैं ज़ख्म जो बेहिस जहान से

मुझको मिले हैं ज़ख्म जो बेहिस जहान से

फ़ुरसत में आज गिन रहा हूँ इत्मिनान से

आँगन तेरी आँखों का, न हो जाये कहीं तर

डरता हूँ इसलिए मैं वफ़ा के बयान से

साहिल पे कुछ भी न था तेरी याद के सिवा

दरिया भी थम चुका था अश्क़ का उफ़ान से

नज़रों से मेरी नज़रें मिलाता है हर घड़ी

इकरार-ए-इश्क़ पर नहीं करता ज़ुबान से

कटती है ज़िन्दगी नदीश की कुछ इस तरह

हर लम्हाँ गुज़रता है नये इम्तिहान से

©® लोकेश नदीश

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Responses

  1. मुझको मिले हैं ज़ख्म जो बेहिस जहान से
    फ़ुरसत में आज गिन रहा हूँ इत्मिनान से….bahut ache janaab!

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