मुन्तजिर हूं मैं मोहब्बत का

मुन्तजिर हूं मैं मोहब्बत का
मयखानों की मुझे तलाश नहीं
इक दरिया है जिसे मैं ढ़ूढ़ता हूं
पैमानों के जामों की मुझे प्यास नहीं


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तकदीर का क्या, वो कब किसकी सगी हुई है।

1 Comment

  1. महेश गुप्ता जौनपुरी - September 9, 2019, 6:49 pm

    वाह बहुत सुंदर

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