मुट्ठी

ज़िन्दगी एक अनसुलझी पहेली सी नज़र आती है,
कभी किसी कि सगी तो कभी सौतेली सी नज़र आती है,
रूठना रूठ कर मान जान जाना इंसानों की फितरत होगी,
पर ज़िन्दगी गर रूठ जाए तो ज़िद्दी सी नज़र आती है,
खेलती है खिलाती है हंसती है रुलाती है पल पल कितने ही रंग दिखाती है,
जिस तरह निकल जाती है बन्द मुट्ठी से रेत,
यूँही ज़िन्दगी भी हाथों से सरकती सी नज़र आती है॥
राही (अंजाना)

Comments

2 responses to “मुट्ठी”

  1. राम नरेशपुरवाला

    Good

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